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मंगलवार, 12 जुलाई 2022

खिल गई कुमुदिनी

 सारा दिन भागदौड़ टेस्ट एक्स-रे एम आर आई और इस काउंटर से उस काउंटर इस मंजिल से उस मंजिल तक भागते दौड़ते नेहा पस्त हो गई थी तन से भी और मन से भी। उसके पति परेश को अभी वार्ड में शिफ्ट किया। सेमी प्राइवेट रूम का कोने वाला बेड उसके बगल में दो फीट की एक गद्देदार बेंच है और दीवार पर एक खिड़की जिस पर हरा पर्दा डला है। परेश हाथ में पट्टियों के सहारे स्थिर की सुई में बोतल की सीरीज लगाए अध बेहोशी अधनींद की हालत में है। नर्स कुछ दवाइयां इंजेक्शन कॉटन ट्रे में रखकर पलंग के पैताने लगे चार्ट पर कुछ नोट करके जा चुकी है। उस कमरे के बीच का एक बेड खाली है और दूसरे कोने में दरवाजे की तरफ एक बुजुर्ग पेशेंट है। 

परेश पर एक नजर डालकर नेहा बगल में पड़ी उस बैंच पर बैठ गई। उसके पैरों में गहरी टीस सी उठी जो उसकी कमर से होते हुए रीढ़ तक फैल गई। उसके मुँह से एक सिसकारी निकली सूखे होंठों पर जीभ फेरते उसे याद आया कि उसने बहुत देर से पानी नहीं पिया है। उसके पास पानी था भी नहीं और न पानी पीने जाने की हिम्मत ही उसमें बची थी। 

उसने खिड़की का पर्दा हटा कर बाहर झांका बाहर एक छोटे सूखे मैदान के पार एक छोटा सा पोखर था। डूबते सूरज की सिंदूरी किरणें हवा से बनी पानी की छोटी-छोटी लहरों को सिंदूरी आभा दे रही थी तो आसमान का स्लेटी सियाह रंग पानी को अपने रंग में रंगने के लिए उसमें समाता जा रहा था। पोखर में कुछ कुमुदिनी दिनभर अपनी खुशबू और छटा बिखेर कर अपनी पंखुड़ियों को समेटकर गहन उदासी में डूबी हुई थी। इस दृश्य ने नेहा को और अधिक हताश कर दिया उसने पर्दा छोड़ दिया और सोच में डूब गई। 

परिवार की छोटी बेटी माता-पिता की लाडली नेहा जिसे माता-पिता पलकों पर बैठा कर रखते थे तो उसका बड़ा भाई राहुल सिर पर। उसके मुँह से निकली बात निकलने से पहले पूरी हो जाती। नेहा को रसगुल्ला खाना है पापा रात नौ बजे स्कूटर लेकर निकल जाते। नेहा को सहेली के यहाँ जाना है राहुल बाइक से छोड़ने लेने चला जाता। नेहा के कॉलेज की फीस भरना है पापा ऑफिस जाते भर देंगे मूवी जाना है भाई टिकट लाकर दे देगा। नेहा सहेलियों के बीच अपने परी जैसे स्टेटस की तारीफ करते नहीं थकती। घर के कामों में मम्मी का हाथ जरूर बंटाती लड़की को सब कुछ आना चाहिए लेकिन ऊपर टांड पर से कनस्तर उतारने के लिए भाई को बुलाया जाता तो गैस की टंकी लगाने पापा को। नेहा को न कभी किसी ने ऐसे काम करने को कहा और न उसने कभी ऐसी कोई इच्छा जताई। सुंदर पढ़ने-लिखने में होशियार खाना बनाने में दक्ष बोल चाल में निपुण नेहा को परेश और उसके माता-पिता ने देखते ही पसंद कर लिया था।

बी ए फाइनल किया ही था उसने कि चट मंगनी पट ब्याह कर वह खूबसूरत लाल जोड़े में लिपटी परेश की जिंदगी में आ गई। 

परेश के शरीर में हुई हरकत ने नेहा को चैतन्य कर दिया। प्यास के मारे उसका गला ही नहीं आंतें भी सूखने लगी थीं। वह उठ खड़ी हुई बाजू वाले पेशेंट के अटेंडेंट से ध्यान रखने और वाटर कूलर का पता पूछ कर वह पानी पीने चली गई। अस्पताल के गलियारे लोगों और उनके कोलाहल से भरे हुए थे इनके बीच नेहा का अकेलापन और मुखर हो उठा। मम्मी पापा का फोन भी नहीं आया फोन की याद आते ही वह तेजी से वार्ड की तरफ भागी। फोन दिनभर से पर्स में पड़ा था। दोपहर में जब परेश को एम आर आई के लिए ले गए थे तब उसने घबराते हुए मम्मी-पापा और सास-ससुर को फोन किया था। उसके बाद न उसे समय मिला न मोबाइल का होश ही रहा। नेहा ने देखा छह-सात मिस कॉल थे। वह मोबाइल उठा कर फिर बाहर आ गई। पहले सासू जी को फोन लगाया वह बहुत परेशान थी। परेश के हाल चाल बता कर वह पूछने ही वाली थी कि आप कब आओगे तभी सासु माँ ने राहत की साँस लेते हुए कहा बेटा अब तुम वहाँ सब संभाल ले रही हो और परेश भी अब ठीक है तो बेटा हम अब जरा निरात से आएंगे। तुम्हारे पापा जी के ऑफिस में ऑडिट चल रहा है। मम्मी पापा ने भी आने में असमर्थता जताई। भाई राहुल विदेश गया था पापा को टाइफाइड हुआ है मम्मी भी उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकतीं। नेहा थके कदमों से वापस आकर बैठ गई। 

आज सुबह भी रोज की तरह परेश खाने का डब्बा टाँग हेलमेट सिर में फँसा कर आफिस जाने के लिए निकला था। उसे विदा कर वह अंदर आकर बैठी ही थी कि उसका मोबाइल बजा परेश का फोन था। एक शरारती हंसी उसके होठों पर तैर गई। उसने फोन उठाकर लो को लंबा खींचते हुए हेलो कहा लेकिन दूसरी तरफ से अजनबी आवाज ने उसे चौंका दिया। किसी राह चलते व्यक्ति ने उसे बताया कि परेश की बाइक चौराहे से पहले ही स्लिप हो गई है और डिवाइडर से टकराने से वह बेहोश हो गया है। बदहवास नेहा ने पर्स मोबाइल लिया किसी तरह ताला लगाया और दौड़ती हुई वहाँ तक पहुंची। परेश बेसुध पड़ा था किसी ने उसकी बाइक खड़ी कर दी थी और मोबाइल से स्वीटहार्ट के नंबर पर उसे फोन कर दिया। शुक्र था भीड़ में उसे कॉलोनी के एक अंकल दिख गये और उसने उनसे बाइक का ध्यान रखने और घर पहुंचाने का अनुरोध किया। वह परेश को हॉस्पिटल लेकर आई। 

नर्स ने आकर ड्रिप बदल दी सिस्टर कब तक होश आयेगा उसने पूछा। 

जल्दी ही आ जाएगा थोड़ा बीपी बढ़ा था इसलिए दवा में नींद का डोज है। आप नीचे कैंटीन में जाकर कुछ खा लीजिए हम यहाँ ध्यान रखेंगे नर्स उसके भूखे प्यासे क्लांत चेहरे को देखकर स्नेह भरे स्वर में बोली। 

इन्होंने भी तो कुछ नहीं खाया। 

उनको बॉटल से सब मिल रहा है तुम खा कर आओ तुम्हें भागदौड़ करना है सिस्टर ने समझाया। 

कभी-कभी परेश कितना चिढ़ जाता था जब नेहा उसे गैस का सिलेंडर बदलने बिल भरने सब्जी लाने का कहती। वह उसे समझाता था कि छोटे-मोटे काम करना आना चाहिए। कभी जरूरत पड़ी तो यहाँ इस अजनबी शहर में हम दोनों अकेले हैं कैसे संभालोगी तुम ? 

वह अपनी हथेली उसके होंठों पर रख देती मुझे कभी कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। 

परेश झुंझलाता ऐसा भी क्या लाड प्यार कि एक अच्छी भली लड़की को परजीवी बना दें और नेहा नाराज हो जाती। आज दिनभर हर बार किसी काउंटर पर खड़े उसकी टांगें कांपती रहीं कुछ पूछने में जबान लड़खड़ाते रही। आज उसे परेश की कही हर बात की गंभीरता समझ आई। क्या सच में लाड प्यार में उसे पूरी तरह विकसित नहीं होने दिया गया ? उसका मन आक्रोश से भरने लगा। 

परेश गहरी नींद में था वह पास की बेंच पर लेट गई। मम्मी पापा भाई के लाड प्यार और उसके व्यक्तित्व के एक हिस्से के कमजोर रह जाने के बारे में सोचते सोचते उसकी आँख लग गई। सुबह कमरे में फैली रोशनी से उसकी आँख खुली उसने देखा परेश भी जाग गया है। उसने राहत की सांस ली। परेश के चेहरे पर चिंता झलकी जिसे उसने पलक झपका कर आश्वस्त किया। फिर पर्दा हटाकर देखा पोखर में गुलाबी कुमुदिनी खिली थी। उसके चेहरे पर अपने व्यक्तित्व को निखारने के प्रण की खुशबू बिखर गई।

बुधवार, 6 जुलाई 2022

धागा प्रेम का

 अच्छा चलता हूं अपना ख्याल रखना ध्यान से रहना और  कोई भी बात हो मुझे तुरंत फोन करना। मयंक ने निशी के माथे पर प्यार से चुंबन अंकित करते हुए कहा। 

आप भी अपना ख्याल रखिएगा और यहां की चिंता मत करिए यहां मैं सब संभाल लूंगी।

मयंक ने तीन साल की बिटिया चीनू को गोद में उठाकर प्यार किया उसे ताकीद दी मम्मी को तंग नहीं करना तभी बाहर खड़ी टैक्सी में हॉर्न दिया और मयंक ने चीनू को निशी की गोद में देकर टैक्सी का रुख किया। मयंक को उसकी कंपनी तीन महीने की विशेष ट्रेनिंग पर जापान भेज रही थी। यह उसके लिए विशेष खुशी और गर्व का विषय था कि कंपनी के पैंतालीस इंजीनियर्स में से उसे चुना गया था। बहुत खुश था वह लेकिन पत्नी और बेटी को अकेला छोड़कर जाने पर खासा चिंतित भी था। निशि टैक्सी के ओझल हो जाने तक गेट पर खड़ी रही फ़िर थके कदमों से चीनू को लेकर अंदर आ गई। अंदर आते ही उसने दरवाजा बंद किया और सामने की खिड़कियों पर पर्दा खींच दिया। अचानक एक असुरक्षा के एहसास ने उसे घेर लिया। अब वे माँ बेटी इस घर में इस शहर में एकदम अकेले हैं। इस एहसास ने गले में अटकी सिसकी को बाहर धकेल दिया। आवाज सुन चीनू ने अपनी बड़ी बड़ी आंखों से निशि को देखा तो उसने झट मुंह फेर कर आंखें पोंछ लीं और अगली सिसकी को गटक लिया। वह घर जिसमें मयंक कभी दिन में नहीं रहता था आज दिन में सांय सांय कर रहा था। चीनू की दोपहर की नींद का समय था निशि उसे लेकर लेट गई। उसकी आंखें भर आई अकेलेपन का अहसास उसे तोड़ रहा था। अभी तो मयंक की फ्लाइट ने टेक आॅफ भी नहीं किया कैसे गुजरेंगे यह तीन महीने अकेले ? माता-पिता भी अब नहीं रहे। भाई भाभी की गृहस्थी में इतने लंबे समय के लिए मेहमान बनकर रहना ठीक नहीं लगता। वह भी कहां पास में हैं दो हजार किलोमीटर दूर कोलकाता के पास एक छोटे से कस्बे में हैं। उसका बचपन भले वहाँ बीता लेकिन अब इतनी छोटी जगह रहने की आदत छूट गई। चीनू का स्कूल भी इसी साल शुरू हुआ उसे भी तो नहीं छोड़ा जा सकता।

