kahani kahani
मंगलवार, 8 अप्रैल 2014
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014
शायद तुम समझ सको
प्रिय डायरी ,
कहना तो ये सब मैं 'उनसे 'चाहती थी लेकिन तुमसे कह रही हूँ। अच्छा तुम्हारे बहाने उनसे कहे देती हूँ।
प्रिय ,
आजकल मेरे दिमाग में एक उथल पुथल सी मची है एक अजीब सी बैचेनी ने दिमाग में घर कर लिया है ,लगता है जैसे मैं कहीं कैद हूँ और उस कैद से छूटने के लिए छटपटा रही हूँ लेकिन उससे छूटने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा है बल्कि हर रास्ता मुझे वापस उसी बंधन की ओर,और ज्यादा धकेलता, कसता सा लगता है। मैं छूटना चाहती हूँ लेकिन किससे यही नहीं समझ पा रही हूँ क्योंकि जिन जिम्मेदारियों से मैंने खुद को हार की तरह सजाया था वही अब बंधन बन गए हैं। जब इन बंधनों से छूटने के लिए अपनों की ओर देखती हूँ उनके अपने तर्क होते हैं जो मेरे विचारों और तर्कों के साथ गडमग हो कर मुझे और उलझा जाते हैं।
कभी जब सबसे घबरा कर सब विचारों ,बातों को कर नए सिरे से सोचना शुरू करती हूँ तो लगता है बात तो कुछ भी नहीं है बस एक छोटी सी बात है कि मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूँ। हाँ बस छोटी सी बात अब मेरा नौकरी करने का मन नहीं है। पिछले पंद्रह सालों से ये नौकरी मेरे जीवन का हिस्सा बन गई है। मेरी पहचान इससे है और मैं इसकी आदि भी हो गयी हूँ लेकिन फिर भी अब मैं इससे आजाद होना चाहती हूँ।
करियर की महत्वाकांक्षा मुझे कभी नहीं रही ,हाँ मैं कुछ करना चाहती थी अपने को जानने ,समझने ,तलाशने और पाने के लिए। इस नौकरी ने बहुत कुछ दिया भी है। चीज़ों को समझने का नजरिया ,लोगों को जानने की समझ विकसित हुई है। मेरे व्यक्तित्व को संवारा है इसने। मेरा पहनावा ,बातचीत का ढंग सबमे सकारात्मक परिवर्तन आया है लेकिन अब मैं थक गयी हूँ ,घर बाहर की जिम्मेदारियां निभाते, थोडा आराम चाहती हूँ। जिस एकरस जीवन की नीरसता को तोड़ने के लिए नौकरी की थी वही नीरसता अब इस भागदौड़ में शामिल हो गयी है मैं निकलना चाहती हूँ इससे।
तुमने मुझे हमेशा आगे बढाया अभिभूत हूँ मैं। मेरी काबलियत पर जितना भरोसा तुम्हे था मुझे भी नहीं था। तुमने मुझे उड़ने के लिए विस्तृत आसमान दिया पर अब मैं पंख समेट कर फिर अपने बसेरे में लौटना चाहती हूँ। तुम क्यों मुझे उड़ान भरने को विवश कर रहे हो ,मेरे पंख थक गए हैं मुझे विश्राम करने दो।
जानते हो न रिश्तेदारों को ख़ुशी नहीं हुई थी जब मैं पहली बार घर से बाहर निकली थी। कितनी ही समझाइशें दीं गयीं थीं। क्या जरूरत है ,कितना कमा लोगी ,क्यों थका रही हो खुद को ? बच्चों को देखो। आज जब इस रास्ते पर इतना आगे निकल आई हूँ सब फिर समझाते हैं ,इतनी अच्छी नौकरी ,इतनी बड़ी कंपनी ,इतना पैसा क्यों छोड़ना चाहती हूँ ? क्या करूँगी घर में रह कर बोर हो जाऊँगी।
तुम्हारी भी तो अच्छी खासी नौकरी है अच्छी तनख्वाह है। मेरी तनख्वाह की तो जरूरत ही नहीं पड़ती। यहाँ तक की मेरे सारे खर्चे भी तुम ही पूरे करते हो। ना मुझे कभी ये शौक रहा कि मैं खर्च करूँगी न तुमने कभी मना किया। हमारे बीच तेरे मेरे पैसे जैसी कोई बात ही नहीं रही। हाँ मैं मानती हूँ कि पैसा कभी ज्यादा नहीं होता जितना आता जाता है जरूरतें उतना ही पैर पसारती जाती हैं लेकिन उन्हें समेटा भी तो जा सकता है न ? बच्चों के लिए? बच्चों के लिए उनकी जरूरतों के हिसाब से हमारी तैयारी है ना ? याद है जब मैंने नौकरी शुरू की थी ,एक कंपनी में मेरा सिलेक्शन हो गया था और जिस दिन ऑफर लेटर लेने गई थी बाहर तुमने किसी को नौकरी के लिए गिडगिडाते देखा था। उसे नौकरी की बहुत जरूरत थी ,तब तुम्ही ने तो कहा था "क्यों ना तुम ये नौकरी छोड़ दो तो उसे ये नौकरी मिल जायेगी। तुम तो बस ऐसे ही नौकरी कर रही हो ये तुम्हारी जरूरत थोड़े ही है। " उसका गिडगिडाना तुमसे देखा नहीं गया था। अब मेरी व्यस्तता की तुम्हे आदत हो गयी है। तुम चाहते हो मैं व्यस्त रहूँ ताकि तुम्हारी व्यस्तता में मेरा खालीपन विघ्न ना डाले।
जानते हो जब मैंने बच्चों को बताया की मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूँ तो उन्हें इस बात की तनिक भी ख़ुशी नहीं हुई। बल्कि उन्होंने कहा क्या जरूरत है नौकरी छोड़ने की, हम लोग अपने काम कर तो लेते हैं। उन्हें अब मेरे बिना ,अपनी माँ के बिना, रहने की आदत हो गयी है। फिर भी जब कभी उन्हें समय नहीं दे पाती हूँ तो अपना अपराधबोध छुपाने के लिए उन्हें गिफ्ट, आउटिंग या मूवी के लिए पैसे देती हूँ। जानती हूँ ऐसा सोचना ठीक नहीं है लेकिन क्या करूँ ?विचारों को दिमाग में आने से रोक तो नहीं पा रही हूँ।
कारण। कारण तो कुछ भी नहीं है बस मेरा मन नहीं लग रहा है। ऑफिस का माहौल पहले से काफी बदल गया है मैं उसमे खुद को एडजस्ट नहीं कर पा रही हूँ घुटन सी होती है। खैर कह सकते हो इतने सालों में कई बार ऐसा माहौल मिला होगा लेकिन उस समय शायद मैं तैयार थी सब एडजस्ट करने के लिए लेकिन अब और नहीं करना चाहती। कुछ सृजनात्मक करना चाहती हूँ लेकिन नहीं कर पा रही हूँ ,दिमाग में थकान सी रहती है। हाँ जानती हूँ नौकरी करने निकालो तो ये सब तो सहना पड़ता है और लोग भी तो सहन करते हैं लेकिन ये सहना जरूरी है क्या ?
