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गुरुवार, 8 सितंबर 2022

पौने तीन मिनट

 पौने तीन मिनट 

चौराहे के समीप आते-आते वैभव ने सामने सिग्नल पर नज़र डाली मात्र पाँच सेकंड बचे थे उसे लाल होने में उसने बाइक की गति बढ़ा दी लेकिन जब वह स्टॉप लाइन से 50 मीटर दूर ही था सिग्नल लाल हो गया। वैभव ने गति कम करते हुए ब्रेक लगा दिए बाइक जोर से चीं की आवाज करते हुए रुक गई। एक खीज सी वैभव के दिमाग में उभरी फिर वह हेलमेट का ग्लास खोलकर आसपास देखने लगा। 
सुबह के 10:00 बजे थे चौराहा तीखी चमकीली धूप से सराबोर था। सिग्नल के तीन तरफ रुके ट्रैफिक की कतारें 50 से 100 मीटर तक फैली थीं। दोपहिया वाहन वाले धूप में रुकने से झुंझलाये हुए अपना हेलमेट उतार कर सिग्नल हरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। कार सवार कार का एसी चलाये जहरीला धुआं अपने से कमतर हैसियत वाले बाइक और साइकिल सवारों पर छोड़कर मानों जता रहे थे कि तुम इसी लायक हो। कुछ पैदल चलने वाले आँख बंद कर इस पार से उस पार जा रहे थे उन्हें न लाल बत्ती की परवाह थी न हरी बत्ती की। उनके अचानक बीच में आने से गाड़ियों की गति कहीं धीमी होती कहीं थम जाती। बाइक वाले दाएं बाएं से निकल जाते और चार पहिया वाले मुँह बनाते भद्दी गाली देते और आगे बढ़ जाते। एक सिग्नल के खंबे के पास ट्रैफिक जवान निस्पृह सा खड़ा था वह न तो पैदल चलने वालों को रोक रहा था और न ही स्टॉप लाइन से आगे आकर खड़े या लेफ्ट टर्न रोक कर खड़े वाहन चालकों को। लेफ्ट मुड़ने वाले पीछे से तेज हॉर्न बजा रहे थे लेफ्ट टर्न रोक कर खड़े वाहन इंच दो इंच आगे बढ़ते और रुक जाते। आगे ट्रैफिक जवान का खौफ उन्हें सता रहा था न जाने उदासीन से दिखने वाले इस व्यक्ति का कर्तव्य बोध कब जाग जाए और कब वह गाड़ी साइड में लगवा कर टारगेट पूरा करने लगे। हालांकि गाड़ी साइड में लगवाने के लिए  साइड जैसी कोई जगह उस चौराहे पर नहीं थी। हर सिग्नल पर गाड़ियों के आसपास कुछ बच्चे भीख माँग रहे थे। वह अधिकतर कार के आसपास मंडराते उसके शीशे को थपथपाते उसमें से अंदर झांकते अपनी दयनीय सूरत दिखा कर कुछ पाने की उम्मीद कर रहे थे। बाइक और साइकिल वालों को उन्होंने भी कम हैसियत का समझ कर छोड़ दिया था। 
वैभव ने लगभग 40 सेकंड में चौराहे का यह जायजा ले लिया था। सिग्नल बदल गया था अब दूसरी सड़क से ट्रैफिक चालू हो गया था। अब गाड़ियाँ वैभव के सामने से गुजर रही थीं। चौराहा पार करने की हड़बड़ी उनमें साफ दिख रही थी। कुछ साइकिल वाले अब इस इंतजार से उकता कर थोड़े थोड़े आगे आते हुए स्टाॅप लाइन के तीन चार मीटर आगे तक आ चुके थे और सामने से आ रही गाड़ियों की गति को रोक रहे थे।  