शहर में कुछ पुराने परिचित हैं लेकिन वे सभी शहर के पुराने हिस्से में हैं जहाँ मयंक के पिता का पुश्तैनी घर है। वहाँ मयंक के बड़े भाई मुकेश भाई साहब अपने परिवार के साथ रहते हैं। मयंक और निशि ने छह माह पहले ही इस सुदूर कॉलोनी में मकान बनवाया है। शादी के बाद तीन साल तक सब साथ रहे फिर मयंक ने उसे तोड़कर नए सिरे से आधुनिक तरीके से बनाने को कहा जो भाई साहब को मंजूर नहीं था। उनका कहना था कि अभी मकान मजबूत है इसे गिरा कर अनावश्यक पैसा लगाने का क्या औचित्य ? मयंक चाहता था कि अभी कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं है इसलिए अभी दोनों भाई लोन लेकर बढ़िया मकान बनवा लें जब तक बड़ी जिम्मेदारियां आएंगी लोन चुक जाएगा। भाई साहब का अपना बिजनेस था पक्के व्यापारी थे वे उन्होंने इसे पैसे की बर्बादी बताया उनका कहना था कि बेकार का कर्जा करना ठीक नहीं है। करीब दो-तीन महीने चले इस विचार विमर्श का अंत तनातनी में हुआ बातचीत इतनी बढ़ी कि मयंक ने अलग होने का फैसला कर लिया। भाई साहब मकान के हिस्से करने को तैयार न हुए उन्होंने कहा कि मयंक को तो मकान तुड़वाकर नया ही बनवाना है इसलिए सिर्फ जमीन का वैल्यूएशन (जमीन की कीमत) करवा लेते हैं और जो भी कीमत होगी उसका आधा पैसा मैं मयंक को दे दूंगा। इस तरह भाई साहब ने मयंक को तीस लाख रुपये दिए। इतने में मयंक जमीन खरीद कर मकान नहीं बनवा सकता था इसलिए उसने बैंक से लोन लिया और दो बेडरूम का यह मकान बनवाया। मकान का बंटवारा होने के बाद मयंक बहुत ठगा सा महसूस कर रहा था। कुछ कसर जान पहचान वालों और रिश्तेदारों ने पूरी कर दी उन्होंने मयंक को मुकेश भाई साहब की चालाकी और ठगी का अहसास करवाया। मुकेश भाई साहब जितना समझाते ठगे जाने का एहसास उतना ही गहरा होता जाता। निशि को भी यही लगता था और फिर मुकेश भाई साहब को लेकर कटुता इतनी बढ़ी कि उन दोनों ने उनसे सारे संबंध तोड़ लिए। यहाँ तक कि अपने मकान की वास्तुशांति में भी उन्हें नहीं बुलाया और न ही अपनी कंपनी से जापान भेजे जाने की कोई सूचना उन्हें दी। 

निशी ने सो रही चीनू के सिर पर हाथ फेरा उसे सीधा सुलाया और पीठ सीधी करके आंखें बंद कर लीं। दोनों आंखों में भरे आंसू बाहर निकलकर तकिए में समा गए। मयंक के बिना दिन रात बेहद सूने हो गए थे चीनू भी हरदम उसे याद करती। जितना वह याद करती निशि को अपने दिल पर काबू करना उतना ही मुश्किल लगने लगता। फोन पर रोज बात होती थीं लेकिन ट्रेनिंग के दबाव से थका मयंक बहुत देर बात करने की स्थिति में नहीं होता था। देर रात कभी बात करने का मन होता तो होटल के रूम में एक और साथी की उपस्थिति बाधा बनती। दिन यूँ ही गुजर रहे थे दीपावली आने वाली थी मयंक का आना संभव न था इसलिए निशी में भी त्योहार का कोई उत्साह न था। 

तभी अचानक उस दिन खेलते खेलते चीनू गिर पड़ी उसका मुँह सीढ़ियों से टकराया और उसका सामने का दाँत अंदर मसूड़े में धंस गया। कुछ ही सेकंड में उसका चेहरा खून से लथपथ हो गया। निशि यह देखकर एकदम घबरा गयी उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। आसपास ज्यादा मकान भी नहीं थे न कोई दिख रहा था जिन से मदद मांग सके। बदहवास सी चप्पल पैरों में डाले पर्स लेकर ताला लगा चीनू को गोद में उठाकर वह कॉलोनी के बाहर तरफ भागी। शुक्र है एक खाली ऑटो मिल गया। हॉस्पिटल जाने का कहकर उसने चीनू को गोद में लिटाया उसका मुँह खून से भरा था जो उसने निशि के ऊपर उलट दिया। निशि भैया जल्दी करो प्लीज जल्दी चलाओ कहती खून और आंसुओं में लथपथ कभी चीनू को कभी रास्ते को देखती। चीनू की आंखें मुंदी जा रही थीं। 

अस्पताल पहुँचते ही चीनू को ओटी में ले लिया गया। निशि लोगों से भरे अस्पताल के गलियारे में अकेली असहाय खड़ी थी। न वह रो रही थी न कुछ समझ पा रही थी। नर्स ने उसे काउंटर पर पैसे जमा करने को कहे उसने कार्ड से पेमेंट किया और वापस मुड़ी। तभी डॉक्टर ने कहा बच्ची का दाँत मसूड़े में धंस गया है ऑपरेशन करके चीरा लगाकर निकालना होगा। वह पथराई सी डॉ को देख रही थी तभी एक आवाज आई इसमें कोई रिस्क तो नहीं है डॉक्टर ? क्या हम एक बार चीनू को देख सकते हैं ? वह होश में तो है ? 

जी हाँ वह होश में हैं ब्लीडिंग कम हो गई है। आप कौन ? 

मैं बच्ची का ताऊ उसका बड़ा पापा। 

निशि ने चौंककर सामने देखा। तभी दो हाथों ने उसे कंधों से थाम लिया यह भाभी जी थीं। निशि भरभरा कर गिरने को हुई उन्होंने सहारा देकर उसे बेंच पर बैठाया। इसके बाद किस डॉक्टर से क्या बात हुई कब ऑपरेशन हुआ निशि को कुछ नहीं पता। भाई साहब ने ही सब से बात की मयंक को फोन कर सभी स्थिति बताई ऑपरेशन के लिए खून दिया दवाई मंगवाई। 

चार दिन अस्पताल में रहकर चीनू की छुट्टी हो गई। धनतेरस का दिन था ऑटो भाई साहब के घर के सामने रुका। चीनू को गोद में लेकर भाई साहब अंदर चले गए। निशी के कदम थम गए क्या करें ? भाई साहब भाभी जी से कुछ कहने की स्थिति में वह नहीं थी चुपचाप अंदर चली गई। उसे याद आया जब वे दोनों घर छोड़कर जा रहे थे तब भाई साहब ने मयंक से कहा था मयंक घर मकान भले अलग हो जाएं लेकिन मुसीबत के समय एक और एक ग्यारह होते हैं इस प्रेम के धागे को मत तोड़ो लेकिन तब वे इस बात को नहीं समझे। 

जापान से वापस आकर मयंक निशि और चीनू को लेकर भाईसाहब से मिलने गया तब एक ही उत्सुकता थी कि भाईसाहब को कैसे पता चला ? 

भाईसाहब ने बताया कि मयंक के जापान जाने की खबर उन्हें मिल गई थी। उन्होंने दुकान के एक पुराने मुलाजिम को सुबह शाम मयंक के घर के आसपास चक्कर लगाकर सब ठीक है या नहीं देखने की जिम्मेदारी दे दी थी। जब निशी चीनू को लेकर ऑटो में बैठी उसने देख लिया और भाई साहब को खबर दे दी थी।

मयंक बहुत शर्मिंदा था उसने भाईसाहब के पैरों में झुकते हुए माफी मांगी और भाईसाहब ने कहा कि जापान रिटर्न की मिठाई खिलाएगा तो माफी मिलेगी और सबके समवेत ठहाके से वह पुश्तैनी घर गूँज गया।

सोमवार, 27 जून 2022

सुनहरे बूटों वाला नीला बक्सा

 दीपावली की सफाई करते हुए मीता के हाथ में अलमारी के ऊपर वाले खाने में रखा वह बक्सा आ गया। गहरे नीले रंग के उस छोटे से बक्से पर बने सुनहरी बूटे उसमें लगा छोटा सा कुंदा और उसमें लटकता पीतल का छोटा सा ताला मानो उसे मुंह चढ़ा रहे थे। पंद्रह साल हो गए हैं उसकी शादी को पंद्रह दीपावली गुजर गई हर साल वह बक्सा उसके हाथ आता है और हर बार वह उस पर हाथ फिरा कर उसके ताले को एक दो बार खींचकर कपड़े से उसकी धूल झाड़ पोंछकर वापस रख देती है। शादी के शुरुआती सालों में उस बक्से के प्रति उसकी उत्सुकता चरम पर रहती थी। वह प्रदीप से पूछती थी जिद भी करती थी कि एक बार वह बक्सा खोल कर बताएं उसमें क्या है ? प्रदीप हमेशा बात को टाल देता तुम्हारे काम की कोई चीज नहीं है बस ऐसे ही है उस पर ध्यान मत दो उसके ऊपर कपड़े रख दो फिर वह तुम्हें दिखेगा ही नहीं जैसी बातें हमेशा सुनती और उसके दिल में एक संशय भर आता। वह सोचती ऐसा क्या है प्रदीप के जीवन में जो वह उससे छुपा रहा है ? शादी के बाद प्रदीप ने उसे अपने जीवन से जुड़ी हर घटना बताई थी। उसकी जिंदगी में आए हर व्यक्ति घटना बदलाव के बारे में जानती थी। नहीं जानती थी तो बस उस नीले बक्से का राज जिस पर पंद्रह सालों से ताला लगा था। 