सबसे बात करके और खुद सोच सोच कर यह भी लगता है कि खाली नहीं रह पाऊँगी घर में। एक दिन तो घर में रह नहीं पाती। दिमाग का शोर घर के खालीपन से टकराकर प्रतिध्वनित होता है। लेकिन जब दिमाग शांत होगा तब घर के शांत वातावरण के साथ एकाकार होकर सृजन की राह पर बढेगा। हाँ एकदम से ये नहीं हो सकता ,दिमाग में उठती विचारों की सुनामी को शांत होकर मनमोहक चमकती लहरों में बदलने में वक्त तो लगेगा।
देखा एक छोटी सी बात पर कितने अगर मगर हो गए और मुझे उलझा गए । मैं अभी तक निश्चित नहीं कर पा रही हूँ क्या करूं ? कितना मुश्किल है न किसी निर्णय पर पहुंचना ? प्लीज़ मुझे बताओ न "मैं क्या करूँ ?"
कविता वर्मा
सोमवार, 10 फ़रवरी 2014
पहली प्रतिक्रिया " परछाइयों के उजाले "
लेखिका कविता वर्मा जी की कहानियों की मैं बहुत प्रशंशक हूँ। सबसे पहले मैंने उनकी लिखी कहानी वनिता पत्रिका में पढ़ी। मुझे बहुत पसंद आई। कहानी का नाम था " परछाइयों के उजाले " !
जब मुझे मालूम हुआ कि उनका प्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले" के नाम से प्रकाशित हुआ है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैंने कविता जी से यह संग्रह भिजवाने का आग्रह किया। अभी कुछ दिन हुए मुझे यह मिला।
कविता जी कि लेखनी में एक जादू जैसा कुछ तो है जो कि पाठक को बांध देता है कि आगे क्या हुआ। लेखन शैली इतनी उम्दा है कि जैसे पात्र आँखों के सामने ही हों और घटनाएं हमारे सामने ही घटित हो रही हो।
बारह कहानियों का यह संग्रह सकारात्मकता का सन्देश देता है। इनके प्रमुख पात्र नारियां है। नारी मनोविज्ञान को उभारती बेहद उम्दा कहानियाँ मुझे बहुत पसंद आया। मेरी सबसे पसंद कि कहानियों में है ,' जीवट ' , 'सगा सौतेला ', 'निश्चय ',' आवरण ' और 'परछाइयों के उजाले '। बाकी सभी कहानियां भी बहुत अच्छी है।
" जीवट " में फुलवा को जब तक यह अहसास नहीं हो जाता कि सभी सहारे झूठे है , तब तक वह खुद को कमजोर ही समझती है। कोई भी इंसान किसी के सहारे कब तक जी सकता है।
" सगा सौतेला " जायदाद के लिए झगड़ते बेटों को देख कर भाई को अपने सौतेले भाई का त्याग द्रवित कर जाता है लेकिन जब तक समय निकल जाता है। यहाँ यह भी सबक है कि कोई किसी का हिस्सा हड़प कर सुखी नहीं रह सकता। पढ़ते - पढ़ते आँखे नम हो गई।
" निश्चय " कहानी भी अपने आप में अनूठी है। यहाँ एक मालकिन का स्वार्थ उभर कर आता है कि किस प्रकार वह अपने घर में काम करने वाली का उजड़ता घर बसने के बजाय उजड़ देती है। एक माँ को बेटे से अलग कर देती है। जब मंगला को सच्चाई मालूम होती है तो उसका निश्चय उसे अपने घर की तरफ ले चलता है।
" आवरण " कहानी भी भी बहुत सशक्त है। यहाँ समाज के आवरण में छुपे घिनौने चेहरे दर्शाये है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि एक औरत का कोई भी नहीं होता है। उसे अपने उत्थान और सम्मान के लिए पहला कदम खुद को ही उठाना पड़ता है और आवाज़ भी । तब ही उसके साथ दूसरे खड़े होते हैं। यहाँ भी सुकुमा के साथ यही हुआ। अगर वह आवाज़ नहीं उठाती तो वह अपने जेठ के कुत्सित इरादों कि शिकार हो जाती। औरत का आत्म बल बढ़ाती यह कहानी बहुत उम्दा है।
" परछाइयों के उजाले " एक अलग सी और अनूठी कहानी है। कहानी में भावनाओं के उतार चढाव में पाठक कहीं खो जाता है। यहाँ भी पढ़ते -पढ़ते आँखे नम हो जाती है। इस कहानी के अंत की ये पंक्तियाँ मन को छू जाती है , " नारी का जीवन हर उम्र में सामाजिक बंधनो से बंधा होता है जो कि उसकी किसी भी मासूम ख्वाहिश को पाने में आड़े आता है। "
कविता जी की सभी कहानियाँ बहुत अच्छी है। मेरी तरह से उनको हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं कि उनके और भी बहुत सारे कहानी संग्रह आएं।
मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ बल्कि एक प्रसंशक हूँ कविता जी कि कहानियों की।
जब मुझे मालूम हुआ कि उनका प्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले" के नाम से प्रकाशित हुआ है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैंने कविता जी से यह संग्रह भिजवाने का आग्रह किया। अभी कुछ दिन हुए मुझे यह मिला।
कविता जी कि लेखनी में एक जादू जैसा कुछ तो है जो कि पाठक को बांध देता है कि आगे क्या हुआ। लेखन शैली इतनी उम्दा है कि जैसे पात्र आँखों के सामने ही हों और घटनाएं हमारे सामने ही घटित हो रही हो।
बारह कहानियों का यह संग्रह सकारात्मकता का सन्देश देता है। इनके प्रमुख पात्र नारियां है। नारी मनोविज्ञान को उभारती बेहद उम्दा कहानियाँ मुझे बहुत पसंद आया। मेरी सबसे पसंद कि कहानियों में है ,' जीवट ' , 'सगा सौतेला ', 'निश्चय ',' आवरण ' और 'परछाइयों के उजाले '। बाकी सभी कहानियां भी बहुत अच्छी है।
" जीवट " में फुलवा को जब तक यह अहसास नहीं हो जाता कि सभी सहारे झूठे है , तब तक वह खुद को कमजोर ही समझती है। कोई भी इंसान किसी के सहारे कब तक जी सकता है।
" सगा सौतेला " जायदाद के लिए झगड़ते बेटों को देख कर भाई को अपने सौतेले भाई का त्याग द्रवित कर जाता है लेकिन जब तक समय निकल जाता है। यहाँ यह भी सबक है कि कोई किसी का हिस्सा हड़प कर सुखी नहीं रह सकता। पढ़ते - पढ़ते आँखे नम हो गई।
" निश्चय " कहानी भी अपने आप में अनूठी है। यहाँ एक मालकिन का स्वार्थ उभर कर आता है कि किस प्रकार वह अपने घर में काम करने वाली का उजड़ता घर बसने के बजाय उजड़ देती है। एक माँ को बेटे से अलग कर देती है। जब मंगला को सच्चाई मालूम होती है तो उसका निश्चय उसे अपने घर की तरफ ले चलता है।
" आवरण " कहानी भी भी बहुत सशक्त है। यहाँ समाज के आवरण में छुपे घिनौने चेहरे दर्शाये है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि एक औरत का कोई भी नहीं होता है। उसे अपने उत्थान और सम्मान के लिए पहला कदम खुद को ही उठाना पड़ता है और आवाज़ भी । तब ही उसके साथ दूसरे खड़े होते हैं। यहाँ भी सुकुमा के साथ यही हुआ। अगर वह आवाज़ नहीं उठाती तो वह अपने जेठ के कुत्सित इरादों कि शिकार हो जाती। औरत का आत्म बल बढ़ाती यह कहानी बहुत उम्दा है।
" परछाइयों के उजाले " एक अलग सी और अनूठी कहानी है। कहानी में भावनाओं के उतार चढाव में पाठक कहीं खो जाता है। यहाँ भी पढ़ते -पढ़ते आँखे नम हो जाती है। इस कहानी के अंत की ये पंक्तियाँ मन को छू जाती है , " नारी का जीवन हर उम्र में सामाजिक बंधनो से बंधा होता है जो कि उसकी किसी भी मासूम ख्वाहिश को पाने में आड़े आता है। "
कविता जी की सभी कहानियाँ बहुत अच्छी है। मेरी तरह से उनको हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं कि उनके और भी बहुत सारे कहानी संग्रह आएं।
मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ बल्कि एक प्रसंशक हूँ कविता जी कि कहानियों की।
शुक्रवार, 24 जनवरी 2014
परछाइयों के उजाले
'Parchhaiyon ke Ujale', a book by Kavita Verma .Stories are describing human behavior, women psychology ,their pressure and difficulties in taking decisions in day to day life and when pressure is in its extreme how they come up with strength to take decisions .
