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गुरुवार, 8 सितंबर 2022

पौने तीन मिनट

 पौने तीन मिनट 

चौराहे के समीप आते-आते वैभव ने सामने सिग्नल पर नज़र डाली मात्र पाँच सेकंड बचे थे उसे लाल होने में उसने बाइक की गति बढ़ा दी लेकिन जब वह स्टॉप लाइन से 50 मीटर दूर ही था सिग्नल लाल हो गया। वैभव ने गति कम करते हुए ब्रेक लगा दिए बाइक जोर से चीं की आवाज करते हुए रुक गई। एक खीज सी वैभव के दिमाग में उभरी फिर वह हेलमेट का ग्लास खोलकर आसपास देखने लगा। 
सुबह के 10:00 बजे थे चौराहा तीखी चमकीली धूप से सराबोर था। सिग्नल के तीन तरफ रुके ट्रैफिक की कतारें 50 से 100 मीटर तक फैली थीं। दोपहिया वाहन वाले धूप में रुकने से झुंझलाये हुए अपना हेलमेट उतार कर सिग्नल हरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। कार सवार कार का एसी चलाये जहरीला धुआं अपने से कमतर हैसियत वाले बाइक और साइकिल सवारों पर छोड़कर मानों जता रहे थे कि तुम इसी लायक हो। कुछ पैदल चलने वाले आँख बंद कर इस पार से उस पार जा रहे थे उन्हें न लाल बत्ती की परवाह थी न हरी बत्ती की। उनके अचानक बीच में आने से गाड़ियों की गति कहीं धीमी होती कहीं थम जाती। बाइक वाले दाएं बाएं से निकल जाते और चार पहिया वाले मुँह बनाते भद्दी गाली देते और आगे बढ़ जाते। एक सिग्नल के खंबे के पास ट्रैफिक जवान निस्पृह सा खड़ा था वह न तो पैदल चलने वालों को रोक रहा था और न ही स्टॉप लाइन से आगे आकर खड़े या लेफ्ट टर्न रोक कर खड़े वाहन चालकों को। लेफ्ट मुड़ने वाले पीछे से तेज हॉर्न बजा रहे थे लेफ्ट टर्न रोक कर खड़े वाहन इंच दो इंच आगे बढ़ते और रुक जाते। आगे ट्रैफिक जवान का खौफ उन्हें सता रहा था न जाने उदासीन से दिखने वाले इस व्यक्ति का कर्तव्य बोध कब जाग जाए और कब वह गाड़ी साइड में लगवा कर टारगेट पूरा करने लगे। हालांकि गाड़ी साइड में लगवाने के लिए  साइड जैसी कोई जगह उस चौराहे पर नहीं थी। हर सिग्नल पर गाड़ियों के आसपास कुछ बच्चे भीख माँग रहे थे। वह अधिकतर कार के आसपास मंडराते उसके शीशे को थपथपाते उसमें से अंदर झांकते अपनी दयनीय सूरत दिखा कर कुछ पाने की उम्मीद कर रहे थे। बाइक और साइकिल वालों को उन्होंने भी कम हैसियत का समझ कर छोड़ दिया था। 
वैभव ने लगभग 40 सेकंड में चौराहे का यह जायजा ले लिया था। सिग्नल बदल गया था अब दूसरी सड़क से ट्रैफिक चालू हो गया था। अब गाड़ियाँ वैभव के सामने से गुजर रही थीं। चौराहा पार करने की हड़बड़ी उनमें साफ दिख रही थी। कुछ साइकिल वाले अब इस इंतजार से उकता कर थोड़े थोड़े आगे आते हुए स्टाॅप लाइन के तीन चार मीटर आगे तक आ चुके थे और सामने से आ रही गाड़ियों की गति को रोक रहे थे।  