शादी के आठ साल बाद जब वह दो प्यारे बच्चों की मां बन चुकी थी उसने एक बार बड़े ठुनकते हुए प्रदीप से पूछा था  कि आखिर उसमें ऐसा क्या है ? और प्रदीप ने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भरते हुए उसकी आंखों में झांकते हुए बड़े प्यार से कहा था मीता मेरा विश्वास करो उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो मेरी जिंदगी में तुम्हारे स्थान को रत्ती भर भी कम करता हो। लेकिन वह जो भी है उसे मैं खुद से अलग नहीं करना चाहता इसलिए उसे अलमारी के एक कोने में जगह दे दो प्लीज। अगर तुम्हें मेरे प्यार पर मुझ पर भरोसा है तो बार-बार इस बक्से को लेकर कोई संशय अपने दिल में मत लाओ बस उसे ऐसे ही रखा रहने दो। प्रदीप के स्वर की संजीदगी और आंखों की तरलता ने उसे द्रवित कर दिया उसके बाद उसने कभी नहीं पूछा कि उस बक्से में क्या है ? इतनी प्यारी गृहस्थी है उसकी टूट कर प्यार करने वाला पति दो प्यारे बच्चे प्रदीप की अच्छी नौकरी किसी चीज की कोई कमी नहीं है। जीवन से मिली संतुष्टि उसके और प्रदीप दोनों की आंखों में दमकती है फिर एक छोटे से बक्से में दफन अतीत के किसी टुकड़े के लिए अपना सुख चैन खोना कोई समझदारी नहीं है। वह बक्से को झाड़ पोंछकर वापस रख देती फिर भी एक बार उसका हाथ उस पर अटकता जरूर। 

खुशियों के दिन पंख लगाकर उड़ते हैं उसके दिन भी कब कैसे गुजरते गए पता ना चला। बच्चों की शादी हो गई वे अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए। प्रदीप और मीता जीवन संध्या में एक दूसरे का हाथ कसकर थामें धीमे-धीमे आगे बढ़ रहे थे। वह दीपावली कुछ उदासी थी बेटी ससुराल में और बेटा सात समंदर पार था। मीता थोड़ा थोड़ा सफाई का काम निपटाती प्रदीप उसकी मदद करता। अलमारी के ऊपरी खाने से वह बक्सा आज प्रदीप ने निकाला। बक्सा हाथ में लेकर वह थम सा गया उसने हौले से उसे सहलाया। उसकी आंखें सजल हो गईं। पास खड़ी मीता उसे अपलक देख रही थी। इतने सालों में बक्से के प्रति उसकी उत्सुकता पूरी तरह बुझ चुकी थी। प्रदीप ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिया। मीता का हाथ पकड़कर उसने उसे तकिए का सहारा देकर बैठा दिया और खुद उसके सामने बैठ गया। वह सुनहरे बेल बूटे वाला गहरा नीला बक्सा उन दोनों के बीच रखा था। मीता का हाथ अपने हाथ में लेकर प्रदीप ने उससे पूछा सच-सच बताना मीता मुझसे शादी करके तुम्हें जीवन में कभी कोई पछतावा तो नहीं हुआ तुम खुश तो हो न ? तुमने जीवन में जो चाहा था वह सब मैं तुम्हें दे पाया न ? मीता हतप्रभ रह गई आज आपको क्या हो गया है ? इतने सालों में उसने कभी कोई शिकायत नहीं की। कभी अवसर आया तो तारीफ ही की थी। फिर प्रदीप यह सब क्यों पूछ रहे हैं ? वह आज इस बक्से को देखकर प्रदीप के यूँ भावुक होने की वजह नहीं समझ पाई। 

तुम हमेशा जानना चाहती थी न कि इस बक्से में क्या है ? आज मैं भी जानना चाहता हूँ कि तुमने कभी कोई शिकायत नहीं की लेकिन तुम खुश तो हो न ? 

क्या है इसमें मीता ने कांपते स्वर में पूछा। 

प्रदीप उठकर कमरे से बाहर गए लौटे तो उनके हाथ में एक प्लायर था। उन्होंने झटका देकर ताला तोड़ा और धीरे से बक्सा खोल दिया। बक्सा खुलते ही उसमें कैद गुलाब की खुशबू कमरे में फैल गई और उसमें रखे कुछ खत फड़फड़ा उठे। मीता का दिल धक से हो गया उम्र के इस पड़ाव पर भी वह प्रदीप के जीवन में किसी और के होने के विचार से ही कांप गई। 

जानती हो मीता यह सारे खत मैंने तुम्हें लिखे थे। 

मुझे बुरी तरह चौंक गई वह कब क्यों फिर आपने मुझे भेजें क्यों नहीं ? 

भेजने का मौका ही नहीं मिला। जानती हो जब भी मैं मामा के यहां आता था और तुम्हारी सौतेली माँ को तुम पर अत्याचार करते देखता था तो मुझे बहुत गुस्सा आता था।

 अपने जीवन के उन दुख मय दिनों को याद कर नीता की आंखें भर आई। सोलह बरस की थी वह जब उसके जीवन में सौतेली मां रूपी अभिशाप आया था। घर के सभी काम करना आधे पेट खाना फटे पुराने कपड़े पहनना और दिनभर जली कटी सुनना। उन्हीं दिनों प्रदीप को कई बार अपने को देखता पाया था लेकिन सौतेली माँ का खौफ इस कदर हावी रहता था कि कभी कोई और विचार दिल में आता ही नहीं था। लेकिन प्रदीप ने खत क्यों लिखें ? 

जानती हो तभी मेरा मन होता था कि तुम्हें वहाँ से भगा ले जाऊं। तुम्हारी सौतेली माँ और सभी दुखों से दूर। मामा के यहाँ रहते तुम से बात करने की बड़ी इच्छा रहती लेकिन कभी हिम्मत ही नहीं हुई। वहाँ से लौटकर तुम्हें खत लिखता था तुम्हें हिम्मत दिलाते तुम्हें अच्छे भविष्य के सपने दिखाते खत। ऐसी दुनिया में ले जाने की आशा जगाना चाहता था जहाँ कोई दुख ना हो। लेकिन डरता था कहीं यह खत किसी के हाथ पड़ गए तो मेरा तो कुछ नहीं होगा लेकिन तुम्हारी नर्क सी जिंदगी में और जहर घुल जाएगा। मीता डबडबाई आंखों से प्रदीप को देखती रही शब्द उसके आंसुओं में घुल गए थे। होंठ कंपकंपा कर रह गए। उसे याद आया जिस दिन प्रदीप का रिश्ता आया था सौतेली माँ ने कितना हंगामा मचाया था। उसके चरित्र को लेकर कितना कीचड़ उछाला था। पाँच साल से सौतेली मां के हर अत्याचार को चुपचाप सहने वाली मीता उस दिन फूट फूट कर रोई थी। उसे समझ ही नहीं आया था कि साधारण परिस्थिति की बिना माँ की बेटी के लिए प्रदीप जैसे संपन्न सुदर्शन युवक का रिश्ता कैसे आ सकता है ? 

तो आपने मुझ पर तरस खाकर यह रिश्ता किया था ? डबडबाई आंखों में संशय उभर आया। 

प्रदीप ने एक बार उन में डूब कर देखा और उन खतों में से ढूंढ कर एक खत उसकी तरफ बढ़ा दिया। मीता ने कांपते हाथों से उसे थाम कर पढ़ना शुरू किया। 

प्रिय मीता 

हैप्पी बर्थडे। कितना अच्छा इत्तेफाक है ना कि आज तुम्हारे जन्मदिन के दिन मेरा गांव आना हुआ। आज सुबह जब तुम मौसी के साथ मंदिर से लौट रही थी तुमने सफेद चूड़ीदार कुर्ते पर सतरंगी लहरिया चुन्नी पहनी थी जो हवा में लहराते तुम्हारे बालों के साथ उड़ रही थी तभी तुमने मेरे दिल में घर बना लिया था। मौसी के साथ हंसती खिलखिलाती कानों में झुमके और हाथों में चूड़ियां खनकाती तुम मेरी नजरों में बस गई हो। मीता मेरा वादा है तुमसे एक दिन खुद को इस लायक बनाऊंगा कि तुम्हें मेरी जिंदगी में शामिल करने के लिए मौसी से तुम्हें मांग सकूँ। तुम यूँ ही खिलखिलाते रहो। 

तुम्हारा प्रदीप

पहली बार तुम्हें खत लिखा था और आखरी बार था जब मैंने तुम्हें हंसते हुए देखा था। इन खतों में वे सभी वादे हैं जो मैंने खुद से किए थे तुम्हें खुश रखने के लिए। लेकिन इन्हें बक्से में इसलिए बंद कर दिया था ताकि तुम उन दुखी दिनों को कभी याद न करो। इन खतों के बहाने भी नहीं। 

मीता की आंखों से प्रेम छलक आया। उसने उन खतों को ठीक से जमा कर बक्से को बंद कर दिया। मैं तुम्हारा साथ पाकर उन दिनों को कब से भूल चुकी हूँ। अब इन्हें कभी बाहर मत निकालना लेकिन यह पहला खत तुम्हारे प्रेम की पहली निशानी मेरी मां की आखिरी याद मैं अपने पास रखना चाहती हूं अगर तुम्हें एतराज ना हो तो। 

खत तो तुम्हारा ही है मेरी इजाजत की क्या जरूरत कहते हुए प्रदीप ने बक्सा बंद कर वापस अलमारी के ऊपर के खाने में रख दिया।

बुधवार, 22 जून 2022

आवाज

 