परछाइयों के उजाले लेखिका कविता वर्मा
सामाजिक कहानियाँ
मूल्य १२० रुपये (२४ फरवरी के पहले ऑर्डर पर )
फ्री पोस्टल
शुक्रवार, 3 जनवरी 2014
बाल कहानी :- ट्रेज़र हंट
कॉलोनी में लाइन से मकान बने हैं कहीं भी खेलने की जगह नहीं है। एक मंदिर के आसपास कुछ खाली जगह है जरूर जहाँ कॉलोनी की महिलाएँ अपने बच्चों को लेकर आती हैं या बुजुर्ग लोग बैठ कर गपशप करते हैं। वहाँ खेलने पर कोई न कोई उन्हें शोर या उछाल कूद ना करने कि नसीहत देते रहते हैं जो उन्हें पसंद नहीं है। इसलिए ये लोग यहाँ पुलिया पर बैठ कर बाते करते हैं।
तीनो लगभग साथ ही पुलिया पर पहुँचे और एक दूसरे को हाई फाई करते हुए मिले। दोस्तों से मिलने कि ख़ुशी उनके चेहरे पर चमक रही थी।
पुलिया पर बैठते ही संजू ने कहा "अरे रिंकू नहीं आया ?"रिंकू सोनू के घर की तरफ ही रहता है।
"पता नहीं मैं तो सीधे ही आ गया मुझे तो वह दिखा भी नहीं ,"सोनू ने कहा।
"आज क्या करना है" अभि ने पूछा जैसे शाम को मिलकर खेलने का कोई लक्ष्य होता है।
"आज क्या करें यार कहीं खेलने की भी जगह नहीं है यहीं बैठ कर बातें करते हैं। "सोनू ने कहा।
" तुम लोगों ने वो पानी कि टंकी की तरफ एक मकान देखा है जो खाली पड़ा है ?" संजू ने पूछा।
"कौन सा मकान ?"
अपनी कॉलोनी के पीछे जो बड़ी पानी कि टंकी है न उसी लाइन में एक बड़ा सा बंगला है कल मैं भैया के साथ उस रोड़ से निकला था तब मैंने देखा था। संजू ने विस्तार से बताया।
"हाँ होगा तो ?"अभि अब ऊबने लगा था।
"बहुत बड़ा बंगला है खाली पड़ा है उसके आस पास बहुत सारे पेड़ हैं किसी पुराने किले जैसा लगता है। "
"यार संजू बोर मत कर। हमें क्या करना है खाली मकान से ?" अभि ने थोडा चिढ़ कर कहा।
"अरे सुन तो अपन उस मकान में चलते हैं ट्रेज़र हंट खेलेंगे मज़ा आएगा।"
"ट्रेज़र हंट वो कैसे ?"सोनू थोडा उत्सुक हो आया।
"देख रिंकू को भी बुला लेते हैं फिर हममे से एक वहाँ कोई चीज़ छुपायेगा फिर उस जगह और चीज़ के लिए तीन हिंट देगा और उन हिंट के अनुसार बाकि लोग उस ट्रेज़र को ढूंढेंगे।"
"यार लेकिन रिंकू क्यों नहीं आया अभी तक ?"सोनू ने रास्ते को देखते हुए कहा।
"चलो ना उसके घर चलते हैं उसे ले आयेंगे। "संजू बोला।
थोड़ी देर देखते हैं शायद वो आ जाये , लेकिन ट्रेज़र हंट में हम छुपायेंगे क्या ? अभि को भी अब उत्सुकता होने लगी।
"देखो हमारे पास कुछ तो होगा जिसे ट्रेज़र बनाया जा सके जैसे कहते हुए संजू ने सोनू कि कलाई पर बंधी घडी की ओर इशारा किया , अगर संजू घडी छुपाता है तो इसके लिए तीन हिंट देगा ,ये गोल है इसे पहनते हैं या समय बताती है फिर दो हिंट देंगे कि ये किस दिशा में है या किस झाड़ी या चीज़ के पास है। "
"यार वो तो ठीक है लेकिन अगर तुम लोग मेरी घडी नहीं ढूँढ सके तो ? घड़ी गुमने पर मम्मी मुझे बहुत मारेंगी।" सोनू ने मायूसी से कहा।
"अरे बुद्धू तो तुझे तो पता होगा ना कि तूने घडी कहाँ छुपाई है हम उसे वहाँ से उठा लेंगे। " अभि ने हँसते हुए सोनू को एक चपत लगाईं।
सोनू झेंप कर सिर खुजाते हुए मुस्कुराने लगा।
तभी रिंकू दौड़ते हुए वहाँ आया और हाँफते हुए बोला "सॉरी यार आज मेथ्स का बहुत सारा होमवर्क था मम्मी ने कहा पूरा करके ही खेलने जाना इसलिए देर हो गयी। "
"चलो अब टाइम वेस्ट नहीं करते हैं" कहते हुए अभि और सोनू पुलिया से उतर गए और बोले चलो रेस लगाते हैं और संजू के बताये खाली बंगले की ओर दौड़ पड़े , उनके साथ संजू और रिंकू ने भी दौड़ लगा दी।
थोड़ी ही देर में वे चारों उस बंगले के सामने थे बंगले का गेट बंद था उस पर ताला लगा था। सामने झाड़ियों ने बेतरतीब जंगल का रूप ले लिया था। कुछ सूखी जंगली बेलें छत तक फैली थीं। पोर्च में धूल की मोटी पर्त जमी थी। छत तक जाने वाली सीढ़ियाँ बाहर से ही थीं। बंद दरवाज़ों खिडक़ियों पर धूल जमी थी। पोर्च से होकर मकान के पीछे जाने का रास्ता था।
"यहाँ क्यों आये हैं ?" रिंकू ने उत्सुकता से पूछा उसे अपने देर से आने पर अफ़सोस हो रहा था, पता नहीं दोस्तों ने क्या प्लानिंग कर ली है।
"पहले अंदर चलते हैं " संजू ने चारों तरफ देखते हुए कहा अभी यहाँ कोई नहीं है और गेट पर चढ़ कर अंदर कूद गया। उसके पीछे पीछे सनी अभि और रिंकू भी अंदर चले गए।
अंदर आकर सबने बंगले को चारों ओर से देखा। वह एक पुराना बंगला था जो बहुत समय से बंद पड़ा था। धूल , जाले, पुराने सूखे पेड़ और पत्तों से अटा पड़ा था। सीढ़ियों के नीचे कुछ कबाड़ पड़ा था। वे सभी सावधानी से एक दूसरे का हाथ पकड़ कर पोर्च से होते हुए बंगले के पीछे तरफ गए, वहाँ भी धूल ,जाले और कचरा पड़ा था।
"यहाँ कोई भूत तो नहीं होगा ना ?"रिंकू ने फुसफुसाते हुए पूछा तो सभी कि रीढ़ कि हड्डी में सिरहन सी दौड़ गयी।
"अरे भूत वूत कुछ नहीं होता ," संजू ने हिम्मत बटोर कर कहा। सबने धीमे से सिर हिलाया लेकिन फिर भी सबकी आँखों में डर बना रहा।
बंगले के पीछे थोडा अँधेरा सा था, अभि ने कहा "चल सामने चलते हैं यहाँ तो कुछ नहीं है। "
सामने आकर सबने रिंकू को खेल समझाया ,पहले दाम कौन देगा इसका फैसला ताली से किया गया अभि पर दाम आया।
संजू ,रिंकू और सोनू दीवार की तरफ मुँह करके खड़े हो गए। अभि ने अपनी जेबों को टटोला उसकी जेब में दस रुपये का सिक्का था उसने सिक्का मुठ्ठी में दबाया और चारों तरफ छुपाने की जगह देखने लगा। सिक्का छुपा कर बोला ओवर।
अभि को अब ट्रेज़र हिंट देना था। पहला हिंट उसने दिया 'उस चीज़ को देकर आप कुछ भी खरीद सकते हो।' दूसरा हिंट था,'वह किसी सामान के नीचे है 'और तीसरा हिंट था किसी तिरछी चीज़ के नीचे है।'
संजू ,रिंकू और सोनू सोचने लगे , कुछ खरीद सकते हैं मतलब पैसे ,नहीं नहीं रुपये यार आजकल पैसों में तो कुछ आता ही नहीं है। मतलब वह चीज़ रुपये है।
सोनू बोला ,"एक ,दो ,पाँच ,दस सभी रुपये हैं पर सिक्का है या नोट ?" उन्होंने अभि को देखा उसने कंधे उचका दिए।
"चल छोड़ न यार नोट या सिक्का ढूँढ लेंगे। "संजू बोला "दूसरा हिंट देखो किसी सामान के नीचे, सामान कौन सा ?"