तभी सामने की सड़क से एक बाईस पच्चीस साल की लड़की जिसने हरी पीली साड़ी पहनी थी दुबले पतले शरीर पर उसका बड़ा हुआ पेट बता रहा था कि वह माँ बनने वाली है सड़क पार करके वैभव की दिशा में बढ़ने लगी थी। तीखी धूप ने उसे बहुत परेशान कर दिया था या शायद वह बहुत दूर से बहुत देर से पैदल चल रही थी उसने साड़ी का पल्ला सिर पर लेकर सिर को धूप से बचाने का जतन किया। एक बार आंखें मिचमिचा कर आसमान की ओर ताका और फिर उसके कदम मानो सड़क से उखड़ गए। एक दो कदम आड़े तिरछे रखते वह आगे बढ़ी लेकिन तीसरे कदम पर खुद को न संभाल पाई और बेहोश होकर तपती सड़क पर गिर गई। वह वैभव से लगभग बीस पच्चीस मीटर दूर चौराहे के बीचो बीच सड़क पर गिरी थी। सड़क पार करने वाली गाड़ियाँ थोड़ी धीमी हुई और फिर उसके दाएं बाएं से गुजरने लगीं मानो अगर अभी सिग्नल पार न किया तो वह जिंदगी भर के लिए लाल होकर रह जाएगा और फिर वह कभी यह चौराहा पार करके अपने गंतव्य पर नहीं पहुंच पाएंगे। वैभव के सामने वाले सिग्नल के पास खड़े ट्रैफिक जवान ने अब तक उस औरत को सड़क पर गिरे हुए नहीं देखा था संभवतः वह अपने ही किन्हीं विचारों में खोया था शायद कोई पारिवारिक समस्या में या अपनी पोस्टिंग किसी और विभाग या चौराहे पर करवाने की योजना बनाने की जुगत में। 
अब वैभव के बाएँ तरफ से ट्रैफिक शुरू हो गया वह औरत सड़क के बीच बेसुध पड़ी हरी पीली घास का ढेर लग रही थी। उसकी साड़ी का रंग बिरंगापन गाड़ियों को उसे बचाकर उसके आसपास से निकलने का संकेत दे रहा था। ट्रैफिक जवान की नजर उस पर पड़ चुकी थी वह दौड़ कर उस तक आया और हाथ देकर सीटी बजाकर गाड़ियों को अगल-बगल से निकलने का इशारा करने लगा। वह किसी खाली ऑटो को देख रहा था लेकिन ऑटो वाले सड़क पर पड़ी उस औरत को देखते जवान को देखते तो कभी स्पीड कम करते कभी बढ़ाते किसी कार की आड़ लेते वहाँ से गुजर जाते। वैभव ने आसपास नजर दौड़ाई शायद कोई उस जवान या औरत की मदद करने आगे आए। उसने देखा आसपास बहुत सारे लोगों ने मोबाइल निकाल लिया था कोई फोटो ले रहा था तो कोई वीडियो बना रहा था। बाकी दो सिग्नल पर रुकी सड़कों पर भी कई लोग वीडियो बनाने में मशगूल थे। ट्रैफिक जवान ने झुककर उस औरत को हिलाया डुलाया वह सड़क पर पसर गई। ट्रैफिक अभी भी निर्बाध चल रहा था। सिग्नल पर रुके लोग उत्सुकता और चेहरे पर दया के भाव लाकर फोटो वीडियो लेने में मशगूल थे। कुछ बाइक सवार आपस में बात कर अपने समझदार होने का परिचय बगल में 30 सेकंड के लिए खड़े सवार को दे देने को