तभी सामने की सड़क से एक बाईस पच्चीस साल की लड़की जिसने हरी पीली साड़ी पहनी थी दुबले पतले शरीर पर उसका बड़ा हुआ पेट बता रहा था कि वह माँ बनने वाली है सड़क पार करके वैभव की दिशा में बढ़ने लगी थी। तीखी धूप ने उसे बहुत परेशान कर दिया था या शायद वह बहुत दूर से बहुत देर से पैदल चल रही थी उसने साड़ी का पल्ला सिर पर लेकर सिर को धूप से बचाने का जतन किया। एक बार आंखें मिचमिचा कर आसमान की ओर ताका और फिर उसके कदम मानो सड़क से उखड़ गए। एक दो कदम आड़े तिरछे रखते वह आगे बढ़ी लेकिन तीसरे कदम पर खुद को न संभाल पाई और बेहोश होकर तपती सड़क पर गिर गई। वह वैभव से लगभग बीस पच्चीस मीटर दूर चौराहे के बीचो बीच सड़क पर गिरी थी। सड़क पार करने वाली गाड़ियाँ थोड़ी धीमी हुई और फिर उसके दाएं बाएं से गुजरने लगीं मानो अगर अभी सिग्नल पार न किया तो वह जिंदगी भर के लिए लाल होकर रह जाएगा और फिर वह कभी यह चौराहा पार करके अपने गंतव्य पर नहीं पहुंच पाएंगे। वैभव के सामने वाले सिग्नल के पास खड़े ट्रैफिक जवान ने अब तक उस औरत को सड़क पर गिरे हुए नहीं देखा था संभवतः वह अपने ही किन्हीं विचारों में खोया था शायद कोई पारिवारिक समस्या में या अपनी पोस्टिंग किसी और विभाग या चौराहे पर करवाने की योजना बनाने की जुगत में। 
अब वैभव के बाएँ तरफ से ट्रैफिक शुरू हो गया वह औरत सड़क के बीच बेसुध पड़ी हरी पीली घास का ढेर लग रही थी। उसकी साड़ी का रंग बिरंगापन गाड़ियों को उसे बचाकर उसके आसपास से निकलने का संकेत दे रहा था। ट्रैफिक जवान की नजर उस पर पड़ चुकी थी वह दौड़ कर उस तक आया और हाथ देकर सीटी बजाकर गाड़ियों को अगल-बगल से निकलने का इशारा करने लगा। वह किसी खाली ऑटो को देख रहा था लेकिन ऑटो वाले सड़क पर पड़ी उस औरत को देखते जवान को देखते तो कभी स्पीड कम करते कभी बढ़ाते किसी कार की आड़ लेते वहाँ से गुजर जाते। वैभव ने आसपास नजर दौड़ाई शायद कोई उस जवान या औरत की मदद करने आगे आए। उसने देखा आसपास बहुत सारे लोगों ने मोबाइल निकाल लिया था कोई फोटो ले रहा था तो कोई वीडियो बना रहा था। बाकी दो सिग्नल पर रुकी सड़कों पर भी कई लोग वीडियो बनाने में मशगूल थे। ट्रैफिक जवान ने झुककर उस औरत को हिलाया डुलाया वह सड़क पर पसर गई। ट्रैफिक अभी भी निर्बाध चल रहा था। सिग्नल पर रुके लोग उत्सुकता और चेहरे पर दया के भाव लाकर फोटो वीडियो लेने में मशगूल थे। कुछ बाइक सवार आपस में बात कर अपने समझदार होने का परिचय बगल में 30 सेकंड के लिए खड़े सवार को दे देने को