आवाज 
कॉलोनी के अभिजात्य सन्नाटे को चीरती वह आवाज सूनी सड़कों पर दौड़ रही थी। सभी  घरों के दरवाजे खिड़की किसी आवारा हवा धूल इंसान और आवाज को घर में घुसने से रोकने के लिए कसकर बंद थे। न जाने क्यों और कैसे उस घर के ऊपरी कमरे की एक खिड़की खुली थी और वह आवाज उसमें बेधड़क घुस गई। जिसे सुनते ही वह किताब छोड़कर खिड़की पर आ गई ताकि बिना किसी टूट-फूट के उस आवाज को पकड़ सके। सबसे पहले उसने आवाज पहचानने की कोशिश की यह वही आवाज है इसका यकीन होते ही उसमें से शब्दों को चुनने लगी। शब्द भी लगभग जाने पहचाने थे नालायक, मक्कार, आलसी, कोशिश, कमी, जमाना, उसने गहरी सांस ली। हर बार वही शब्द वही बातें। वह खिड़की से हटकर कमरे में चहलकदमी करने लगी। पढ़ने से मन हट गया बीच-बीच में वह खिड़की से झांक लेती। उसकी नजर सामने के मकान की छत पर जाकर अटक जाती वहाँ कोई नहीं था। उसने एक बार झांक कर नीचे सड़क पर देखा वह भी सुनसान पड़ी थी। वह हाथ में पकड़ी पेंसिल को उंगलियों के बीच घुमाने लगी। खिड़की से बाहर झांकना जारी था तभी सामने छत पर एक परछाई सी दिखी। वह पेंसिल बिस्तर पर फेंक तेजी से छत की ओर भागी। परछत्ती का दरवाजा खोल उसने देखा वह अपनी छत पर परछत्ती की दीवार से टिका उदास खड़ा था। न जाने उसने आहट सुनी या उसे आभास हुआ उसने मुड़कर डबडबाई आंखों से उसकी तरफ देखा वह करुणा से भर उठी। उसी क्षण उसे उस आवाज़ के मालिक पर बेहतर  क्रोध भी आया। उन डबडबाई आंखों के आंसू पोंछने को वह तत्पर हो उठी लेकिन लोक लिहाज ने उसकी आवाज को रोक लिया। उसने हाथ के इशारे से पूछा क्या हुआ? सामने से एक इशारा प्रत्युत्तर में आया जो अस्पष्ट था लेकिन वह समझ गई थी। उसके चेहरे पर करुणा के भाव सघन हो गए जिसने डबडबाई आंखों के आंसुओं को जज्ब कर लिया। 
दोनों करीब पंद्रह मिनट तक छत पर खड़े एक दूसरे को देखते रहे। शब्द इस छत से उस छत पर नहीं जा सकते थे। उनके बीच में सड़क पर गिर जाने या किसी और से टकरा जाने का डर था लेकिन संवेदना बिना किसी डर के वहाँ पहुंच रही थी और उसके चेहरे से दुख अपमान उपेक्षा को पोंछकर उसे सामान्य कर रही थीं। तभी इस या उस घर से एक आवाज आई और एक दूसरे को हाथ हिलाकर होठों में बाय कहते दोनों नीचे उतर गए। 
पिछले डेढ़ महीने से जब से तनु हॉस्टल से अपने घर आई है यह सिलसिला यूं ही चल रहा है। वह एम ए का इम्तिहान दे चुकी है। अधिकतर हॉस्टल में रहते वह अड़ोस पड़ोस की ज्यादा जानकारी नहीं रखती लेकिन इतना जान गई है कि सामने वाले घर में रहने वाला अंकुर बी काॅम करने के बाद बेरोजगार है और उसके पापा का उसे आईएएस फिर सीए बनाने का सपना पूरा नहीं कर सकता क्योंकि उसे वह नहीं करना और इसलिए उनकी हताशा यूँ शब्द रूप में सारे बंध तोड़ निकल जाती है। उन्हें अंकुर का किसी से मेलजोल भी पसंद नहीं है इसलिए कोई चाह कर भी उनकी मदद नहीं कर सकता या शायद किसी को पता ही नहीं है कि उन्हें किसी मदद की जरूरत है। 
उस दिन असंयमित शब्दों ने सारी सीमा लांघ दी। तनु छत पर आई उसने इशारा किया और गाड़ी निकालकर गेट के बाहर निकल गई। न जाने कैसा विश्वास कायम हो गया था दोनों के बीच कि पीछे से आती आवाजों को अनसुना कर अंकुर भी उस दिन घर से निकल गया। सड़क के मोड़ पर खड़ी तनु ने साइड मिरर में उसे आते देख गाड़ी बढ़ा दी और उसका पीछा करते-करते वह उस कॉफी हाउस के सामने पहुंच गया। टेबल पर बैठते ही तनु ने पूछा क्या खाओगे? 
कुछ नहीं उसने झिझकते हुए जवाब दिया। दो कॉफी ऑर्डर करके तनु ने पूछा तुम क्या करना चाहते हो? 
बेहद अप्रत्याशित प्रश्न था यह। अभी तक कभी किसी ने उससे कभी नहीं पूछा था कि वह क्या करना चाहता है? उसे तो हमेशा यह बताया गया कि उसे क्या करना है, उससे क्या अपेक्षाएं हैं, क्या आशाएं हैं? वह आंसुओं में डूबता उसके पहले ही काफी की तेज मीठी महकती भाप ने उसे रोक लिया। एक बड़े अधिकारी का सामान्य बेटा जो कभी एवरेज नंबर से ऊपर नहीं उठ सका घरवालों के विरोध के बावजूद कॉमर्स ले बैठा और पहले उनके आईएएस बनने के सपने को तोड़ा फिर सीए बनने की आशा पर तुषारा पात किया। एक साधारण नौकरी मखमल से उनके स्टेटस पर टाट के पैबंद सी होगी इसलिए रोज शब्दों के गंगाजल से उस पैबंद को धोकर मखमल में बदलने की कोशिश की जाती है।
तनु ने अपनी स्नेह और सांत्वना भरी हथेली उसके ठंडे निराश हाथ पर रख दी। अंकुर को ऐसा लगा मानो डूबते हुए किसी मजबूत हाथ ने उसे थाम लिया। ढेर सारी बातें हुई वह क्या कर सकता है कैसे करना है कैसे सामना करेगा वगैरा-वगैरा? कॉफी खत्म होने के बाद डोसा, कोल्ड ड्रिंक, और फिर कॉफी ऑर्डर हो गई और अंकुर में नए आत्मविश्वास का संचार होता गया। उसकी आंखों में चमक आ गई, चेहरे पर खुशी छा गई, दिल में हौसला बढ़ता गया। आपने मेरे लिए... शब्द बीच में ही रुक गए तनु का हाथ रुकने का इशारा करता खड़ा था वह धीरे से मुस्कुरा दिया। 

अगले दस दिन रोज वही आवाज आवारा सड़कों पर घूमती ऊपरी कमरे की खुली खिड़की से अंदर जाती लेकिन अब तनु किताब पढ़ते हुए बस मुस्कुरा देती। अब वह परछत्ती के उस कमरे की तरफ न दौड़ती न ही बेचैनी से खिड़की पर खड़ी होकर किसी परछाई का इंतजार करती। सामने वाले घर की छत का दरवाजा भी अब बंद ही रहता। परछत्ती की दीवार के सहारे की अब किसी को जरूरत न रही। आवारा आवाज गलियों में भटकती गुम हो जाती। उस दिन अलसुबह वह आवाज अपनी ताकत भर चीखी। आज वह हर घर में दाखिल हो सबको बाहर बुला लाई। अंकुर घर छोड़कर चला गया यह खबर फुसफुसाहटों में गलियों में दौड़ी। सब कयास लगाने लगे चर्चा सांत्वना जोर पकड़ने लगी। तनु इत्मीनान से कमरे में किताब लेकर बैठी थी वह जानती थी अंकुर अपने आत्मविश्वास के साथ सुरक्षित है। और रोज गलियों में भटकती वह आवाज अब दम तोड़ चुकी है।
कविता वर्मा


शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

सामराज

सड़क के मोड़ पर उस पेड़ के नीचे फिर मेरी अभ्यस्त नज़र चली गई और उसे वहाँ ना देख अनायास पैर पर जोर पड़ा और बाइक को ब्रेक लग गया। ऐसा तो पिछले चार महीनों में कभी नहीं हुआ था जो मैंने आज देखा। हैरानी तो हुई ही नज़रें उसे आसपास ढूंढने लगीं। पीछे मुड़ कर पेड़ों की कतार के नीचे पड़ी लंबी छाँव में भी उसे ढूँढ लिया लेकिन वह नज़र नहीं आई और तभी मेरी बाइक के पीछे रुकी बाइक वाले पर मेरी नज़र पड़ी। वह अचानक रास्ता रुक जाने से पूरी ताकत से हॉर्न बजाते हुए बड़बड़ा रहा था। मैं तो उसकी खोज में ऐसा खो गया कि न हॉर्न सुन पाया और ना ही यह समझ पाया कि एक व्यस्त सड़क पर व्यस्त समय में रास्ता रोके खड़ा हूँ। मैंने रुकी पड़ी बाइक को फिर गति दी और अब आँखें सड़क के साथ साथ सड़क के किनारे पेड़ों के नीचे उसे ढूँढ रही थीं। जब लगभग एक डेढ़ किलोमीटर आगे पहुँच गया तब चौराहे की लाल बत्ती से मेरी तन्द्रा टूटी। ओह मैं अब तक उसे क्यों ढूँढ रहा हूँ ? वह इतनी दूर कैसे आयेगी ? पिछले चार महीने से मैंने कभी उसे सौ दो सौ मीटर से ज्यादा आगे जाते नहीं देखा। 

चार महीने पहले की बात है जब ऑफिस के लिए जाते हुए इस व्यस्त एम जी रोड के उस मोड़ पर सड़क के किनारे मैंने उस बूढ़ी औरत को अकेले बैठे देखा था। मोड़ पर गाड़ी धीमी होते ही मेरा ध्यान उस पर गया। खिचड़ी बाल गढ्ढे में धंसी गोल गोल आँखें पोपला मुँह। उम्र के हर पड़ाव पर घिसते घिसते हड्डियों का कंकाल सा रह गया शरीर, अनुभवों और शायद जीवन की तल्खियों का बोझ उठाती झुकी कमर, मैली तार तार होती साड़ी जो शायद कभी हल्की पीली या गुलाबी या किसी और रंग की रही होगी , पैरों में दो अलग अलग तरह की बड़ी बड़ी चप्पलें। मुँह में अपने साथी दाँतों के ना रहने से उपजे खालीपन का लगातार एहसास करती घूमती जीभ उसकी तरफ देखने पर सारा ध्यान खुद की ओर खींच लेती थी। उस दिन भी मैंने अनायास ब्रेक लगा दिया था और कौतूहल से उसकी ओर देखा था। नज़रें मिलते ही वह भोलेपन से मुस्कुरा दी। इतना भोलापन था उस मुस्कान में कि प्रत्युत्तर में मैं मुस्कुराये बिना न रह सका। उस दिन तो आगे बढ़ गया लेकिन बिना ध्यान दिये भी जो बातें ध्यान में आ गईं वे दिमाग में चलती रहीं। वह इतनी बूढी औरत वहाँ बिलकुल अकेली थी उसके आसपास कोई नज़र नहीं आया। क्या पता वह कहीं जा रही होगी चलते चलते थक गई तो सुस्ताने बैठ गई। उसका चलता हुआ पोपला मुँह शायद उसके हाँफने की निशानी हो। उसे देखकर तो ऐसा ही लगा जैसे कि जिंदगी का सफर तय करते करते भी थक गई है लेकिन इस सफर में सुस्ताना कैसा यहाँ तो परम आराम ही रुकने का कारण बनता है। खैर जो भी हो वह जिस तरह वहाँ बैठी थी अकेली निस्सार निसंकोच उससे उसकी तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक था। उसके बाद ऑफिस के कामों की व्यस्तताओं ने उसे मेरे दिमाग से निकाल दिया। 