बेताब थे। कुछ बंद कार में बैठे लोगों को घटना का ब्यौरा देकर पुण्य कमा रहे थे। कुछ गाड़ियों में महिलाएँ निर्लिप्त सी बैठी थीं उनके चेहरे पर एक संतुष्टि थी कि वे अकेले नहीं हैं उनके साथ कोई है जो मुसीबत में उनकी मदद कर सकता है और यह उनकी समझदारी है। उस पर पानी डालो गर्मी से बेहोश हो गई ऐसी हालत में अकेले नहीं निकलना चाहिए किसी को साथ लेकर आती जैसी फुसफुसाहटें हवा में तैर रही थीं। वैभव के पास पानी नहीं था लेकिन लगभग हर कार में पानी था कुछ बाइक सवार भी पानी रखे हुए थे लेकिन उतरकर जाने में सिग्नल हरा हो जाने और फिर लाल हो जाने पर अगले 2:45 मिनट के लिए फिर रुक जाने का डर उन्हें रोक रहा था। हर व्यक्ति दिल में चाह  रहा था कि कोई उस औरत को पानी पिला दे लेकिन वह कोई खुद न हो। 
सिपाही ने मोबाइल निकाला वह एंबुलेंस को फोन लगा रहा था। वह उस औरत को उठाने की कोशिश भी कर रहा था उसे डर था कि गर्म सड़क उसके शरीर पर फफोले ना बना दे। लेकिन उसे यह भी डर था कि न जाने किस एंगल से खींचे गए किसी फोटो या वीडियो में ऐसा कुछ आपत्तिजनक आ जाए कि वह मुसीबत में फँस जाए। वैभव उसकी बेबसी देख रहा था वह उस बेसुध पड़ी औरत के लिए भी चिंतित था। उसका उभरा पेट उसी के वजन से दब रहा था जो नुकसानदायक हो सकता था। उसने सामने देखा लाल सिग्नल बस हरा होने को था। वह सिग्नल लाल होते ही रुक गया था वह सबसे लंबे समय से सिग्नल पर रुका था अब उसे यहाँ और रुकना चाहिए या नहीं वह निश्चित नहीं कर पा रहा था। थोड़ी देर में एंबुलेंस आ ही जाएगी वह रुक कर क्या करेगा? बाइक पर तो वह उसे ले जा नहीं सकता। उसके रुकने से कुछ नहीं होगा इतने लोग भी तो गुजरे कोई नहीं रुका फिर वही क्यों? कम से कम वह फोटो तो नहीं खींच रहा था उसने खुद को समझाया। वह इस इंतज़ार और उम्मीद में था कि कोई तो उसकी मदद करे  वह कितनी देर सिग्नल पर रुका रह सकता है। उसकी तरफ का लाल सिग्नल हरा हो गया था पीछे से कारों के कान फोडू हार्न उसमें बेचैनी पैदा करने लगे। उसे अब चौराहा पार कर लेना चाहिए। उसने हेलमेट का शीशा बंद किया बाइक में किक लगाया एक नजर अगल बगल से कट मारते चौराहा पार करती गाड़ियों को देखा ट्रैफिक जवान को देखा और बाइक आगे बढ़ाते हुए दाएं तरफ का टर्न सिग्नल दिया और बाइक उस जवान के पास ले जाकर ऐसे रोकी कि सड़क पर पड़ी वह औरत बाइक की छाँव में आ गई। उसने और जवान ने उस औरत को उठाकर सीधा किया और एंबुलेंस का इंतजार करने लगे। 
चौराहे पर सिग्नल बारी-बारी से लाल हरे हो रहे थे और वह अगले कई पौने तीन मिनट वहाँ रुकने का मन बना चुका था।
कविता वर्मा