"देख सीढ़ी के नीचे खाली डिब्बे पड़े हैं." रिंकू बोला।
"और हाँ सीढ़ियाँ तिरछी भी हैं ,"सोनू ख़ुशी से चिल्लाया।
तीनों तेज़ी से सीढ़ियों के नीचे भागे और सावधानी से एक एक डब्बा उठा कर देखने लगे ,एक गत्ते के डब्बे के नीचे उन्हें सिक्का मिल गया वे सिक्का उठा कर ख़ुशी से कूद कूद कर चिल्लाने लगे।
तभी सोनू ने कहा ,"यार चिल्लाओ मत अगर मकान में भूत होगा तो जाग जायेगा। "
"हाँ हाँ उठा कर बाहर आएगा और तुझसे चाय नाश्ता मांगेगा। "अभि ने कहा।
"यार चाय तो है नहीं हम सोनू को ही दे देंगे भूत इसका नाश्ता कर लेगा इतने में उसका पेट भर जायेगा। "संजू ने हँसते हुए कहा।
"ऐसे मज़ाक मत कर यार मुझे डर लगता है , मैं जा रहा हूँ। "सोनू ने नाराज़गी से कहा।
"अरे चलो खेलते हैं बातें मत करो। अब किसका दाम है ?"
रिंकू का दाम था उसने अपनी जेबें टटोलीं और छुपाने की जगह ढूँढने लगा. ट्रेज़र छुपा कर वह जल्दी से बाहर आया और बोला ओवर।
पहला हिंट था वह चीज़ प्लास्टिक और लोहे से बनी है ,दूसरा वह किसी लकड़ी की बड़ी सी चीज़ के नीचे है और तीसरा वह थोड़े अँधेरे में है।
संजू ,सोनू और अभि सिर खुजाने लगे। प्लास्टिक और लोहे से क्या बनता है ?चाक़ू ,हट यार रिंकू क्या जेब में चाक़ू रख कर घूमता है ?
"फिर क्या होगा ?"
"चम्मच जिसका हैंडल प्लास्टिक का हो।"
"नहीं यार कुछ और सोचो। "
"दूसरा हिंट क्या है ?"
"लकड़ी कि बड़ी सी चीज़ ,खिड़की नहीं दरवाज़ा मतलब दरवाज़े के नीचे। "
तीसरा हिंट है अँधेरे में। अँधेरा तो पीछे है यहाँ सामने तो धूप आ रही है अभी। "
तीनों पीछे भागे,"हाँ देख पीछे भी लकड़ी का बड़ा सा दरवाज़ा है इसके नीचे। "
"यार संजू नीचे से कैसे निकालेंगे कोई कीड़ा या छिपकली हुई तो ?"सनी ने डरते हुए कहा।
"अभि एक लकड़ी ले कर आना तो। "लकड़ी से दरवाज़े के नीचे टटोलते हुए कुछ अंदर को सरक गया।
"हट यार कुछ था लेकिन अंदर चला गया थोड़ी बड़ी लकड़ी लाना पड़ेगी। "
अभि एक बड़ी लकड़ी ढूँढ लाया। संजू ने सावधानी से लकड़ी को अंदर से बाहर किया तो एक शार्पनर बाहर आया।
" हे मिल गया ट्रेज़र "सोनू चिल्लाया।
संजू ने लकड़ी बाहर निकाली उसके साथ एक सोने कि चेन भी बाहर आ गयी।
" ऐ देख ये क्या है चेन सोने की है क्या ?"संजू ने सभी को दिखाते हुए कहा।
"हाँ हाँ सोने की लगती है , रिंकू तूने सोने की चेन छुपाई थी क्या ?"अभी ने पूछा।
"नहीं मैंने तो शार्पनर छुपाया था."
"फिर ये चेन किसकी है ?"संजू ने पूछा।
"लगता है जो यहाँ रहता होगा उसकी होगी। "
"कोई अपनी सोने कि चेन ऐसे फर्श पर क्यों छोड़ेगा ?"
"ए संजू देख इस दरवाज़े पर तो ताला लगा है। "अभि ने ताला दिखाते हुए कहा।
"लेकिन ताला तो आगे वाले दरवाज़े पर भी है फिर पीछे के दरवाज़े पर भी ताला क्यों ?"
"कहीं ऐसा तो नहीं कोई गड़बड़ हो ?"रिंकू बोला।
"कैसी गड़बड़ ?" तीनों एक साथ बोले।
"देख ये ताला नया है इस पर बहुत ज्यादा धूल भी नहीं है , लगता है कोई पीछे के रास्ते से यहाँ आता होगा " रिंकू ने सोचते हुए कहा।
"कौन ,चोर ! "तीनों एक साथ चीख पड़े। चारों ने एक दूसरे को देखा और वहाँ से भागे गेट पर चढ़ कर सड़क पर आये ही थे तभी उन्हें सामने दो मोटर बाइक पर आते चार पुलिस के जवान दिखे।
चार लड़कों को यूँ घबराया देख कर वे वहाँ रुक गए ,"क्या हुआ बच्चों तुम लोग ऐसे घबराये हुए क्यों हो ?"
"पुलिस अंकल ,संजू ने थूक निगलते हुए कहा हम लोग इस खाली बंगले में खेल रहे थे वहाँ हमें ये चेन मिली। "संजू ने हाथ आगे बढ़ाया लेकिन वह खाली था।
"कहाँ गयी चेन ?"चारों एक दूसरे का मुँह देखने लगे लगता है कहीं गिर गयी।
पुलिस अंकल ने संजू को ऊपर से नीचे तक देखा और बोले ,"बेटा पुलिस से मज़ाक करना ठीक नहीं है। "
"नहीं अंकल मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ सच में चेन थी लगता है कहीं गिर गई। "
तब तक अभि और रिंकू बंगले के गेट तक जाकर देखने लगे ,गेट के अंदर थोड़ी ही दूर पर चेन पड़ी थी।
"वह रही चेन कह कर अभि गेट पर चढ़ कर अंदर चला गया और चेन उठा लाया।
पुलिस के जवानों ने चेन देखी वह वाकई सोने की थी ,"ये तुम्हे कहाँ से मिली ?"