उस शाम सड़क के दूसरी ओर से गुजरते हुए भी वह बुढ़िया मेरे ध्यान में नहीं आई।  हाँ दूसरे दिन ऑफिस जाते हुए घर के सामने ही एक बूढ़े भिखारी को भीख माँगते देखा तो उसका ख्याल आया और मैंने अपनी ही बेवकूफी पर खुद को झिड़का। वह क्या अब तक वहाँ बैठी होगी ? कहीं जाते हुए रास्ते में रुकी होगी थोड़ी देर सुस्ताकर चली गई होगी। उसकी वह भोली मुस्कान एक और बार देखने की आस जरूर थी। 
सड़क के मोड़ पर गाड़ी धीमी होते ही नज़रें उसे ढूँढने लगीं। वह उकडू बैठी थी और आँचल सिर पर रखते हुए उसका फटा हिस्सा सिर पर आ गया था जिसे दोनों हाथों से उठाये उसके बीच से आसमान देखते हुए या शायद उसकी मरम्मत तुरपन करने की सम्भावना खोजते वह जिस तरह गर्दन घुमा घुमा कर उस फटे आँचल को देख रही थी मुझे हँसी आ गई। शुक्र था उसने मुझे नहीं देखा था। आगे बढ़ते ही मुझे दूसरी चिंता ने घेर लिया। क्या वह बुढ़िया रात भर यहीं रही थी सड़क किनारे ? कहाँ सोई होगी इसके पास तो बिस्तर चादर कुछ नहीं हैं ? क्या खाया होगा लगता तो नहीं है इसके पास पैसे होंगे ? इसके पास तो पानी पीने तक की व्यवस्था नहीं दिखती। यह आई कहाँ से इसके परिवार वाले कहाँ हैं ?कहीं यह उनसे बिछड़ तो नहीं गई ?कहीं उन्होंने इसे घर से निकाल तो नहीं दिया ? आजकल बुजुर्गों के साथ परिवार में जिस तरह से व्यवहार होता है सब संभव है। उसके मैले फटे कपडे देख कर तो ऐसा लग रहा है जैसे वह कई दिनों से बिना घरद्वार के सड़क पर ही रह रही है। गाड़ी चलाते हुए मैं लगातार उसके बारे में सोचता या यह कहूँ मोड़ पर गाड़ी धीमी होते ही वह मेरे साथ हो जाती और ऑफिस तक साथ जाती। ऑफिस की व्यस्तता में वह मुझे छोड़ वापस सड़क के उस मोड़ पर जा बैठती शायद और किन्ही लोगो का ध्यान खींचती या शायद उनमें से किसी के साथ हो लेती। उससे पूछना तो बहुत कुछ चाहता था पर घडी की भागती सुइयाँ मुझे थमने नहीं देतीं और उसके ख्याल दिमाग में रुकते नहीं थे। रोज़ सोचता कि घर से कोई पुराना कम्बल चादर ला कर उसे दे दूँगा लेकिन शाम को सड़क के उस पार से निकलते वह बुढ़िया इस पार ही रह जाती। नज़र तो तब जाती जब उसका ख्याल आता और ख्याल नहीं आता इसलिए अपना निश्चय भी भूल जाता। 

अभी मार्च ख़त्म नहीं हुआ था हवा में ठंडक थी और रात में खुले में सोने पर अच्छी खासी ठण्ड लगती होगी। वह बुढ़िया सड़क किनारे फटी साड़ी में कैसे रात गुजारती होगी यह सोच कर मेरा मन आत्मग्लानि से भर जाता। एक दिन ऑफिस पहुँचते ही पत्नी को फोन करके एक चादर और शाल निकाल कर रखने को कहा ताकि दूसरे दिन उसे याद से दे दूँ। अगले दिन जब उसे चादर और शाल दी प्रत्युत्तर में उसने दोनों हाथ उठा कर वही भोली मुस्कान दी तो बड़ा सुकून मिला मुझे। 

यह रोज़ का क्रम हो गया सड़क के मोड़ पर गाड़ी धीमी कर मैं एक नज़र उस पर डाल ही लेता वह कभी देखती कभी नहीं। कुछ ही दिनों में पेड़ के नीचे पुराने कपड़ों में बंधी दो तीन पोटलियाँ दिखीं। उनमे क्या था यह तो नहीं पता लेकिन धीरे धीरे उन पोटलियों की संख्या बढ़ती गई फटे पुराने कपड़ों में बंधी लाल नीली पीली छोटी छोटी पोटलियाँ कचरे से बीने गए कपड़ों में ही बंधी थीं। कुछ सामान खुले में पड़ा होता था जिसमे टूटे कप, प्लास्टिक की बोतल चूड़ियाँ कंघियाँ कार्ड बोर्ड के कुछ खाली डब्बे प्लेट चम्मच जूट की बोरी कुछ डोरियाँ अलग अलग तरह की चप्पलें चादर शाल और एक पुराना तकिया। पोटलियों में शायद कुछ कपडे थे। वह अपने सामान की देखभाल में लगी रहती कभी उसे पेड़ के बिलकुल पास रखती तो कभी खुद पेड़ के पास बैठ सामान अपने चारों ओर रख लेती। पता नहीं उसमें से कितना सामान वह उपयोग करती होगी। जाने वह उपयोग करने लायक था भी या नहीं लेकिन उसका उस सामान के प्रति अनुराग साफ़ साफ़ दिखता था। एक दिन वह दूसरी साड़ी में दिखी शायद किसी ने दी हो। 

जैसे जैसे दिन बीतते जा रहे थे उसका साम्राज्य फैलता जा रहा था। वह महीने भर से सड़क के मोड़ पर उस पेड़ के नीचे डटी हुई थी। दिन में शायद कहीं खाना माँगने जाती हो या कचरे के ढेर से सामान बीनती हो। आते जाते लोग शायद उसे कुछ पैसे देते हों मैंने तो उसे कभी पैसे नहीं दिये। कभी उसके आसपास किसी को  देखा भी नहीं इसलिए यह अंदाज़ा भी नहीं लगा पाया कि उसके परिवार में और लोग हैं भी या नहीं वे भी कहीं भीख माँगते हैं या कुछ और करते हैं। 

दिन की धूप तीखी होने लगी थी लेकिन उस बुढ़िया के जमा किये सामान के साथ उसकी जिंदगी कुछ आसान लगने लगी थी। बुढ़ापे में सामान इकठ्ठा करने के उसके शौक से मुझे कई बार अचरज भी होता। उम्र के इस पड़ाव पर जब व्यक्ति विरक्ति की ओर बढ़ता है उस बुढ़िया की आसक्ति हैरान करती खास कर तब जब उसके आगे पीछे कोई नहीं दिखता था। कभी लगता वह शायद कुछ विक्षिप्त है किसी मानसिक आघात ने उसे सही गलत के ज्ञान से वंचित कर दिया है लेकिन उस दिन उसका सामान एक घने पेड़ के नीचे रखा देखा। बाँस की दो खपच्चियों के सहारे उसने एक ओर से आड़ बना ली थी और इसलिए उसके विक्षिप्त होने की संभावना भी ख़त्म हो गई। 

मेरे मन में उससे बात करने की तीव्र इच्छा होती। उसकी मनस्थिति को जानने समझने की उत्कंठा होती। उसके लिए कुछ करने का विचार भी सिर उठाता पर सुबह की हड़बड़ी और शाम को भारी ट्रैफिक के बीच सड़क पार करने की दुश्वारियाँ रोक लेतीं। फिर मैं कोई विक्षिप्त भी तो नहीं था जो यूँ एक बुढ़िया के लिये अपने जरूरी काम छोड़ कर इतनी मुश्किलें उठाता। चादर शॉल देने जैसे आसान काम करके भी जब संतुष्टि पाई जा सकती है फिर इतनी मशक्कत कौन करे ? 
उस दिन इतवार था मुझे किसी से मिलने जाने के लिए एम जी रोड से ही गुजरना था। सड़क के मोड़ पर बुढ़िया को देखते ही मैंने बाइक के पूरे ब्रेक लगा दिए। चर्र की आवाज़ के साथ बाइक रुकी। छुट्टी के कारण सड़क पर ट्रैफिक कम था पीछे से किसी ने हॉर्न नहीं बजाया। बुढ़िया सामान की साज संभाल में व्यस्त थी गाड़ी की आवाज़ पर भी उसने मुड़ कर नहीं देखा मैं उसकी एकाग्रता देख कर दंग रह गया। गाड़ी किनारे लगाकर मैं उसके समीप पहुँचा और उसे आवाज़ दी अम्मा अम्मा। बुढ़िया जिस झटके से मुड़ी एक बारगी डर ही गया लगा सच में यह पागल है और कहीं कोई सामान या पत्थर उठाकर मार न दे। मैं दो कदम पीछे हट गया डर के कारण दोनों हाथ उठकर चेहरे के सामने आ गये। उसने झुककर मेरे हाथों के नीचे से मुझे देखा और वही भोली मुस्कान उसके चेहरे पर प्रकट हुई जिसने मुझे राहत पहुँचाई। हाथ नीचे करते करते खुद पर हँसी भी आई यह बुढ़िया महीनों से सड़क पर रह रही है बिना किसी से डरे कि कोई उसे चोट या नुकसान पहुँचा सकता है और मैं उसके पलटने से डर गया। यह डर किस चीज़ का था या उसे किस चीज़ के ना होने के कारण कोई डर नहीं है ? खैर यह गंभीर चिंतन का विषय था जिसके लिये वह समय मुफीद न था और न ही रविवार का वह दिन। 