बुधवार, 28 नवंबर 2012

सगा सौतेला




ट्रिंग ट्रिंग फ़ोन कि घंटी कि आवाज़ ने सुधीर को अख़बार छोड़ कर उठने को विवश कर दिया.
हलो सुधीर भैया ब्रज बोल रहे हैं राधा भाभी नहीं रहीं. 
अरे कब कैसे? अच्छा बहुत दिनों से बीमार थीं क्या हुआ था?नहीं नहीं मुझे नहीं पता ठीक है कब ले जायेंगे? पूछते पूछते सुधीर ने हिसाब लगाया चार घंटे का सफ़र ट्रेन तो मिलेगी नहीं अभी कोई, कार से भी तुरंत निकलना होगा. अच्छा सविता, सुधा और बाकियों को खबर कर दी है ठीक है हम पहुँचते हैं. फोन रखकर पलट कर देखा नेहा प्रश्नवाचक मुद्रा बनाये खडी थी.
भाभी नहीं रहीं,अभी निकलना होगा.
कब? हमें तो कभी कोई खबर ही नहीं की.ना चाहते हुए भी नेहा का स्वर कसैला हो गया.सुधीर ने इसे महसूस तो किया पर इसे नज़रंदाज़ करना ही  उचित समझा. तुम चलने कि तैयारी  करो कल शाम तक लौटना होगा. में ऑफिस का इंतजाम करके घंटे भर में आता हूँ.कहते हुए सुधीर जवाब का इंतजार किये बिना कमरे से निकल गया. 

कार चलाते हुए सुधीर बिलकुल खामोश था.नेहा ने एक बार उसकी ओर देखा फिर बाहर देखने लगी.सुधीर के दिमाग में पिछले पचास सालों कि घटनाएँ चलचित्र कि भांति चल रहीं थीं. 
राधा भाभी याने उसके सौतेले बड़े भाई गोपाल की पत्नी.सुधीर के पिताजी कि पहली पत्नी के बेटे थे गोपाल भैया.उनकी माँ कि मौत के बाद सुधीर के पिताजी ने दूसरी शादी की थी. उनसे सुधीर और उनकी दो छोटी बहनें थीं. सुधीर कि उम्र जब सात आठ बरस की रही होगी जब पिताजी चल बसे तब तक गोपाल भैया कि शादी हो चुकी थी. घर में कमाने  वाले गोपाल भैया अकेले थे. छोटा सा जमीन का टुकड़ा और उस पर गुजारा करने वाले गोपाल भैया के तीन बच्चों समेत नौ लोगों का परिवार. गाँव में खुद का लम्बा चौड़ा मकान था सो जगह कि कमी नहीं थी.लेकिन राधा भाभी को उनका वहां रहना बिलकुल ना सुहाता था और बहू होते हुए भी माँ के लिए उनके ताने उलाहने हमेशा चलते रहते थे. अपने बढ़ते परिवार को देखते हुए सौतेले भाई द्वारा संपत्ति में हिस्सा मांग लेने का भय उन्हें हमेशा सताता रहा.फिर दो-दो बहनों कि शादी और उसके बाद के खर्च खुद का ही गुजारा मुश्किल से होता था .अंततः माँ को तीनों बच्चों को लेकर नानाजी के पास आना पड़ा. 

नानाजी अपनी विधवा बेटी और उसके बच्चों को पालने का जतन करते रहे. अचार बड़ी पापड़ बनाते और लोगों के कपडे सिलते माँ ने किसी तरह सुधीर को ग्रेजुएशन करवाया. एक बहन कि शादी नानाजी के रहते हो गयी थी. उनके गुजर जाने के बाद छोटी बहन कि शादी  और घर कि जिम्मेदारी सुधीर पर आन पड़ी. इधर उधर कि छोटी मोटी नौकरी करते हुए वह माँ का संबल बना रहा. इस बीच गाँव से नाम मात्र का ही संपर्क रहा. गोपाल भैया के यहाँ से परिवार बढ़ने कि ख़बरें आती रहीं.उनका तीन लड़कियों और तीन लड़कों का समृद्ध परिवार हो गया. लेकिन उनकी समृध्धि बढ़ने के समाचार गाँव से आने वाले किसी रिश्तेदार से ही मिलते. 
भौजी गोपाल भैया ने नदी के पास एक और खेत खरीद लिया. इस साल धान कि फसल खूब लहलहाई है जैसी ख़बरें देकर रिश्तेदार अपना धर्म निभा लेते.माँ ऐसी ख़बरों पर निर्विकार ही बनीं रहतीं .वह खबर देने वालों कि मंशा भी जानती थीं और गोपाल भैया से खबर ना मिलने का मतलब भी,पर वह खुद इतनी असहाय थीं कि कुछ भी प्रतिक्रिया व्यक्त करके रिश्ते के जर्जर पड़े इस धागे को तोड़ देने का साहस ना कर पातीं. 
अचानक गाड़ी के सामने भैंस के आ जाने से सुधीर ने जोर से ब्रेक लगाया.इसी के साथ ही विचारों कि रफ़्तार भी टूट गयी. उसने नेहा को देखा वह सामने टकराते टकराते बची थी. 
सीट बेल्ट लगा लो इस सड़क पर ऐसे ही अचानक ब्रेक लगाने पड़ते हैं.सुधीर ने कहा. गाड़ी ने फिर गति पकड़ी और सुधीर के विचारों ने भी. 