बेताब थे। कुछ बंद कार में बैठे लोगों को घटना का ब्यौरा देकर पुण्य कमा रहे थे। कुछ गाड़ियों में महिलाएँ निर्लिप्त सी बैठी थीं उनके चेहरे पर एक संतुष्टि थी कि वे अकेले नहीं हैं उनके साथ कोई है जो मुसीबत में उनकी मदद कर सकता है और यह उनकी समझदारी है। उस पर पानी डालो गर्मी से बेहोश हो गई ऐसी हालत में अकेले नहीं निकलना चाहिए किसी को साथ लेकर आती जैसी फुसफुसाहटें हवा में तैर रही थीं। वैभव के पास पानी नहीं था लेकिन लगभग हर कार में पानी था कुछ बाइक सवार भी पानी रखे हुए थे लेकिन उतरकर जाने में सिग्नल हरा हो जाने और फिर लाल हो जाने पर अगले 2:45 मिनट के लिए फिर रुक जाने का डर उन्हें रोक रहा था। हर व्यक्ति दिल में चाह  रहा था कि कोई उस औरत को पानी पिला दे लेकिन वह कोई खुद न हो। 
सिपाही ने मोबाइल निकाला वह एंबुलेंस को फोन लगा रहा था। वह उस औरत को उठाने की कोशिश भी कर रहा था उसे डर था कि गर्म सड़क उसके शरीर पर फफोले ना बना दे। लेकिन उसे यह भी डर था कि न जाने किस एंगल से खींचे गए किसी फोटो या वीडियो में ऐसा कुछ आपत्तिजनक आ जाए कि वह मुसीबत में फँस जाए। वैभव उसकी बेबसी देख रहा था वह उस बेसुध पड़ी औरत के लिए भी चिंतित था। उसका उभरा पेट उसी के वजन से दब रहा था जो नुकसानदायक हो सकता था। उसने सामने देखा लाल सिग्नल बस हरा होने को था। वह सिग्नल लाल होते ही रुक गया था वह सबसे लंबे समय से सिग्नल पर रुका था अब उसे यहाँ और रुकना चाहिए या नहीं वह निश्चित नहीं कर पा रहा था। थोड़ी देर में एंबुलेंस आ ही जाएगी वह रुक कर क्या करेगा? बाइक पर तो वह उसे ले जा नहीं सकता। उसके रुकने से कुछ नहीं होगा इतने लोग भी तो गुजरे कोई नहीं रुका फिर वही क्यों? कम से कम वह फोटो तो नहीं खींच रहा था उसने खुद को समझाया। वह इस इंतज़ार और उम्मीद में था कि कोई तो उसकी मदद करे  वह कितनी देर सिग्नल पर रुका रह सकता है। उसकी तरफ का लाल सिग्नल हरा हो गया था पीछे से कारों के कान फोडू हार्न उसमें बेचैनी पैदा करने लगे। उसे अब चौराहा पार कर लेना चाहिए। उसने हेलमेट का शीशा बंद किया बाइक में किक लगाया एक नजर अगल बगल से कट मारते चौराहा पार करती गाड़ियों को देखा ट्रैफिक जवान को देखा और बाइक आगे बढ़ाते हुए दाएं तरफ का टर्न सिग्नल दिया और बाइक उस जवान के पास ले जाकर ऐसे रोकी कि सड़क पर पड़ी वह औरत बाइक की छाँव में आ गई। उसने और जवान ने उस औरत को उठाकर सीधा किया और एंबुलेंस का इंतजार करने लगे। 
चौराहे पर सिग्नल बारी-बारी से लाल हरे हो रहे थे और वह अगले कई पौने तीन मिनट वहाँ रुकने का मन बना चुका था।
कविता वर्मा