संजू ने अपना खेल और ट्रेज़र ढूँढने से चेन मिलने तक की सारी कहानी पुलिस के जवानों को कह सुनाई। दो पुलिस के जवान संजू को लेकर अंदर गए। संजू ने उन्हें वह दरवाज़ा , लकड़ी और रिंकू के हाथ से छूटा शार्पनर भी दिखाया। दरवाज़े पर लगे ताले की चमक और बंगले कि दीवारों पर जमी धूल कि परत को देख कर जवान सोच में पड़ गए। उन्हें यकीन होने लगा कि कुछ तो गड़बड़ है।
बाहर आ कर उन जवानों ने थाने फोन करके और पुलिस बल बुलवाया। अँधेरा होने लगा था ,चारों बच्चों को सुरक्षित घर पहुँचाना जरूरी था। एक जवान ने उन चारों का नाम पता डायरी में लिखा और दो जवानों से दोनों मोटर बाइक पर चारों को घर छोड़ आने को कहा। बाकी दो जवान बंगले से कुछ दूर खड़े हो कर उस पर नज़र रखते हुए पुलिस बल के आने का इंतज़ार करने लगे।
दूसरे दिन अखबार के पहले पन्ने पर बड़े बड़े अक्षरों में खबर छपी थी"खाली बंगले से लाखों का चोरी का सामान बरामद। "
संजू ने अपने मां पापा को सारी घटना बता दी थी ,सुबह संजू के पापा ने उसे खबर पढ़ कर सुनाई।
संजू का बहुत मन था कि वह अपने दोस्तों को वह खबर बताये लेकिन अभी तो स्कूल जाना था उनसे मिलने का समय ही नहीं था।
शाम को जब वह घर आया मम्मी पापा को कहीं जाने के लिए तैयार पाया उन्होंने उसे भी जल्दी से तैयार होने को कहा।
"हम कहाँ जा रहे हैं ?"संजू ने पूछा वह अपने दोस्तों से मिलना चाहता था लेकिन पापा ने कहा कि उसका साथ जाना जरूरी है जल्दी से तैयार हो जाये।
एस पी ऑफिस में अभि ,रिंकू और सोनू भी अपने मम्मी पापा के साथ मौजूद थे। एस पी साहब ने खुद चारों बच्चों को उनकी सतर्कता और पुलिस को खबर देने की उनकी अकलमंदी पर उन्हें बधाई दी चारों का फूलों के गुलदस्ते से अभिनन्दन किया गया वहाँ मौजूद पत्रकारों ने उनके फ़ोटो लिए और उनसे पूरी घटना का ब्यौरा लिया।
जाते जाते एस पी साहब ने चारों को फिर बधाई देते हुए कहा ,"आगे से वे सावधान रहें और किसी अनजान सुनसान जगह पर अकेले ना जाएँ ये खतरनाक भी हो सकता है। "
अगले दिन सारा शहर अपने इन ट्रेज़र के बारे में जान चुका था।
कविता वर्मा
रविवार, 14 जुलाई 2013
पहचान
कमरे की दीवारों ने सरसरा कर वेदिका को चौकन्ना कर दिया . पलकों में जमे आंसू अभी सूखे नहीं थे जाने कितनी देर रोते रोते अभी तो आँख लगी थी कि दीवारों ने सरसराकर उसे जगा दिया .इस महल समान घर में अब यही दीवारें तो उसकी अपनी रह गयी थीं जो कभी उसे सर टिकाने को सहारा देती तो कभी उसके दुःख की साक्षी बन उसे सान्तवना देती . जब सूनी सेज की सलवटें उसे चुभने लगती वह उन्हें मुठ्ठी में भींच कर विदित की धडकनों को महसूस करने की कोशिश करती और नाकाम रहने पर इन्ही दीवारों से सहारा पाती .
वेदिका ने उठ कर दीवारों की सरसराहट का मकसद जानने की कोशिश की फिर धीरे से दरवाज़ा खोल कर बाहर झाँका वहाँ कोई नहीं था . तभी हवा में तैरती एक तरंग उसका नाम लेकर आयी तो वेदिका ने कान लगा कर सुनने की कोशिश की . मम्मीजी के कमरे से जेठजी की आवाज़ आ रही थी .
"अब उसका यहाँ क्या काम है विदित चला गया अब उसका यहाँ रहने का कोई हक नहीं बनता ."
" तो क्या करें घर से निकाल दें ?उसके माँ बाप ने तो विदित के जाने पर अफ़सोस करने आना भी जरूरी नहीं समझा .अब उसे उठा कर सड़क पर तो फेंक नहीं सकते " ये मम्मीजी का स्वर था .
" वही तो मम्मीजी जब उसके माता पिता तक उससे सम्बन्ध रखने को तैयार नहीं हैं तो हम भला क्यों इस पचड़े में पड़ें ? आज वह कल उसका बच्चा कब तक उसे कमा कर खिलाएंगे .हमारा खाएगी और कल को हमसे ही हिस्सा माँगने खड़ी हो जाएगी . क्या हक बनता है उसका ? मैं तो कहती हूँ उसे अभी घर से निकाल दो फिर उसे जहाँ जाना हो जाये . चाहे माँ बाप के घर या और कहीं .ये तो विदित से भाग कर शादी करने से पहले सोचना था ." ये भाभी की आवाज़ थी ,वही भाभी जो उसकी और विदित की शादी से नाखुश होकर भी विदित के सामने उसके साथ मुंह में मिश्री घोल कर बतियाती थीं .आज मिश्री थूक कर दिल में इकठ्ठे किये सारे जहर को जबान पर ले आयीं थीं .
बस करो तुम लोग एक तरफ़ा सोचते और बोलते हो .ऐसे ही घर से निकाल दोगे तो जाएगी कहाँ सडकों पर रहेगी ? उसकी अपनी तो कोई पहचान है नहीं पहचानी जाएगी हमारे परिवार की बहू के रूप में ही न ? फिर क्या इज्ज़त रह जाएगी हमारी ? अभी विदित को गए महिना भर भी नहीं हुआ थोडा धीरज धरो सोचते है क्या करना है ? अभी लोगों में विदित के एक्सीडेंट और मौत के चर्चे हैं विदित से उसकी पहचान है समय के साथ ये पहचान धुंधली हो जाएगी तब तक धीरज रखो .बाबूजी ने कहा .
कमरे का दरवाज़ा खुला तो वेदिका आड़ में हो गयी .उसका समूचा अस्तित्व झनझना उठा .उसकी खुद की कोई पहचान नहीं है .विदित के जाने के बाद इस घर में उसके लिए कोई जगह नहीं है . विदित के होने वाले बच्चे का इस घर में कोई हक नहीं है . विदित के जाने के बाद ये उस पर दूसरा कुठाराघात था .