सुधीर कि बैंक में नौकरी लग गयी.छोटी बहन कि शादी हो गयी पर गोपाल भैया के यहाँ से कोई ना आया.शायद उन्हें डर था कि सामने पड़ने पर कोई अन्य खर्च सर पर ना मढ़ दिया जाये .हाँ बहन के पैर पखारने के लिए एक हल्का फुल्का गहना और दहेज़ के पांच बर्तन जरूर आये जिन्हें स्वीकार कर लिया गया. 
सुधीर कि शादी कि खबर गोपाल भैया को काफी पहले से दे दी गयी थी साथ ही बारात में घर के बड़े कि हैसियत से चलने का आग्रह भी था. तब इतने सालों में गोपाल भैया भाभी पहली बार आये थे और बारात कि सारी व्यवस्थाएं भी संभाली थीं. भाभी माँ के साथ काम में हाथ बंटाती रहीं. पुरानी बातें उकेरने का ना समय था ना किसी ने कीं.भाभी ने ही घर कि बड़ी बहू के रूप में नेहा कि मुंह दिखाई की.

सुधीर की नौकरी से गोपाल भैया और भाभी को अब ये तसल्ली तो थी की अब वो उन पर बोझ तो नहीं बनेंगे. बहनों की जिम्मेदारियां निबट ही गयीं थीं. बाकी रिश्तेदारी व्यवहार निभाने में सुधीर अब सक्षम था.लेकिन सम्बन्ध अभी भी गहरे नहीं हुए थे.शायद पुश्तैनी जायदाद में हिस्से की आशंका उनके मन के किसी कोने में दुबकी हुई थी,जो उन्हें सुधीर से एक दूरी बनाये रखने को विवश कर रही थी. 

इसके बाद जिंदगी बहुत आसान तो ना थी पर एक तसल्ली थी एक अच्छी नौकरी और गोपाल भैया से पत्रों के माध्यम से सतत संपर्क. अब गोपाल भैया माँ को कभी कभार गाँव आने को लिख देते थे. माँ भी ब्याह कर तो उसी घर में गयीं थीं सो वे भी वहां जाने की हुलस दबा ना पातीं और साल में महिने पंद्रह दिनों के लिए गाँव चली जातीं. लेकिन वहां भी अपने आने जाने का खर्च रिश्तेदारी के व्यवहार खुद ही निभातीं इसलिए वो गोपाल भैया पर कोई भार भीं ना थीं.वहां उन्हें अब यथोचित सम्मान मिलता था. 