बुढ़िया बोरे पर बैठ गई  और मुझे भी बैठने का इशारा किया। इतनी सरलता मुझमे नहीं थी मैं वहीँ पंजों के बल उकडू बैठ गया और हाथों के इशारे से खुद के ठीक होने का आश्वासन दिया। एक नज़र उसके सामान पर डाली और उससे पूछा "कैसी हो अम्मा ?" 
"ठीक हूँ " धीमी आवाज़ और  मुस्कान के साथ जवाब मिला। 
" यहाँ अकेली हो तुम्हारा परिवार कहाँ है?  कहाँ से आई हो?" मेरी बात सुनकर उसकी मुस्कान तिरोहित हो गई। कुछ देर वह खोई खोई नज़रों से अपने सामान को देखती रही कुछ ना बोली। मैंने फिर पुकारा "अम्मा क्या हुआ बताओ ना तुम्हारा परिवार कहाँ है ?" 
दुःख क्रोध क्षोभ चेहरे की सलवटों के ऊपर उभर आये , होंठ फड़फड़ाने लगे आँखें भर आईं उसने हाथ झटका और किसी के ना होने का इशारा किया। 
"कोई तो होगा अम्मा बेटा बेटी बहू पोता पोती क्या हुआ कहाँ हैं सब ?"
बुढ़िया बैचेनी से यहाँ वहाँ देखने लगी पानी की बोतल पर उसकी नज़र टिकी लेकिन वह उससे दूर रखी थी। मैंने हाथ बढ़ा कर बोतल उसे पकड़ा दी। दो घूँट पानी पीकर उसने खुद को संभाला। मेरी आँखों में मेरा प्रश्न अभी भी मौजूद था जिसे देख पहले तो वह सिर झुका कर जमीन को तकने लगी फिर धीरे धीरे बोलना शुरू किया। 
बेटा हम बहुत बड़े ठाकुर परिवार के  हैं भोत बड़ी जमीन जायदाद रही हमाई। भोत बड़ो परिवार हतो तीन बेटा बहुएँ नाती नता। हमाए ठाकुर बड़े भले मानस रहे गरीबन की जी खोल के मदद करत रहे। उनके जावे के बाद हमसे जो कछु बन पडत थो हम कर देत थे। बस जई सोचत थे कि हमरी ड्योढ़ से कोई खाली हाथ न जाये। पर बेटा जो समय को चक्कर ना कभी उलटो भी घूम जाए है। हमरे बेटा बहुअन को जा बात पसंद ना हती। पहले तो बे हमें मना करत रहे हमने भी उनकी बात रखबे खातिर थोड़ो हाथ तो खींच लओ थो पर बेटा कभी कभी जब कोई भोतइ मजबूर मनक बड़ी आस ले कर आ जाये बा से कैसे मना कर सकत थे। हम अपने गहना गरुआ में से कछु दे देत थे। ठाकुर हवेली से मजबूर इंसान खाली हाथ जाये तो हवेली की सान घटत है। पर बेटा उन लोगन को जो भी पसंद नहीं आओ और एक दिना कहते हुए बुढ़िया चुप हो गई एक घुटी सी सिसकी बोल पड़ी। 
"और क्या अम्मा क्या हुआ ?" मैंने व्यग्रता से पूछा। 
बुढ़िया की सूनी आँखों से आँसुओं के रेले बह निकले "और बेटा एक लंबी सिसकी के बाद वह बोली "एक दिना आधी रात के बड़ो बेटा अपनी मोटर गाड़ी में हमें बैठार के इस गाँव में हमें छोड़ गओ। जो कौन गाँव है बेटा हमें तो जा भी नहीं पता। कछु दिना हम इते उते घूमत रहे लोगन से हमाए घर पहुचाने की कहत रहे फिर सोची उते पहुँच कर भी का हुए ? बे ओरें फिर हमें बाहर निकार दियें जैसे अब हम बेटा जहिं के हो गए। पास की बस्ती में दो चार घर हैं भले लोग हैं बेचारे कोई ना कोई कछु दे देत है। हमरो खाबो कित्तो सो है बेटा, एक रोटी और तनक सी सब्जी तो खातई हैं।"  कह कर बुढ़िया चुप हो गई। 
"अम्मा तुम पुलिस के पास क्यों नहीं जातीं वो तुम्हारे बेटों से कहेगी तुम्हे रखें। कौन गाँव की हो गाँव का नाम पता है ?" 
"नहीं बेटा अब वापस उते नई जाने। हमाओ का हतो उते जो थो सो ठाकुर साब को उनके बाद उनके लड़को को । 
"अम्मा कितनी तेज़ गर्मी पड़ रही है फिर बरसात आ जाएगी यहाँ खुले में कैसे रहोगी ?" मैंने भविष्य की चिंता जता कर उससे कहा। 
"तब की तब देखी जैहे बेटा। हम का जानत थे के एक दिन सड़क पर रहना पड़ेगा। " 
मैं निरुत्तर था उसका मन अब बेटे बहुओं घर परिवार से हट गया था। वह यहाँ सुकून से थी क्या हुआ जो चार दीवार और छत नहीं थी। 
"अम्मा यह सामान क्यों इकठ्ठा किया है ये कोई काम आता है क्या ?मैंने टूटे कप कंघी बोतल को देखते हुए कहा। अम्मा के पोपले मुँह पर फिर भोली मुस्कान बिखर गई। " जे सब हमरी जमा पूँजी है। लड़कों ने हमें उस सामराज से निकार दओ पर जब हम मरेंगे तब अपनों सामराज छोड़ जैहें । तुमार लाने जो बेकार सामान हुईए पर जिनके पास जो भी नहीं है उनके लाने जो बड़ो कीमती है। कोई कछु माँगत है तो जई में से दे देत हैं हम ठकुराइन हैं बेटा अपने पीछे गरीबन के लाने कछु छोड़ कर जईहे।" बुढ़िया का स्वर गर्व से बुलंद हो गया। मैं कुछ कह नहीं सका खड़े होते होते मैंने सौ का नोट बोरी के नीचे दबा दिया। 
"अम्मा मैं यहाँ से रोज़ निकलता हूँ कभी किसी चीज़ की जरूरत हो तो बता देना। बुढ़िया ने निश्छल मुस्कान के साथ दोनों हाथ आशीष की मुद्रा में उठा दिए। 
अजीब मनस्थिति में मैं वहाँ से चला आया। तब से रोज़ ही उस बुढ़िया को देखता कभी कभी समय को रोक उसके पास रुक जाता था कभी कुछ फल खाना या कुछ पैसे दे देता था। 
आज उस बुढ़िया को वहाँ न देखकर बैचेनी होने लगी। उसका सामान वहीँ पेड़ के नीचे था मुझे लगा शायद आसपास कहीं गई होगी खाना लेने या कचरे से कुछ बीनने। समय भागा जा रहा था इसलिए मैं भी रुक न सका। 
अगले दिन फिर बुढ़िया दिखाई नहीं दी तभी नगर पालिका की कचरा गाड़ी वहाँ आकर रुकी और उसका सामान उठाकर गाड़ी में डालने लगी। मैं जैसे तिलमिला गया तुरंत बाइक किनारे लगाई और गाड़ी के पास पहुँचा। 
"भई क्यों ये सामान ले जा रहे हो यह उस बूढी अम्मा का है वह आसपास कहीं गई होगी अभी आ जाएगी। उसने बुढ़ापे में बड़ी मुश्किल से अपनी जरूरत का सामान इकठ्ठा किया है।"
सामान रखने वाले ने बड़ी लापरवाही से कहा "साब वो बुढ़िया तो परसों रात मर गई कल लावारिस लाश का क्रियाक्रम भी हो गया। अब ये सामान हटा कर कचरे में डाल देंगे जिसे जरूरत होगी ले जायेगा।" 
मेरी आँखें भर आई वह बुढ़िया चली गई तभी कचरा बीनने वाले दो लडके वहाँ आ गये उन्होंने बोरी उठाई उसके नीचे सौ का नोट और कुछ छोटे नोट थे उन्होंने वे जेब में ठूंस लिए और बुढ़िया के छोड़े साम्राज्य से अपनी जरूरत का सामान चुनने लगे। 
कविता वर्मा 

गुरुवार, 14 मई 2015

मंजिल



निर्णय तो कर लिया उसने और अपने निर्णय से बहुत उत्साहित भी थी वो।  ऐसे ही कुछ सपने तो थे उसके, जिन्हे पूरे करने का उत्साह जुटाती तो कभी उन्हें फ़िज़ूल कह कर खुद ही स्थगित कर देती। कभी खुद ही पछताती मौका पा कर भी चूक गई तो कभी सब पर झुंझलाती कि उनके कारण ही वह अपनी छोटी  ख्वाहिशें स्थगित करती रहती है या ऐसी उलझी रहती है कि अपने मन का कर ही नहीं पाती। कभी सोचती  घर में सब तो अपने मन की कर लेते हैं मैं ही क्यों इतना सोचती हूँ। आत्म मंथन की किसी घड़ी में वह पाती कि सपने देखना और बात है उन्हें पूरा करने के साधन जुटाना भी आसान है लेकिन उन्हें पूरा करने का हौसला जुटाना आसान नहीं है। इसलिए तो साधन सुविधा होते हुए भी बरसों से सपने स्थगित होते रहे हैं। 
आज उसने  निश्चय कर ही लिया अब ये करते और करने के बाद उसका दिल कितने ज़ोर से धड़क रहा है ये तो सिर्फ वही जानती है। वैसे वह चाहती भी नहीं है कि कोई और इस बात को जाने। ये तो सपनों की श्रृंखला की पहली कड़ी है और ऐसा भी नहीं है जाने कितनी छोटी मोटी ख्वाहिशें तो आये दिन पूरी होती रहती थी लेकिन उनके पूरे होने में कोई अड़चन नहीं थी किसी के न मानने  का डर नहीं था और खुद का हौसला जुटाने की मशक्कत नहीं थी। 
खैर नियत दिन , नियत समय जरूरी हिदायतों और तैयारियों के साथ वह निकल पड़ी अपना सपना पूरा करने। 
हवा पानी पेट्रोल सब चेक कर लिया एक छोटा बेग , जरूरी कपडे, पानी की बॉटल भी रख ली। निकलने के पहले भगवान से कृपा बनाये रखने का आशीर्वाद भी मांग लिया। शहर से बाहर निकल कर बायपास पर आते ही वह रोमांचित हो गई विश्वास हो गया कि उसका सपना पूरा होगा वह सपना पूरा करने की डगर पर नहीं नहीं हाइवे पर चल पड़ी है। यही तो सपना था उसका अकेले खुद ड्राइव करके लम्बा सफर तय करना। यूं तो कई बार इस रास्ते पर कार से सफर किया है अक्सर निखिल के साथ या फिर ड्राइवर गाड़ी लेकर आता और वह पिछली सीट पर बैठी गुजरते पहाड़ , पेड़, ट्रक, मोटर साइकिल देखते समय बिताती या ड्राइवर के पसंद के अस्सी के   दशक के ढिंगचक गाने सुन मन ही मन झुंझलाती। आज उसने चलने के पहले रेडियो चेक कर लिया था मोबाइल पर भी अपनी पसंद के पुराने गाने डाउन लोड कर लिए थे। 
कार के बंद शीशों के उस छोटे से संसार में वह ये मौसम रंगीन समां की स्वर लहरियों के संग बढ़ती चली जा रही थी। शहरी बायपास की चहल पहल अब पीछे छूट गई थी। सड़क के दोनों तरफ सागवान के पेड़ थे।   बसंत की दस्तक होने को ही थी। सागवान के पत्ते अपनी जिंदगी के थपेड़ों को झेलते हुए छलनी हो चले थे। किसी समय जब वह और निखिल मोटर साइकिल पर इस रास्ते से जाते थे वह जिद करके गाड़ी रुकवाती और सागवान के इन छलनी हुए पत्तों को इकठ्ठा कर संभाल कर घर तक ले जाती थी। उन पत्तों पर खूबसूरत पेंटिंग बनाती। कभी कभी सोचती इंसान भी तो इन पत्तों की तरह है जिंदगी के अनुभव हासिल करते करते छलनी हो जाता है लेकिन फिर उसकी उपयोगिता क्या रह जाती है सिर्फ एक सजावटी वस्तु या अनुपयोगी कबाड़ जो पड़े पड़े खुद के मिटटी हो जाने का इंतज़ार करता रहता है। 
उसका मन हुआ गाड़ी रोक कर कुछ पत्ते चुन ले। अभी वह गाड़ी रोकने लिए सही जगह तलाश कर ही रही थी कि अचानक एक बोलेरो उसके बगल से तेज़ गति से निकली। वह अकबका गई ये अचानक कहाँ से आई वह तो रेयर व्यू पर लगातार नज़र रखे थी फिर उसे गाड़ी क्यों नहीं दिखी। उसने रुकने का विचार स्थगित कर दिया।  मुझे और ध्यान से गाड़ी चलाना चाहिए खुद से कहते साइड मिरर ठीक किया। 
एक छोटा गाँव आने वाला था। गाँव के बाहर नदी की पुलिया से गुजरते उसने दायीं ओर नज़र घुमाई नदी का किनारा सुनसान पड़ा था। नदी सूख गई थी वैसे भी बरसाती नदी की उम्र चौमासे भर होती है। कभी इस नदी के किनारे कतार से खूबसूरत टेसू के वृक्ष थे। गर्मियों में तपते पत्थरों के दोनों तरफ दहकते फूल लहकते थे। अब वहाँ झाड़ झंखाड़ और गाँव का कचरा पड़ा था। उसका मन खिन्न हो गया क्यों हम अपनी प्राकृतिक संपदा से खिलवाड़ कर रहे हैं शहरों के साथ अब गाँवों में भी। 
गाँव से निकलते गाड़ी की गति धीमी हो गई उसे प्यास सी महसूस हुई। गाँव  के बाहर साइड में गाड़ी रोकी पानी पिया। रेडियो पर  नये गाने आने लगे थे उसने रेडियो बंद करके मोबाइल पर गाने लगा दिए। तब तक एक बैलगाड़ी उसकी गाड़ी से आगे आ गई। बैलगाड़ी में अनाज की बोरियों के ऊपर तीन औरतें और एक लड़की बैठी थी। जैसे ही उसने  गाड़ी स्टार्ट की वे एक दूसरे का ध्यान उसकी ओर खींचने लगीं। उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि अकेली औरत  कार से गाँव के बाहर जा रही है। तब तक गाड़ीवान ने भी मुड़कर उसकी तरफ देखा। उनके अचरज पर वह धीमे से मुस्कुरा दी उसका मन गर्व भर गया अपना सपना और उसे पूरा करने का हौसला जुटाने का गर्व। 
आगे घाट था एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई। निखिल के साथ आते वह कई बार जिद करती थी यहाँ रुकने की। पहाड़ी के किनारे खड़े हो कर दूर तक फैली हरी भरी वादियों को निहारते कॉफी पीने की लेकिन निखिल हमेशा टाल जाते यहाँ रुकना खतरनाक है कहते हुए। आज भी चलते समय उसे ये वादियाँ याद आयीं थीं लेकिन पुरानी बातों को याद करते अकेले रुकने की हिम्मत नहीं हुई उसकी। अब घाट के तीखे मोड़ और उतार पर गाड़ी की गति साधने में उसने पूरा ध्यान लगा दिया। मोबाइल पर चल रहे गाने अब उसकी एकाग्रता में खलल डालने लगे लेकिन इस समय वह सड़क से ध्यान हटा कर मोबाइल बंद करने की स्थिति में भी नहीं थी। हाँ मौका पाकर उसने मोबाइल पर अपना पर्स रख दिया जिससे आवाज़ दब गई। 
बारह किलोमीटर का सफर करने में लगभग आधा घंटा लग गया। उसे थकान सी महसूस होने लगी या शायद ये तनाव था जो अब उसकी नसों से पिघलने लगा था। उसने एक ढाबे के पास गाड़ी रोकी चाय पीने का मन कर रहा था। आर्डर दे कर वह बैठ गई और अपने चारों तरफ नज़रें घुमाई। एक टेबल के इर्दगिर्द तीन आदमी बैठे थे। दो तीन परिवार भी वहाँ थे एक वही अकेली थी। उसका ध्यान ढाबे के मालिक की ओर गया वह उसे ही देख रहा था शायद कयास लगा रहा था कि वह अकेली है या कोई और भी है उसके साथ। वह थोड़े संकोच से भर गई अकेले सफर पर निकलने के उसके उत्साह पर डर की झीनी चादर फ़ैल गई। उसने फिर इधर उधर देखा तो उन तीनों आदमियों और एक परिवार को खुद को घूरते पाया। उसका मन हुआ जल्दी से जल्दी यहाँ से चल दे तभी लड़का उसकी टेबल पर चाय का गिलास रख गया। चाय की तलब डर पर हावी हो गई जल्दी से चाय ख़त्म की और गाड़ी में बैठ गई। उसने सतर्कता से चारों ओर देखा वे तीनो व्यक्ति बाहर आ रहे थे अचानक जैसे उसकी साँसे अटक गईं ना जाने कितने विचार आये वह सिलसिलेवार कुछ सोचती तब तक वे अपनी कार की तरफ बढ़ गए। उसने गाड़ी स्टार्ट की और रेयर व्यू में देखा उनकी गाड़ी विपरीत दिशा में बढ़ गई उसने राहत की साँस ली। 
आगे का रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। सड़क के दोनों किनारों से ही ऊँचे ऊँचे पेड़ खड़े थे सूरज की किरणें दायीं ओर से छन छन कर आ रही थीं। अगला गाँव अब काफी दूर था इसलिए अब दोपहिया वाहन इक्का दुक्का ही दिख रहे थे वो भी काफी अंतराल से अधिकतर तो ट्रक कार और जीप ही थे जो तेज़ गति से भागे जा रहे थे। उसने कार के शीशे खोल दिए। तेज़ भागती कार में जंगल की हवा सांय सांय करती भरने लगी। ना जाने क्यों उस पर  अकेलापन हावी होने लगा। उसने शीशे फिर बंद कर दिए और रेडियो पर गाने लगा दिए तेज़ बीट के नए गाने। वह जोर जोर से गाने लगी इससे उसका अकेलेपन का एहसास कुछ कम हुआ। कार तेज़ गति से भागी जा रही थी उसके और मंज़िल के बीच कुछ ही अंतराल बाकी था। 
तभी फोन बज़ उठा उसने गाड़ी धीमी की ,"हाय कहाँ पहुँच गई ?" चहकती आवाज़ ने उसे उत्साह से भर दिया। 
"बस पहुँचने ही वाली हूँ ज्यादा से ज्यादा बीस मिनिट। "
उसका सपना , सपना पूरा करने का हौसला , समीप आती मंज़िल। गाड़ी बाजार की सडकों से निकल कर कॉलोनी की कच्ची सड़क से होते उस घर के सामने रुकी वह बाहर ही खड़ी थी दोनों ने हाथ हिलाया। गाड़ी से उतरते ही वे दोनों गले लग गई। उसके बचपन की सहेली जिसके साथ वह दो दिन की छुट्टियाँ बिताने आई थी। दो दिन सिर्फ वे दोनों और उनका बचपना यही तो थी उसके सपने की मंजिल। 
कविता वर्मा 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

