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बुधवार, 22 जून 2022

आवाज

 

आवाज 
कॉलोनी के अभिजात्य सन्नाटे को चीरती वह आवाज सूनी सड़कों पर दौड़ रही थी। सभी  घरों के दरवाजे खिड़की किसी आवारा हवा धूल इंसान और आवाज को घर में घुसने से रोकने के लिए कसकर बंद थे। न जाने क्यों और कैसे उस घर के ऊपरी कमरे की एक खिड़की खुली थी और वह आवाज उसमें बेधड़क घुस गई। जिसे सुनते ही वह किताब छोड़कर खिड़की पर आ गई ताकि बिना किसी टूट-फूट के उस आवाज को पकड़ सके। सबसे पहले उसने आवाज पहचानने की कोशिश की यह वही आवाज है इसका यकीन होते ही उसमें से शब्दों को चुनने लगी। शब्द भी लगभग जाने पहचाने थे नालायक, मक्कार, आलसी, कोशिश, कमी, जमाना, उसने गहरी सांस ली। हर बार वही शब्द वही बातें। वह खिड़की से हटकर कमरे में चहलकदमी करने लगी। पढ़ने से मन हट गया बीच-बीच में वह खिड़की से झांक लेती। उसकी नजर सामने के मकान की छत पर जाकर अटक जाती वहाँ कोई नहीं था। उसने एक बार झांक कर नीचे सड़क पर देखा वह भी सुनसान पड़ी थी। वह हाथ में पकड़ी पेंसिल को उंगलियों के बीच घुमाने लगी। खिड़की से बाहर झांकना जारी था तभी सामने छत पर एक परछाई सी दिखी। वह पेंसिल बिस्तर पर फेंक तेजी से छत की ओर भागी। परछत्ती का दरवाजा खोल उसने देखा वह अपनी छत पर परछत्ती की दीवार से टिका उदास खड़ा था। न जाने उसने आहट सुनी या उसे आभास हुआ उसने मुड़कर डबडबाई आंखों से उसकी तरफ देखा वह करुणा से भर उठी। उसी क्षण उसे उस आवाज़ के मालिक पर बेहतर  क्रोध भी आया। उन डबडबाई आंखों के आंसू पोंछने को वह तत्पर हो उठी लेकिन लोक लिहाज ने उसकी आवाज को रोक लिया। उसने हाथ के इशारे से पूछा क्या हुआ? सामने से एक इशारा प्रत्युत्तर में आया जो अस्पष्ट था लेकिन वह समझ गई थी। उसके चेहरे पर करुणा के भाव सघन हो गए जिसने डबडबाई आंखों के आंसुओं को जज्ब कर लिया। 
दोनों करीब पंद्रह मिनट तक छत पर खड़े एक दूसरे को देखते रहे। शब्द इस छत से उस छत पर नहीं जा सकते थे। उनके बीच में सड़क पर गिर जाने या किसी और से टकरा जाने का डर था लेकिन संवेदना बिना किसी डर के वहाँ पहुंच रही थी और उसके चेहरे से दुख अपमान उपेक्षा को पोंछकर उसे सामान्य कर रही थीं। तभी इस या उस घर से एक आवाज आई और एक दूसरे को हाथ हिलाकर होठों में बाय कहते दोनों नीचे उतर गए। 
पिछले डेढ़ महीने से जब से तनु हॉस्टल से अपने घर आई है यह सिलसिला यूं ही चल रहा है। वह एम ए का इम्तिहान दे चुकी है। अधिकतर हॉस्टल में रहते वह अड़ोस पड़ोस की ज्यादा जानकारी नहीं रखती लेकिन इतना जान गई है कि सामने वाले घर में रहने वाला अंकुर बी काॅम करने के बाद बेरोजगार है और उसके पापा का उसे आईएएस फिर सीए बनाने का सपना पूरा नहीं कर सकता क्योंकि उसे वह नहीं करना और इसलिए उनकी हताशा यूँ शब्द रूप में सारे बंध तोड़ निकल जाती है। उन्हें अंकुर का किसी से मेलजोल भी पसंद नहीं है इसलिए कोई चाह कर भी उनकी मदद नहीं कर सकता या शायद किसी को पता ही नहीं है कि उन्हें किसी मदद की जरूरत है। 
उस दिन असंयमित शब्दों ने सारी सीमा लांघ दी। तनु छत पर आई उसने इशारा किया और गाड़ी निकालकर गेट के बाहर निकल गई। न जाने कैसा विश्वास कायम हो गया था दोनों के बीच कि पीछे से आती आवाजों को अनसुना कर अंकुर भी उस दिन घर से निकल गया। सड़क के मोड़ पर खड़ी तनु ने साइड मिरर में उसे आते देख गाड़ी बढ़ा दी और उसका पीछा करते-करते वह उस कॉफी हाउस के सामने पहुंच गया। टेबल पर बैठते ही तनु ने पूछा क्या खाओगे? 
कुछ नहीं उसने झिझकते हुए जवाब दिया। दो कॉफी ऑर्डर करके तनु ने पूछा तुम क्या करना चाहते हो? 
बेहद अप्रत्याशित प्रश्न था यह। अभी तक कभी किसी ने उससे कभी नहीं पूछा था कि वह क्या करना चाहता है? उसे तो हमेशा यह बताया गया कि उसे क्या करना है, उससे क्या अपेक्षाएं हैं, क्या आशाएं हैं? वह आंसुओं में डूबता उसके पहले ही काफी की तेज मीठी महकती भाप ने उसे रोक लिया। एक बड़े अधिकारी का सामान्य बेटा जो कभी एवरेज नंबर से ऊपर नहीं उठ सका घरवालों के विरोध के बावजूद कॉमर्स ले बैठा और पहले उनके आईएएस बनने के सपने को तोड़ा फिर सीए बनने की आशा पर तुषारा पात किया। एक साधारण नौकरी मखमल से उनके स्टेटस पर टाट के पैबंद सी होगी इसलिए रोज शब्दों के गंगाजल से उस पैबंद को धोकर मखमल में बदलने की कोशिश की जाती है।
तनु ने अपनी स्नेह और सांत्वना भरी हथेली उसके ठंडे निराश हाथ पर रख दी। अंकुर को ऐसा लगा मानो डूबते हुए किसी मजबूत हाथ ने उसे थाम लिया। ढेर सारी बातें हुई वह क्या कर सकता है कैसे करना है कैसे सामना करेगा वगैरा-वगैरा? कॉफी खत्म होने के बाद डोसा, कोल्ड ड्रिंक, और फिर कॉफी ऑर्डर हो गई और अंकुर में नए आत्मविश्वास का संचार होता गया। उसकी आंखों में चमक आ गई, चेहरे पर खुशी छा गई, दिल में हौसला बढ़ता गया। आपने मेरे लिए... शब्द बीच में ही रुक गए तनु का हाथ रुकने का इशारा करता खड़ा था वह धीरे से मुस्कुरा दिया। 