सुधीर ने अपनी सूझबूझ से अपनी गृहस्थी बना ली. नेहा भी अपनी चादर देख कर ही अपनी उमंगों के सिरे संभाले रही.सीमित आय में बच्चों की अच्छी देखभाल और माँ का यथोचित सम्मान के साथ जीवन के छोटे मोटे उतार चढाव वे बखूबी पार करते रहे. उधर गोपाल भैया तीन- तीन बेटियों की जिम्मेदारी उठाने में खुद को अकेला पाते रहे ओर किसी तरह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होने के लिए गरीब कम पढ़े लिखे लड़कों से बेटियों की शादी करते रहे.सगाई होने तक सुधीर को कोई खबर तक ना दी जाती हाँ शादी में सपरिवार आने का आग्रह जरूर होता. शायद गोपाल भैया अपनी बढ़ती जिम्मेदारियों में खुद को अकेला पा कर सुधीर को उसकी जिम्मेदारियों के साथ अकेला छोड़ देने पर शर्मिंदा थे. इसलिए अपनी जिम्मेदारियों के लिए उससे सलाह या मदद माँगने का साहस ना जुटा पाते.

वक्त अपनी रफ़्तार से चल रहा था कि थोडा रुक जाते चाय वगैरह पी लेते,नेहा की आवाज़ में उसे वर्तमान में ला दिया.पिछले ढाई घंटों से वह बिना बोले अपने ही विचारों में गुम गाड़ी चला रहा था .नेहा कितनी बोर हो रही होगी ये ख्याल तो उसे आया ही नहीं. वह थोडा असहज हो गया. नेहा ने उसे कभी भी भाई भाभी के व्यवहार का उलाहना नहीं दिया और आज भी बिना किसी शिकवे शिकायत के पिछले ढाई घंटों से इस रिश्ते की मूकता के बावजूद उस के साथ चली जा रही है. लेकिन सुधीर के मन में यह रिश्ता पूरी मुखरता के साथ मौजूद है.वह एकाएक नेहा के प्रति अधिक सतर्क हो गया. 

चाय के साथ कुछ खाओगी लाऊं? उसने पूछा. 
हाँ देखो क्या है अभी कुछ खा लेते हैं वहां जा कर पता नहीं कितनी देर लगे. 
सुधीर चौंक कर जैसे यथार्थ में उतरा भैया भाभी तो अब तक उसके साथ ही थे .हाँ हाँ अब तक तो सारे रिश्तेदार भी आ गए होंगे .
नहीं सुधा की ट्रेन तो तीन बजे तक आएगी तब तक तो रुकेंगे ही. 
फिर तो हम समय से पहुँच ही जायेंगे .
आप भी कुछ खा लो सब काम होते होते शाम हो जाएगी कब तक भूखे रहोगे .नेहा ने कहा 
सुधीर की इच्छा नहीं थी कुछ खाने की घर में ग़मी हो गयी है क्रियाकर्म के पहले कैसे कुछ खा ले. आज जाने क्यों वह जुडाव महसूस कर रहा था. नहीं मेरी इच्छा नहीं है उसने बात टाली.
अरे इच्छा अनिच्छा क्या  है नहीं खाओगे तो एसिडिटी हो जाएगी. 
सुधीर ने बेमन से चाय के साथ ३-४ बिस्किट खाए.