आदत

आदत 
अल्ताफ हुसैन ने घर पहुँच कर अपना थैला जमीन पर रखा और आँगन पर रखी खटिया पर बैठ गया। शबाना पानी ले आई पानी पीते उसने शबाना को देखा और मुँह पोंछते उससे पूछा "सब ठीक ठाक तो है ?"
शबाना ने सिर हिलाकर जवाब दिया हाँ सब ठीक है। "आपका सफर कैसा रहा ? मामू जान कैसे हैं अब ?मामी बच्चे सब खैरियत से तो हैं ?"
अल्ताफ आठ दिनों बाद आज घर लौटा था। "हाँ हाँ सब खैरियत है " कहते हुए अल्ताफ ने वहीं खटिया पर लेट लगा ली।  लेटते ही उसकी नज़र पड़ोस के मकान पर पड़ी।  आँगन सूना पड़ा था। आँगन में बंधी रस्सी पर हमेशा सूखने वाला अंगोछा नहीं था।  हमेशा खुले रहने वाले दरवाज़े खिड़की बंद थे।  वह चौंक गया।  
"बीबी ओ शबाना बीबी" आवाज़ लगाते वह उठ बैठा। 
'आई ', अंदर से आवाज़ आई। शबाना के बाहर आने का इंतज़ार करते वह दोनों घरों के बीच की सूखी कंटीली बाड़ तक पहुँच गया और पंजों के बल उचक कर उस मकान में देखने लगा वहाँ कोई नहीं था। अल्ताफ ने झुंझलाते हुए जोर से आवाज़ लगाई "शबाना ओ शबाना जल्दी बाहर आओ। " 
"जी क्या बात है क्यों हड़बड़ा रहे हो ?"दुपट्टे के छोर से हाथ पोंछते शबाना उसके पास चली आई। 
"क्या बात है पड़ोस में कोई नहीं है क्या ? महादेव भाई और उनका परिवार कहाँ गए ?सब खैरियत तो है ?"
शबाना ने आश्चर्य से अल्ताफ को देखा उसने उसे कभी इस तरह हड़बड़ाते नहीं देखा था और महादेव भाई के बारे में इस बैचेनी से तहकीकात करना। लगभग आठ साल हो गए होंगे उनकी और महादेव भाई की बात चीत बंद हुए। इतने सालों में तो अल्ताफ ने कभी महादेव भाई के बारे में जानने की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई।  उनके दुःख सुख में कभी शरीक नहीं हुए आज अचानक इस तरह महादेव भाई के लिए उनकी ये बैचेनी। 
***
महादेव और अल्ताफ के परिवार लगभग पचास सालों से एक दूसरे के पडोसी थे।  दोनों के पिता अच्छे मित्र थे।  सुबह साथ साथ खेत पर जाना , फसलों, जानवरों, घर परिवार के बारे में अपनी चिंताए साझा करना।  जब महादेव की शादी हुई तब उनकी दुल्हन गौरी अल्ताफ के यहाँ ही उतरी थीं जबकि गाँव में उनके एक दो रिश्तेदार और थे।  तब महादेव के पिता ने उन्हें समझाया था इतनी दूर आने जाने में लड़कियों को परेशानी होती इसलिए पड़ोस में उतार लिया।  होली ,ईद ,दिवाली सब साथ ही मनाई जाती थी। तब गाँव का माहौल ही कुछ और था न हिन्दू काफिर थे न मुसलमान अलगाव वादी। सब एक गाँव वाले थे सबके सुख दुःख साझा थे। 
समय के साथ सब कुछ बदलने लगा। गाँव के मीठे पानी में लट्ठ मार कर दो फाड़ करने की कोशिश शुरू हो गई। एक दुसरो को दुःख पहुँचाने वाले नाम दिए जाने लगे परेशान करने के लिए उनकी धार्मिक भावनाओ को आहत किया जाने लगा। कभी कभी चोट इतनी करारी होती दूरी इस कदर बढ़ जाती कि  उसे पटना मुश्किल हो जाता। 
ऐसे ही एक आँधी में विश्वास की दीवार भरभरा कर ढह गई अपने पराये ,हो गए , बरसों पुराने संबंधों के घरोंदे बिखर गए , नेह की डोरी टूट गई, साथ साथ उठने बैठने वाले, सुख दुःख साझा करने वाले अचानक एक दूसरे से बेगाने हो गए।  दिलों में ऐसी कड़वाहट भर गई कि  एक दूसरे को देखना भी नागवार गुजरने लगा।  अल्ताफ और महादेव भी इस लपट में अपने सौहार्द को बचा न सके हालांकि इस माहौल को बनाने में उनका कोई हाथ न था। लेकिन उनके रिश्तेदारों बंधू बांधवों और जात बिरादरी के दबाव के चलते उन्हें ये दूरियाँ बनानी पड़ीं जो धीरे धीरे बढ़ती ही चली गई।  दो घरों के बीच फूलों की बागड़ काँटों की झाड़ियों में बदल गई। 