अगले दस दिन रोज वही आवाज आवारा सड़कों पर घूमती ऊपरी कमरे की खुली खिड़की से अंदर जाती लेकिन अब तनु किताब पढ़ते हुए बस मुस्कुरा देती। अब वह परछत्ती के उस कमरे की तरफ न दौड़ती न ही बेचैनी से खिड़की पर खड़ी होकर किसी परछाई का इंतजार करती। सामने वाले घर की छत का दरवाजा भी अब बंद ही रहता। परछत्ती की दीवार के सहारे की अब किसी को जरूरत न रही। आवारा आवाज गलियों में भटकती गुम हो जाती। उस दिन अलसुबह वह आवाज अपनी ताकत भर चीखी। आज वह हर घर में दाखिल हो सबको बाहर बुला लाई। अंकुर घर छोड़कर चला गया यह खबर फुसफुसाहटों में गलियों में दौड़ी। सब कयास लगाने लगे चर्चा सांत्वना जोर पकड़ने लगी। तनु इत्मीनान से कमरे में किताब लेकर बैठी थी वह जानती थी अंकुर अपने आत्मविश्वास के साथ सुरक्षित है। और रोज गलियों में भटकती वह आवाज अब दम तोड़ चुकी है।
कविता वर्मा


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्‍छी प्रेरक कहानी। मां बाप को अपने बच्‍चों पर अपनी आकांक्षाओं को नहीं थोपना चाहिए। बच्‍चे जब समझदार हो जाते हैं तो उन्‍हें अपने फैसले स्‍वयं करने देने चाहिए। थोपा गया भार जिन्‍दगी भर का क्‍लेश बन जाता है

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद कविता जी आपने कहानी को समय दिया और आपको कहानी पसंद आई

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (25-06-2022) को चर्चा मंच     "गुटबन्दी के मन्त्र"   (चर्चा अंक-4471)     पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    

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