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

शायद तुम समझ सको

प्रिय डायरी ,
कहना तो ये सब मैं 'उनसे 'चाहती थी लेकिन तुमसे कह रही हूँ। अच्छा तुम्हारे बहाने उनसे कहे देती हूँ।  
प्रिय ,
आजकल मेरे दिमाग में एक उथल पुथल सी मची है एक अजीब सी बैचेनी ने दिमाग में घर कर लिया है ,लगता है जैसे मैं कहीं कैद हूँ और उस कैद से छूटने के लिए छटपटा रही हूँ लेकिन उससे छूटने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा है बल्कि हर रास्ता मुझे वापस उसी बंधन की ओर,और ज्यादा धकेलता, कसता सा लगता है।  मैं छूटना चाहती हूँ लेकिन किससे यही नहीं समझ पा रही हूँ क्योंकि जिन जिम्मेदारियों से मैंने खुद को हार की तरह सजाया था वही अब बंधन बन गए हैं।  जब इन बंधनों से छूटने  के लिए अपनों की ओर देखती हूँ उनके अपने तर्क होते हैं जो मेरे विचारों और तर्कों के साथ गडमग हो कर मुझे और उलझा जाते हैं।  
कभी जब सबसे घबरा कर सब विचारों ,बातों को कर नए सिरे से सोचना शुरू करती हूँ  तो लगता है बात तो कुछ भी नहीं है बस एक छोटी सी बात है कि मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूँ।  हाँ बस छोटी सी बात अब मेरा नौकरी करने का मन नहीं है।  पिछले पंद्रह सालों से ये नौकरी मेरे जीवन का हिस्सा बन गई है। मेरी पहचान इससे है और मैं इसकी आदि भी हो गयी हूँ लेकिन फिर भी अब मैं इससे आजाद होना चाहती हूँ।  

करियर की महत्वाकांक्षा मुझे कभी नहीं रही ,हाँ मैं कुछ करना चाहती थी अपने को जानने ,समझने ,तलाशने और पाने के लिए।  इस नौकरी ने बहुत कुछ दिया भी है।  चीज़ों को समझने का नजरिया ,लोगों को जानने की समझ विकसित हुई है।  मेरे व्यक्तित्व को संवारा है इसने।  मेरा पहनावा ,बातचीत का ढंग सबमे सकारात्मक परिवर्तन आया है लेकिन अब मैं थक गयी हूँ ,घर बाहर की जिम्मेदारियां निभाते, थोडा आराम चाहती हूँ।  जिस एकरस जीवन की नीरसता को तोड़ने के लिए नौकरी की थी वही नीरसता अब इस भागदौड़ में शामिल हो गयी है मैं निकलना चाहती हूँ इससे।  
तुमने मुझे हमेशा आगे बढाया अभिभूत हूँ मैं।  मेरी काबलियत पर जितना भरोसा तुम्हे था मुझे भी नहीं था।  तुमने मुझे उड़ने के लिए विस्तृत आसमान दिया पर अब मैं पंख समेट कर फिर अपने बसेरे में लौटना चाहती हूँ।  तुम क्यों मुझे उड़ान भरने को विवश कर रहे हो ,मेरे पंख थक गए हैं मुझे विश्राम करने दो।  

जानते हो न  रिश्तेदारों को ख़ुशी नहीं हुई थी जब मैं पहली बार घर से बाहर निकली थी।  कितनी ही समझाइशें दीं गयीं थीं।  क्या जरूरत है ,कितना कमा लोगी ,क्यों थका  रही हो खुद को ? बच्चों को देखो। आज जब इस रास्ते पर इतना आगे निकल आई हूँ सब फिर समझाते हैं ,इतनी अच्छी नौकरी ,इतनी बड़ी कंपनी ,इतना पैसा क्यों छोड़ना चाहती हूँ ? क्या करूँगी घर में रह कर बोर हो जाऊँगी।  