चार महीने पहले उसने और विदित ने मंदिर में शादी कर ली थी .वेदिका एम बी ए की मेधावी छात्रा थी और विदित एक स्थापित वकील .किसी सेमीनार में दोनों का परिचय हुआ था और पहली ही नज़र में प्यार हो गया .छ महीने में स्थिति एक दूसरे के बिना ना जीने की सी हो गयी .परिवारों के मानने की सम्भावना नहीं के बराबर थी इसलिए दोनों ने हाँ ना के पचड़े में पड़ने की जरूरत ही नहीं समझी . हाँ शादी करके वे सबसे पहले वेदिका के घर पहुंचे थे जहाँ पहले रिवाज के तौर पर उनके मुँह पर दरवाज़ा बंद कर दिया गया . वहाँ से निकलते ही वेदिका की रुलाई फूट पड़ी ऐसी विदाई की तो उसने कल्पना ही नहीं की थी . विदित देर तक उसे ढाढ़स बँधाता रहा . विदित के घर पहुँचने के पहले ही कोई शुभचिंतक ये खबर पहुँचा आया था . घर का दरवाज़ा नौकर ने खोला और आशीर्वाद के नाम पर सुनने को मिला तुमने हमारी नाक कटवा दी ,कहीं मुंह दिखने लायक नहीं छोड़ा .
विदित ने वेदिका के डूबते दिल को सहारा दिया . उसने अगले ही दिन कश्मीर की टिकिट बुक करवा ली . पंद्रह दिन दोनों दीन दुनिया से दूर एक दूसरे में खोये दिलों के घाव को भरने में लगे रहे जो उनके अपनों ने उन्हें दिए थे .
वापस आने पर भी ज्यादा कुछ नहीं बदला था .विदित उसकी ढाल बना रहा . मम्मीजी और भाभी का व्यवहार बेइज्जती की हद तक रुखा था लेकिन वेदिका धीरज से सहती रही . उसे विशवास था कि एक दिन वह सबका दिल जीत लेगी . पढ़ाई शुरू करने का विदित का प्रस्ताव भी उसने इसीलिए टाल दिया क्योंकि अभी वक्त कच्चे रिश्तों को संवारने का था . रिश्ते संवरते इसके पहले ही एक एक्सीडेंट में विदित की जिंदगी की डोर कच्चे धागे सी टूट गयी ओर इसी के साथ वेदिका की हर आस भी टूट गयी .
पंद्रह दिनों तक मेहमानों का आना जाना लगा रहा .जिन मेहमानों को दुल्हन के रूप में मुँह दिखाई का अवसर नहीं मिला था नियति ने आज उन्हें उसके जख्मों को कोंचने का अवसर दे दिया था . कईओं ने विदित के रूप में इस घर से घनिष्ठ होने के जो सपने संजोये थे उसकी किरचें उसके जख्मी मन पर बिखेर कर संतुष्टि पाई थी . वेदिका ने पथराये मन से सब झेला लेकिन वह भावनाओं से भीगे एक कोमल काँधे के सहारे के लिए छटपटाती ही रही .
आठ दिन पहले उस दिन सुबह सुबह वेदिका चक्कर खा कर गिर पड़ी .जब आँख खुली तो डॉक्टर को प्रिस्क्रिप्शन लिखते और कहते सुना "प्रेगनेंसी कन्फर्म करने के लिए कुछ टेस्ट लिख रहा हूँ जल्दी ही करवा लें." सबके मुंह में जैसे कुनैन घुल गयी थी और शायद सबने यही मनाया हो कि ये टेस्ट नेगेटिव आये . खुद वेदिका भी नहीं समझ पाई थी कि इस खबर पर खुश होए या रोये ,बस पेट पर हाथ रखे सुन्न सी बैठी रही . हाँ एक आस सी जरूर जागी थी कि शायद इस बच्चे की वजह से इस घर में उसे थोड़ी सी जगह मिल जाए .
अगले दो ही दिन में उसने जाना की बच्चे का माँ से कितना गहरा नाता होता है .माँ से नफरत बच्चे से भी बेगानापन पैदा कर देती है ,उस समय बच्चे से पिता का अंश जैसे विलीन हो जाता है वह सिर्फ माँ से नफरत जताने का पर्याय बन जाता है .वेदिका ने कम से कम मम्मीजी की आँखों में विदित के अंश के लिए कोमल भाव देखना चाहे थे लेकिन उसने जाना कि नफरत की भावना इतनी तीव्र होती है जिसमे प्यार अपनापन जैसी भावनाएं झुलसकर दम तोड़ देती हैं . वहाँ उसे सिर्फ वीरानगी ही नज़र आयी एक अजीब सी तटस्थता जैसे वह बच्चा सिर्फ और सिर्फ वेदिका का है जिसके साथ उनका कोई रिश्ता न था न है और ना ही उस बच्चे से जो उसके कोख में पल रहा है विदित के अंश के रूप में . मानो विदित के जाने के साथ ही उस अंश का समूचा अस्तित्व ही ख़त्म हो गया हो और वह सिर्फ उनकी नफरत का ही अधिकारी है . हाँ इससे एक बात जरूर हुई उस एहसासों से खाली रेगिस्तान में चलते सच के नुकीले काँटों ने उसे जता दिया कि इस घर में न तो उसका कोई स्थान था न कभी होगा .
आज की बातचीत से तो उसे लगा कि विदित के नाम से जो थोड़ी बहुत उसकी पहचान है उसके धुंधला होने पर उसका अस्तित्व ही रौंदा जा सकता है .माता पिता से मिली पहचान तो उनके सम्बन्ध तोड़ते ही गुम हो चुकी थी . अब उसे अपनी खुद की एक पहचान की जरूरत थी जिसके साथ वह और उसका बच्चा जी सकें .
सारी रात दीवारें उसकी सिसकियों से लरज़ती रहीं .सुबह सारे घर की दीवारें करुण विलाप से थरथरा गयीं तो उसकी आँख खुली . उठ कर खड़े होते होते लकड़ी सी अकड़ गयी टांगों ने सहारा देने से इंकार कर दिया .दस मिनिट लगे होंगे उसे व्यवस्थित होने में .कमरे से बाहर आयी तो उसके पैर वहीँ ठिठक गए .चार महीनों में पहली बार किसी अपरिचित चेहरे पर उसे एक जोड़ी आँखों में करुणा नज़र आयी . उन आँखों की मालकिन को तो वो नहीं जानती थी लेकिन संवेदना की डोर से वह उन फैली बाहों तक खिंची चली आयी . उसकी पीठ सहलाते हाथों के कोमल स्पर्श ने अनकही संवेदना को उस तक पहुंचा दिया .तभी घूरती कठोर नज़रों ने उसे यथार्थ में ला पटका . वह छिटक कर अलग हो गयी . काम करते भी कई बार उसने उन नज़रों की तरलता महसूस की .हालांकि उनका परिचय वह अब तक नहीं जान सकी थी .भाभी से पूछा भी था लेकिन कोई जवाब नहीं मिला .
आधी रात के लगभग वेदिका की नींद खुली दरवाजे पर खटखटाहट सी हुई थी . असमंजस में उसने दरवाजा खोला तो वही दो आँखें नज़र आयीं . हाथों ने कोमलता से उसे धक्का देकर अन्दर किया और दरवाज़ा बंद हो गया . लाईट जलाने के लिए बढ़ते हाथों को दृढ़ता से रोक दिया गया .नाईट बल्ब के धीमे प्रकाश में उसे चुप रहने का इशारा करते हाथों ने हाथ थाम कर अपने पास बैठा लिया .
मैं विदित के मामा की बेटी हूँ .विदित से बहुत क्लोज थी . तुमसे शादी के बारे में विदित ने सिर्फ मुझे बताया था . मैं हमेशा उसका साथ दूँगी ये मेरा उससे वादा था . अब विदित तो रहा नहीं लेकिन तुम तो हो इसलिए अब तुम्हारे बुरे वक्त में तुम्हारी मदद करके अपना वादा निभाना चाहती हूँ . इसी के इंतज़ाम में लगी थी इसलिए यहाँ एक महीने बाद आयी . फुसफुसाते स्वर में उन्होंने अपने आने का मकसद बताया .