*** 
"महादेव भाई ने अपना घर बेच दिया उनका पूरा परिवार तो चार पांच दिन पहले ही चला गया था और आज महादेव भाई भी चले गए।"  
इस खबर ने अल्ताफ को हिला कर रख दिया।  उन्होंने तेज़ी से पलट कर शबाना को देखा फिर उन्हें महसूस हुआ कि उनकी आँखें भरी हुई हैं , उन्होंने तेज़ी से मुँह फेर लिया और महादेव के घर की ओर देखने लगे। "महादेव कब गया ?" आवाज़ के कंपन को छुपाते छुपाते भी थरथराहट शबाना तक पहुँच गई।  उसने धीरे से अपना हाथ अल्ताफ की पीठ पर रखा जिसमे सान्तवना थी, अल्ताफ के मनोभावों को समझ लेने का एहसास था। 
"कहाँ गए हैं वे लोग कुछ पता है ?"
"ये तो नहीं पता लेकिन अभी थोड़ी ही देर हुई है उन्हें गए हुए शायद बस अड्डे पर मिल जायें। "
अल्ताफ चौंक कर पलट गया न सिर्फ इस बात से की महादेव को गए ज्यादा समय नहीं हुआ है बल्कि इस बात से भी कि शबाना उनके मन को समझ गई है।  उन्होंने एक नज़र शबाना पर डाली सब कुछ तो था उस नज़र में।  इस खबर के लिए , उन्हें समझने के लिए और उन्हें क्या करना चाहिए इसका रास्ता दिखाने के लिए प्यार , कृतज्ञता और एक आशा कि शायद वह महादेव से मिल सकें। 
जल्दी से जूते पैर में डाल कर अल्ताफ बस अड्डे की ओर चल पड़ा।  कदमों के साथ बीती बातों ने भी वेग पकड़ लिया।  
***  
मारकाट  मची हुई थी। मंदिरों और मस्जिदों के सामने जानवरों को मार कर फेंका जा रखा था।  दुकाने लूटी जा रही थीं पथराव जारी था। ऐसे में अल्ताफ और महादेव बचते बचाते लगभग साथ साथ ही घर पहुँचे। तभी मोहल्ले के लडके दौड़ते हुए आये उनका मकसद मुस्लिम मोहल्ले से अकेले हिन्दू परिवार को खदेड़ने का था। अल्ताफ ने उनका रौद्र रूप देखा और नज़रें चुरा कर घर में घुस गया। इसके पहले भी कौम की मजलिस में वह महादेव की तरफदारी करने के लिए लानत मलानत सह चुका था। आज लड़कों के तेवर बिगड़े हुए थे। उनके हाव भाव बता रहे थे वे कुछ सुनने समझने वाले नहीं हैं।  महादेव की वह कातर दृष्टी अल्ताफ को आज भी याद है।  दरवाज़ा बंद कर गहरी सांस ले कर उसने कहा था 'या अल्लाह।' दिल से निकली इस पुकार ने काम किया और गली फौजी बूटों से गूँज उठी। 
आंसू गैस के गोलों ने उपद्रवियों को तितर बितर कर दिया।  अल्ताफ ने तुरंत शुक्राने की नमाज़ अदा की लेकिन महादेव की कातर नज़र को अनदेखा करने की शर्मिंदगी से वह कभी उबर नहीं पाया। 
सामने सड़क धुंधला गई थी अल्ताफ ने गमछे से  आँखें पोंछी। वह रोड पर आ गया था। अचानक ख्याल आया महादेव कहाँ जा रहा है किस बस में बैठा होगा ये तो पता ही नहीं है वह उसे ढूंढेगा कैसे ? चलते चलते उसके कदम ठिठक गए निराशा सी तारी होने लगी। 
 
वह बाजार में आ गया चारों और कोलाहल था लेकिन उसके अंदर सन्नाटा  पसरा  था।  इस भीड़ में भी वह अकेला था। अकेला उस व्यक्ति के जाने से जो बरसों पहले उसका दोस्त ना रहा था। ऐसी दुश्मनी भी तो नहीं थी। उसे याद आया दंगों के हादसे के करीब साल भर बाद की बात है गाँव के पास से गुजरने वाले हाई वे के काम पर गाँव के तमाम मजदूर लगे थे।  फसल की कटाई लिए मज़दूरों का टोटा  पड़ा हुआ था। अल्ताफ बड़ी मुश्किल से दो तीन मज़दूरों को राजी कर गाँव में लाया था।  सुबह सुबह वह  उन्हें लेने गया तो पता चला वे किसी और के खेत पर कटाई के लिए चले गए हैं।  अल्ताफ मायूस सा खेत पर पहुँचा तो देखा महादेव के खेत पर जोर शोर से कटाई चालू है।  अल्ताफ का खून खौल गया।  मज़दूरों के ना मिलने से फसल कटने में वैसे भी देर हो गई थी और देर होने से दाने बिखर जाने का खतरा था। गुस्से में उसने खुद ही कटाई शुरू कर दी।  गुस्से से ज्यादा महादेव का इस तरह दगा देना उसे कचोटता रहा।  आँखे भर भर आती रहीं , नथुने ठोड़ी कंपकपाती रही लेकिन वह ना रुका अपना सारा क्रोध क्षोभ दुःख दरांती से निकालता रहा।  दोपहर में जब शबाना रोटी लेकर आई उसे आँसुओं और पसीने  में लथपथ देख हैरान रह गई। उसके हाथ से दरांता लेकर अल्ताफ को छाँव में बैठाया पानी पिलाया। सुबह से खुद से खुद का दुखड़ा कहते कहते थक चुका अल्ताफ फफक पड़ा। शबाना के सांत्वना भरे शब्द और स्पर्श भी उसके मन को हल्का न कर सके।  इतना निकलने के बाद भी गुबार भरा ही रहा वह ठीक से खाना भी न खा सका। तभी उसे महसूस हुआ दो जोड़ी आँखे उसे घूर रही हैं  दिशा समझते पहचानने में समय ना लगा। उस ओर देखने का साहस तो ना हुआ लेकिन उसके  बाद उसकी सोच की दिशा बदल गई।  उन नज़रों की तपिश में उसका क्षोभ पिघल गया उसे वे दो जोड़ी कातर आँखें यकायक याद आ गईं। फसल और घर एक दिखाई देने लगे।  मन फिर अपराध बोध से भर गया।  वह देर तक पेड़ की छाँव में लेटा रहा उसमे फिर दरांता उठाने की शक्ति न रही । उसकी थकान को भाँप कर शबाना ने कहा कल गाँव के दो चार लोगों को साथ लेकर फसल काट लेंगे अब घर चलो।  उसने शबाना को घर भेज दिया वह कुछ देर अकेले रहना चाहता था।  खेत के खाली  हिस्से से मन के खाली हिस्से पर वह पीछे छूट गए खूँट सी खुरदराहट महसूस कर रहा था। 

अगले दिन सुबह सुबह दो मज़दूर उसके घर आ गए अल्ताफ खुद से ही शर्मिंदा हो गया।  फसल पर पूरे परिवार का जीवन टिका था इसलिए वह उन्हें मना भी न कर सका ना ही ये पूछ सका कि उन्हें उसके यहाँ काम पर वापस भेजा गया है या वे खुद आये हैं। खेत पर जाते अल्ताफ ने देखा महादेव की पूरी फसल नहीं कटी थी महादेव गौरी भाभी और उनके दोनों बेटे कटाई में जुटे थे।  
इस घटना के बाद अल्ताफ जाने अनजाने महादेव भाई की खोज खबर रखने लगा।  महादेव की बेटी की शादी तय हुई तो गाँव के एकमात्र हलवाई शौकत भाई से अल्ताफ ने बातों बातों में कह दिया "शौकत भाई महादेव अपने मोहल्लेदार है हिसाब किताब अपनों वाला लगा लेना। " शौकत भाई आश्चर्य से उन्हें देखते रह गए थे अल्ताफ ने झेंपते हुए कहा था ,"शौकत भाई लड़की की शादी में वैसे भी हज़ारों खर्चे होते हैं मैंने तो मोहल्ले दारी  के नाते कहा था आगे आप देख लो। " शौकत भाई ने भी उनकी बात का मान रख लिया था। 
पडोसी के नाते निमंत्रण तो उन्हें भी मिला था लेकिन वो जाने की हिम्मत नहीं कर पाया।  अपने घर से ही तैयारियों का जायज़ा लेता रहा। हाँ शबाना के हाथ बिटिया के लिए खूबसूरत जोड़ा और कंगन भिजवाये थे।  भीगी आँखों इ दूर से बिटिया को विदा होते देखता रहा उस दिन अल्ताफ फूट फूट कर रोया था। 
जीवन सामान्य ढंग से चल रहा था। महादेव और अल्ताफ अब भी दोस्त न थे लेकिन दुश्मन भी न थे।  दोनों के बीच दोस्ती के ज़ज्बात बर्फ बन जम चुके थे।  इस बर्फ के वे आदि हो चुके थे।  कोई इस बर्फ को पिघलाने की कोशिश भी नहीं कर रहा था ना शबाना , ना गौरी और ना ही गाँव वाले। शबाना अल्ताफ की शर्मिंदगी से वाकिफ थी तो गौरी महादेव के दिल के उस जख्म से जो अब भी यदा कदा टीसने लगता था हालांकि अब उस पर वक्त की खत जमने लगी थी।  गाँव वाले या तो खुश थे या शर्मिंदा या शायद तटस्थ। 
महादेव अब भी अल्ताफ जीवन  हिस्सा था एक मूक हिस्सा जिसके चले जाने से हुई हलचल ने उसके भीतर एक सन्नाटे को मुखरित कर दिया था। आँगन की बाड़ में सूखी झाड़ियों से बने छेद को दोनों ने ही कभी पटाने की कोशिश नहीं की। तार पर लटका अंगोछा महादेव के घर पर होने की सूचना देता था।  ऐसा ही कुछ शायद महादेव के साथ भी था।  ईद और दिवाली पर दोनों ही घरों में साफ सफाई रंग रोगन होता था।  अल्ताफ का बेटा नौकरी पर बाहर चला गया तो महादेव के खेत पर बनी मढ़िया दोनों खेतों के बीच की मेढ़ तरफ सरक गई।  शबाना और गौरी की यदाकदा बातें होती थीं आना जाना तो शायद नहीं होता था। 
अल्ताफ यादों के कोलाहल से घिरा बस स्टैंड पहुँचा तो बसों के तीखे हार्न और खोमचे फेरी वालों की आवाज़ से चैतन्य हुआ।  महादेव जाने किस बस में होगा ? कहीं बस निकल न गई हो ?अगर वह चला गया होगा तो ? फिर वह कभी महादेव से न मिल सकेगा। अब उसे सच में महादेव के बिना रहने की आदत डालनी होगी। 
अल्ताफ तेज़ी से खड़ी बसों के अगल बगल चक्कर लगा कर उनमे झांकने लगा।  बस की खिड़की तरफ पीठ किये आदमी को पहचानते वह बस में चढ़ गया। महादेव ही तो है। उसे  देखते ही उसके नथुने और ठोड़ी कंपकपाने लगी शब्द गले में फंस गए बड़ी मुश्किल से होंठ हिले फुसफुसा कर निकले एक नाम की तरंगे हवा में फ़ैल गईं।  महादेव ने अल्ताफ को सामने खड़ा देखा तो उठ खड़ा हुआ।  एक दूसरे के आमने सामने खड़े कुछ ही पलों में दोनों ने आठ साल साथ जी लिए और एक दूसरे के गले लग गए। समय ठहर गया एक दूसरे को बाँहों में थामे उन्होंने आने वाली वह जिंदगी साथ जी ली जो उन्हें एक दूसरे के बिना जीनी थी।  बर्फ पिघल चुकी थी जो कभी पूरी तरह जमी ही नहीं थी।  एक परत के नीचे भावनाओं की तरंगे थीं उस परत को हटाने की कोशिश ही दोनों ने नहीं की थी। अल्ताफ ने जल्दी से महादेव का नया पता ठिकाना पूछा कंडक्टर ने बस चलने के लिए सीटी बजा दी।  धुंधलाती आँखों से दोनों ने एक दूसरे को देखा।  बस चल पड़ी। 
कविता वर्मा