तुम्हारी भी तो अच्छी खासी नौकरी है अच्छी तनख्वाह है। मेरी तनख्वाह की तो जरूरत ही नहीं पड़ती। यहाँ तक की मेरे सारे खर्चे भी तुम ही पूरे करते हो।  ना मुझे कभी ये शौक रहा कि मैं खर्च करूँगी न तुमने कभी मना किया।  हमारे बीच तेरे मेरे पैसे जैसी कोई बात ही नहीं रही।  हाँ मैं मानती हूँ कि पैसा कभी ज्यादा नहीं होता जितना आता जाता है जरूरतें उतना ही पैर पसारती जाती हैं लेकिन उन्हें समेटा भी तो जा सकता है न ? बच्चों के लिए? बच्चों के लिए उनकी जरूरतों के हिसाब से हमारी तैयारी है ना ? याद है जब मैंने नौकरी शुरू की थी ,एक कंपनी में मेरा सिलेक्शन हो गया था और जिस दिन ऑफर लेटर लेने गई थी बाहर तुमने किसी को नौकरी के लिए गिडगिडाते देखा था। उसे नौकरी की बहुत जरूरत थी ,तब तुम्ही ने तो कहा था "क्यों ना तुम ये नौकरी छोड़ दो तो उसे ये नौकरी मिल जायेगी। तुम तो बस  ऐसे ही नौकरी कर रही हो ये तुम्हारी जरूरत थोड़े ही है। " उसका गिडगिडाना तुमसे  देखा नहीं गया था।  अब मेरी व्यस्तता की तुम्हे आदत हो गयी है।  तुम चाहते हो मैं व्यस्त रहूँ ताकि तुम्हारी व्यस्तता में मेरा खालीपन विघ्न ना डाले।  

जानते हो जब मैंने बच्चों को बताया की मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूँ तो उन्हें इस बात की तनिक भी ख़ुशी नहीं हुई।  बल्कि उन्होंने कहा क्या जरूरत है नौकरी छोड़ने की, हम लोग अपने काम कर तो लेते हैं।  उन्हें अब मेरे बिना ,अपनी माँ के बिना, रहने की आदत हो गयी है। फिर भी जब कभी उन्हें समय नहीं दे पाती हूँ तो अपना अपराधबोध छुपाने के लिए उन्हें गिफ्ट, आउटिंग या मूवी के लिए पैसे देती हूँ।  जानती हूँ ऐसा सोचना ठीक नहीं है लेकिन क्या करूँ ?विचारों को दिमाग में आने से रोक तो नहीं पा रही हूँ। 

कारण। कारण तो कुछ भी नहीं है बस मेरा मन नहीं लग रहा है।  ऑफिस का माहौल पहले से काफी बदल गया है मैं उसमे खुद को एडजस्ट नहीं कर पा रही हूँ  घुटन सी होती है।  खैर कह सकते हो इतने सालों में कई बार ऐसा माहौल मिला होगा लेकिन उस समय शायद मैं तैयार थी सब एडजस्ट करने के लिए लेकिन अब और नहीं करना चाहती।   कुछ सृजनात्मक करना चाहती हूँ  लेकिन नहीं कर पा रही हूँ ,दिमाग में थकान सी रहती है।  हाँ जानती हूँ नौकरी करने निकालो तो ये सब तो सहना पड़ता है और लोग भी तो सहन करते हैं लेकिन ये सहना जरूरी है क्या ? 

सबसे बात करके और खुद सोच सोच कर यह भी लगता है कि खाली नहीं रह पाऊँगी घर में।  एक दिन तो घर में रह नहीं पाती।  दिमाग का शोर घर के खालीपन से टकराकर प्रतिध्वनित होता है। लेकिन जब दिमाग शांत होगा तब घर के शांत वातावरण के साथ एकाकार होकर सृजन की राह पर बढेगा।  हाँ एकदम से ये नहीं हो सकता ,दिमाग में उठती विचारों की सुनामी को शांत होकर मनमोहक चमकती लहरों में बदलने में वक्त तो लगेगा।  
देखा एक छोटी सी बात पर कितने अगर मगर हो गए और मुझे उलझा गए । मैं अभी तक निश्चित नहीं कर पा रही हूँ क्या करूं ? कितना मुश्किल है न किसी निर्णय पर पहुंचना ? प्लीज़ मुझे बताओ न "मैं क्या करूँ ?"

कविता वर्मा