तुम तो एम बी ए कर रहीं थीं न ? तुम्हारी मार्कशीट और बाकी सारे पेपर्स कहाँ हैं ?
मेरे पास हैं . वेदिका ने भी अपनी आवाज़ को भरसक धीमा करते हुए कहा .
विदित का अकाउंट और उसका ए टी एम ? कितने पैसे हैं उसके अकाउंट में ?
मेरे पास हैं लगभग दो लाख रुपये होंगे .उसके स्वर में उलझन थी .
तुम्हारे गहने या और कुछ मिला कर क्या है ?
एक सेट डायमंड का है यही कोई अस्सी नब्बे हज़ार का ,उसके अलावा कुछ खास नहीं .
तुम अपने पेपर्स मुझे दे दो यहाँ से बहूत दूर साउथ की एक यूनिवर्सिटी में मैंने बात कर ली है वहाँ तुम्हारा रजिस्ट्रेशन करवा रही हूँ अपनी पढ़ाई पूरी करो . अपना जरूरी सामन एक बेग में रखना मैं टिकिट बुक करवा कर मैसेज करूंगी तुम यहाँ से भाग जाना .यहाँ तुम और तुम्हारा बच्चा दोनों ही सुरक्षित नहीं हैं . चली जाओ यहाँ से अपनी पहचान बनाओ ताकि फिर कोई तुम्हारी तरफ आँख न उठा सके .
वेदिका हतप्रभ सी बैठी सुनती रही अचानक ये क्या हो गया वह समझ ही नहीं पायी .
उठो पेपर्स दो मुझे जल्दी . दो हाथों ने उसे झकझोर दिया .
वेदिका हडबडा कर उठ खड़ी हुई उसने अपने पेपर्स दिए फोन नंबर लिख कर दिया . उन दो आँखों के करुण भाव की पहचान ने उनकी हर बात पर विश्वास करवा दिया था जिसके दम पर वह खुद की पहचान बनाने के उनकी हर योज़ना के लिए तैयार हो गयी थी .
अगले दस मिनिट में पूरी योज़ना बन गयी थी फिर कमरे में सन्नाटा छा गया .जाते जाते दो हाथों ने उसे मजबूती से थाम कर दृढ़ स्वर में कहा " आगे की जंग तुम्हे अकेले लड़नी है लेकिन इन बेगानों के बीच के अकेलेपन से ज्यादा अकेलापन वहाँ नहीं होगा विश्वास करो .मैं भी लगातार तुम्हारे संपर्क में नहीं रह पाउंगी वर्ना मेरे माध्यम से ये लोग तुम तक पहुँच जायेंगे लेकिन हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी अपनी तरफ से तुम्हारी खैर खबर लेती रहूँगी बस तुम हिम्मत ना हारना . अपनी पहचान बना कर अपने और अपने बच्चे के हक के लिए वापस लौटना .
वेदिका देर तक वैसी ही बैठी रही .आँसूं गालों से ढुलक कर गोद में समाते रहे . खुद की पहचान बनाने के लिए उसे अपनी मौजूदा पहचान से दूर बहुत दूर हो जाना है एक अनजानी दुनिया में अकेले सिर्फ अपने दम पर ताकि इस घर के लोग उसे ढूंढ ना सकें . उनके मन के प्रॉपर्टी खो देने या उसके हिस्से होने के डर के सामने उसके कोख में पलते विनीत की आख़िरी निशानी और वह खुद विनीत का प्यार उनके लिए कोई मायने नहीं रखते .
स्वार्थ और लालच के वशीभूत इंसान की सोच कितनी संकीर्ण हो जाती है कि उसके परे अपनों की निशानियाँ भी अपने अर्थ खो देती हैं .वेदिका ने अपने प्यार के प्रतिफल में जीवन की कुछ ऐसी ही कड़वी सच्चाइयों को देखा है जिन्होंने उसे भीतर तक तोड़ दिया .
कई बार वह सोचती काश वह भी उस दिन विनीत के साथ होती लेकिन फिर उसकी ममता उसे धिक्कारती इस नन्ही जान को इस दुनिया में आने से रोकने का तुम्हे कोई हक नहीं है . वह सोचती अपने अजन्मे बच्चे से उसे इतनी ममता है फिर कैसे उसके माता पिता जिनके साथ वह चौबीस साल रही पल -पल उनकी आँखों के सामने बढ़ी सुख दुःख के पल साथ जिए उनकी ख़ुशी का कारण रही उन्होंने एक पल में उसे इतना पराया कर दिया कि उसकी ख़ुशी में न सही उसके दुःख में भी साथ देना जरूरी नहीं समझा .उसे तो एक न एक दिन उस घर से जाना ही था अगर उसने अपनी मरजी से जीवन साथी चुना तो क्या इतना गलत हो गया कि इस तरह रिश्तों को नफरत की कब्र में दफन कर दिया जाये .
उसका मन नहीं मानता दिल के किसी कोने से आवाज़ आती ऐसा नहीं हो सकता कि उस पर इतना बड़ा दुःख टूटे ओर मम्मी का दिल न पसीजे .ये खबर सुन कर वे तो जरूर रोई होंगी . रोये तो पापा भी होंगे लेकिन शायद उसने ही उन्हें इस शर्मिंदगी में डाल दिया था या शायद कोई और मज़बूरी हो कि वे यहाँ नहीं आये .
एक अनजान शहर अनजान मंज़िल पर जाने के नाम से उसका दिल काँप रहा था . उसका मन हुआ वह वापस अपने घर चली जाये मम्मी पापा के पैर पकड़ कर माफ़ी मांग ले मम्मी की गोद में सिर रख कर खूब रो ले .लेकिन नकार दिए जाने का डर शायद दुनिया का सबसे बड़ा डर है जिसने उसके इन इरादों और कदमों को कमजोर कर दिया . यह तो तय था कि बिना अपनी पहचान बनाये न तो वह न उसके प्यार की निशानी ही सुरक्षित थी यही ख्याल उसे जीने की प्रेरणा देता और बेगाने हो चुके अपनों के सामने अपनी पहचान बनाने का निश्चय दृढ़ होता जाता .
अगले दिन दोपहर में वेदिका चुपके से घर से निकल कर बैंक पहुँची। उसने अपना और विदित का अकाउंट बंद करवा कर अपने पुराने नाम वेदिका शर्मा के नाम से नया अकाउंट खुलवाया आधे पैसे फिक्स डिपोसिट किये कुछ जमा किये और कुछ कैश लेकर घर आ गयी .अलमारी से एक बेग निकाल कर कपड़ों के नीचे रुपये छुपा कर रखे . शादी वाले दिन पहनी साड़ी हाथ में लेते ही यादें नदी की तरह आँखों से बहने लगी .उसी साड़ी में उसने विदित और उसकी शादी की तस्वीर और शादी का सर्टिफिकेट लपेट कर रख दिया .वह कम से कम सामान अपने साथ ले जाना चाहती थी लेकिन विदित की खुशबू से रची बसी किसी भी चीज़ को छोड़ने का मन ही नहीं हुआ .
तीन दिन बाद शाम पांच बजे एक मेसेज़ आया रात दो बजे की गाड़ी का ई टिकिट था .कुछ ही देर बाद एक और मेसेज आया ट्रेन में बैठ कर इस सिम को निकाल देना और फिर कभी इसका इस्तेमाल मत करना .