कार में बैठते ही सुधीर ने सी डी प्लेयर ऑन कर दिया .नेहा के अकेलेपन का एहसास था उसे. 
भाभी की बीमारी की कभी खबर नहीं मिली.कुछ बताया बृज भैया ने क्या हुआ था?
हाँ बीमार थीं कई दिनों से,वही पेट की तकलीफ अल्सर था. खाना पीना सब छूट गया था. 
हूँ खुद बीमार थीं,बहुओं से तो कोई उम्मीद थी नहीं बीमारी में जाने कौन देखभाल करता होगा? 
क्यों बहुओं का क्या?? सुधीर ने पूछा.
पिछले महिने कुसुम दीदी मिलीं थीं बता रहीं थीं की भाभी बेटे बहुओं के झगड़े से बहुत दुखी थीं. 
बहुओं का तो ठीक है लेकिन बेटों का क्या? सुधीर जानने को उत्सुक हुआ.
तीनों बेटों में बिलकुल नहीं बनती. जायदाद ओर काम के बंटवारे को लेकर रात दिन झगड़े होते हैं. नेहा ने कहा.
तुमने कभी बताया नहीं?
अब बताती भी तो क्या कर लेते हम? फिर भैया ने भी तो तुम्हे कभी कुछ नहीं बताया. जब वो ही परायापन पाले हुए हैं तो हम जानकार कर भी क्या लेते? 
सुधीर समझ रहा था.गोपाल भैया से उसका सौतेला रिश्ता था और इस सौतेलेपन का कारण पुश्तैनी जायदाद ही था.इसमे हिस्सा ना देने के लालच में ही भैया भाभी ने दूरियां बढ़ाईं थीं. वैसे तो उनमे कोई वैचारिक मतभेद नहीं था एक दूसरे के लिए यथोचित मान भी था. गोपाल भैया अब कैसे बताते की इसी जायदाद के लिए सगे भाइयों में सर फुटोव्वल हो रही है.भैया भाभी की अजीब स्थिति थी किसकी तरफ बोलें? 

पांच साल पहले बेटे की शादी के लिए घर की पूजा में शामिल होने सुधीर सपरिवार गाँव गया था.पूरे गाँव में पता नहीं कैसे ये खबर फ़ैल गयी कि सुधीर जायदाद में हिस्सा लेने आया है. गोपाल भैया भी तब तक जायदाद के लिए बेटों के झगड़ों से तंग आ गए थे. उनके बीच बंटवारा भी वो कर देते लेकिन सगे भाई एक दूसरे के लिए अपना दिल बड़ा करने को तैयार नहीं थे. हर कोई मकान के बड़े हिस्से और खेती की बड़ी जमीन के लिए अड़ा था. गोपाल भैया से भी लड़कों की इसी बात को लेकर तकरार होती रहती और गोपाल भैया उन्हें ये कह कर चुप करा देते की अभी तो हम सौतेले भाइयों में बंटवारा नहीं हुआ पहले वो होने दो फिर हमारे हिस्से में से तुम्हे हिस्सा मिलेगा. तब भैया ने कहा भी था तुम्हारा भी हिस्सा है इस जायदाद में तुम अपना हिस्सा ले लो.
सुधीर भावुक हो गया था उसका गला रुंध गया बहुत देर तक तो वह चुप ही रहा फिर बोला, नहीं गोपाल भैया में क्या करूँगा हिस्सा लेकर? मेरा खुद का मकान है. हिस्सा ले भी लिया तो यहाँ आ कर तो रहूँगा नहीं. और ये आपकी मेहनत से बनी जायदाद है मैंने तो कभी खेती बारी देखी नहीं और इसे बेचने की भी मेरी इच्छा नहीं है. ताला पड़ा रहेगा इससे तो अच्छा है की आप लोगों की चहल-पहल रहे यहाँ.
सुधीर ने ये बात कभी नेहा को नहीं बताई थी.हालाँकि नेहा के संतोषी स्वाभाव से वाकिफ था वो पर पता नहीं क्यों? 
सुधीर और गोपाल भैया के बीच रिश्ते का सौतेलापन इस जायदाद की हिस्सेदारी की आशंका ही थी,जिसमे गोपाल भैया की अपनी सीमित चादर की लाचारी थी जो सुधीर की आर्थिक असहायता को देखते हुए बार बार अपना सर उठा लेती थी. वरना तो इस बारे में उनकी कभी कोई अनबन नहीं हुई थी. समय के साथ इस आशंका ने भी दम तोड़ दिया था और अब जब सगे भाइयों ने दिल का सौतेलापन उजागर कर दिया गोपाल भैया सौतेले भाई के सगेपन से विभोर हो गए. 
इस वार्तालाप के बाद दोनों बहुत देर तक खामोश बैठे रहे .सुधीर का मन भीगा था अपनेपन की नमी पा कर तो गोपाल भैया की आँखें नम थीं सौतेले भाई के बड़प्पन से.

कब गाँव की सरहद पर पहुँच गए पता ही नहीं चला.नेहा ने सी डी प्लेयर बंद कर दिया और सिर का पल्लू ठीक करने लगी तब बगल में होती हलचल से उसका ध्यान गया की गाँव आ गया.घर से थोड़ी दूर गाड़ी रोक कर दोनों उतरे नेहा ओरतों के बीच चली गयी और वह भैया के पास. 
भैया बहुत कमजोर दिख रहे थे.वह उनके पास जाकर बैठ गया और अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया .सुधीर को देखते ही गोपाल भैया उससे लिपट कर फफक पड़े. तीनों बेटे क्रियाक्रम की तैयारियां करवा रहे थे.भाभी की मांग भरने जब भैया उठे तो सुधीर ही उन्हें सहारा दे कर ले गया. भाभी को देख सुधीर की आँखें भर आयीं. बहुत गहरा रिश्ता तो नहीं रहा उनसे लेकिन उन्होंने और सुधीर ने रिश्ते की मर्यादा हमेशा रखी. कभी किसी ने किसी को आहत करने वाली बात नहीं कही.बचपन तो सुधीर को याद नहीं पर जब से होश संभाला भाभी को खुद पर विश्वास करता ही पाया. 
भैया  इतने कमजोर हो गए थे की अर्थी को कंधा देने पर लड़खड़ा गए,तब सुधीर ने ही उन्हें सहारा दिया और उनके कंधे पर रखे पाए को अपने कंधे का सहारा दिया. सभी रिश्तेदार बारी बारी से अर्थी  को कन्धा देते रहे और सुधीर गोपाल भैया को सहारा देते चलता रहा.आज वह उनसे एक अनोखा जुडाव महसूस कर रहा था.
चिता पर भाभी का शव देख कर भैया खुद को संभाल ना सके और गिर पड़े जब पंडित ने मुखाग्नि देने के लिए बड़े बेटे को बुलाया तो गोपाल भैया जैसे अचानक सचेत हुए और हाथ उठा कर बड़के को वहीँ रोक दिया.फिर सुधीर की ओर मुखातिब हो कर बोले अग्नि तुम दोगे.
रिश्तेदारों में खुसुर पुसुर शुरू हो गयी तीन तीन लड़कों के होते,लेकिन भैया ने दृढ़ स्वर में कहा तुम सब लड़कों से बढ़ कर हो.भाभी भी तो माँ होती है तुम ही चिता को अग्नि दोगे. फिर रोते हुए बोले तीन तीन बेटों के होते तुम्हारी भाभी ने बुढ़ापे में जो दुःख झेले हैं उसके बाद इन बेटों ने उनके अंतिम संस्कार का अधिकार खो दिया है. उनके लिए जमीन जायदाद माँ बाप की सुख शांति,उनकी सेवा से ज्यादा बड़े हो गए. तुम्हारी भाभी आखरी समय तक तुम्हे याद करके रोती रही कहती रही ऐसे तीन के बजाय भगवान सुधीर जैसा एक संतोषी बेटा ही दे देता तो बुढ़ापे में ऐसी गत ना होती. तुमसे मिलना चाहती थी वो तुमसे माफ़ी मांगना चाहती थी जिस जायदाद के मोह ने तुम्हे हमसे पराया कर दिया उसी जायदाद ने हमारे बेटों से हमें पराया कर दिया. लेकिन तुमसे आँख मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और ऐसे ही चली गयी. 
वापसी में सुधीर पहले से कहीं अधिक खामोश था चिता की लपटों ने रिश्तों में बचे सौतेलेपन को जला कर राख कर दिया था और वह रिश्ते की गर्माहट को महसूस कर रहा था. उसने भाभी को खोया था लेकिन गोपाल भैया को पा लिया था.देर से ही सही. 
कविता वर्मा