रात एक बजे पूरा घर सन्नाटे में डूबा था वेदिका ने घर से निकल कर स्टेशन की राह ली .ट्रेन आने में दस मिनिट की देरी थी घबराहट में वह बार बार घडी देख रही थी . एक बार पहले भी उसने घर छोड़ा था तब विदित उसके साथ था तब उसे बिलकुल डर नहीं लगा था .आज एक अनजाना डर उसे बैचेन कर रहा था जाने वह पकडे जाने का डर था या अनजान सफ़र पर जाने का डर .
ट्रेन की रफ़्तार के साथ वेदिका के दिल की धड़कनें भी तेज़ होती गयीं। उसने बहुत कोशिश की कि नींद आ जाये पर देर तक वह करवटें बदलती रही .
सुबह आँख खुली तो देखा काफी दिन चढ़ आया था मोबाइल बंद था कहीं किसी से कोई संपर्क नहीं था खचाखच भरी ट्रेन में भी वह खुद को किसी वीरान टापू पर अकेले सा पा रही थी .
अकेलापन किसी का साथ न होना नहीं है अकेलापन तो किसी का साथ महसूस न होना है .ट्रेन में कई लोग अकेले सफ़र कर रहे थे पर वे अकेले कहाँ थे ?वेदिका के साथ ट्रेन के सभी यात्री थे लेकिन वह बिलकुल अकेली थी .
शाम सात बजे वह किसी स्टेशन पर उतरी एक आदमी ने उसके पास आकर नाम पूछा और सामान टेक्सी में रख दिया . एक होस्टल में उसके रहने का इंतज़ाम था . राधिका ने सारा इंतजाम किया था .
अगले दिन सुबह वार्डन के ऑफिस में राधिका का फोन आया . ओपचारिक बातों के बाद उसने बताया कि उसके एडमिशन के पेपर्स वार्डन के पास हैं वह कॉलेज जाना शुरू कर दे . कोई परेशानी हो तो वार्डन आशा जी से कहे . पास ही एक लेडी डॉक्टर है चेक अप करवाती रहे घबराना मत मैं तुम्हारे साथ हूँ यहीं फोन करती रहूंगी लेकिन ज्यादा नहीं .
राधिका ने ही बताया कि तुम्हारे गायब हो जाने से घर में कोहराम मचा हुआ है .राधिका के जाने के बाद ही वेदिका ने घर छोड़ा था इसलिए उसके पास कई बार फोन आ चुका है हो सकता है वो लोग अपने प्रभाव से उसके फोन की निगरानी भी करें इसलिए वह पब्लिक बूथ से बात कर रही है .
आशाजी एक अधेड़ उम्र की सहृदय महिला थीं उन्होंने वेदिका के एडमिशन से लेकर डॉक्टर से चेकअप करवाने तक हर चीज़ में मदद की .वेदिका की दुःख भरी कहानी ने उन्हें द्रवित कर दिया था .वे जब भी खाने की कोई डिश बनातीं वेदिका के लिए जरूर बचा कर रखतीं . होस्टल में अधिकतर लडकियाँ कामकाजी थीं धीरे धीरे उनके साथ वेदिका का अकेलापन घुलने लगा .जान पहचान से प्यार भरे रिश्ते पनपने लगे .ज्यों ज्यों दिन चढ़ने लगे रिश्ते परवान चढने लगे कोई बड़ी बहन के अधिकार से तो कोई छोटी बहन के से प्यार से वेदिका को हाथों हाथ रखता .
होस्टल की नीरस जिंदगी में वेदिका और आने वाला नन्हा एक नयी हलचल सी भर रहे थे . सच ही कहा था राधिका ने इन अनजानों के बीच अपनों से कम ही अकेलापन होगा .रात के स्याह अँधेरे में ही वेदिका अकेली होती उसमे भी एक नन्ही चंचल आवाज़ उसे पुकार कहती " माँ मैं हूँ न " .
पहले सेमेस्टर की एग्जाम हो चुकी थी वेदिका को विश्वास था कि वह बहुत अच्छे नंबरों से पास होगी . कॉलेज बंद थे वेदिका सारा दिन नन्हे से बतियाती .उसे अक्सर ख्याल आता 'घर में सब कैसे होंगे क्या अब भी मुझे ढूंढ रहे होंगे ? क्या मुझे खोजते मम्मी पापा के यहाँ गए होंगे ? वहाँ मुझे न पाकर क्या प्रतिक्रिया दी होगी ? क्या मम्मी पापा ने भी मुझे ढूँढने की कोशिश की होगी ? या वे अब तक मुझ से नाराज़ हैं ? क्या उन्हें अब भी मेरी फिक्र है ? जब इनमे से किसी सवाल का कोई जवाब नहीं मिलता वह अपने मन को तसल्ली देने को खुद ही जवाब देती और खुद ही उन्हें नकारती .

उस रात जब वेदिका को दर्द उठा पूरा होस्टल जाग गया . रात दो बजे वह नन्ही कली प्रस्फुटित हुई तो उसकी महक से वेदिका का जीवन ही नहीं पूरा होस्टल भी महक उठा .
हॉस्पिटल से आने पर ढोल नगाड़े ,जच्चा बच्चा गीतों के साथ दोनों का स्वागत हुआ .अनुभवी महिलाओं ने उनकी देखभाल की जिम्मेदारी ले ली .कॉलेज की लड़कियों ने उसे नोट्स दे दिये थे .
अपनों के बेगानेपन के घाव बेगानों के अपनेपन ने भर दिए थे . तीन हफ्ते आराम करने के बाद अब वह दो तीन घंटों के लिए कॉलेज जाने लगी थी .नाईट ड्यूटी वाली लडकियाँ नन्ही कली का ध्यान रखतीं .
राधिका का फोन आया था उसने उसे बधाई दी .वेदिका उससे बहुत कुछ पूछना चाहती थी लेकिन उसने जवाब दिया तुम किसी की चिंता मत करो अपनी पढ़ाई और सेहत पर ध्यान दो .
कली की कोमल मुस्कान अब वेदिका को कुछ और सोचने का मौका नहीं देती थी . आखिरी सेमेस्टर करीब था और वेदिका के पैसे ख़त्म होने को थे .वह डायमंड सेट अभी भी उसके पास था वह विदित का दिया गिफ्ट था इसलिए उसे बेचने का मन वह नहीं बना पा रही थी .कॉलेज पढ़ाई और कली की देखभाल के बाद समय ही नहीं बचता था कि वह कोई और काम कर सके .होस्टल की फीस और मेस का बिल भरना था .
उसे परेशान देख कर आशाजी ने पूछा क्या बात है ? उन्होंने सेट देखा सुनार से उसकी जांच करवाई और कहा अगर वह चाहे तो सोने की चेन उनके पास रख कर पैसे ले ले जब वह नौकरी करने लगेगी पैसे चुका कर चेन वापस ले ले . वेदिका की आँख भर आयी एक ओर आशाजी की सहृदयता थी तो दूसरी और चेन पहनाते विदित की उंगलियों का गुदगुदा स्पर्श .बहुत सोचने के बाद उसने कान के टॉप्स रख कर पैसे ले लिए .
पढाई पूरी होते ही वेदिका को अच्छी नौकरी मिल गयी कली भी सवा साल की हो गयी थी थोड़े समय होस्टल में और दो तीन घंटे क्रेच में उसे छोड़ने की व्यवस्था की गयी . नौकरी मिलने पर राधिका ने उसे बधाई दी .वेदिका ने सबके हाल चाल जानने चाहे तो उसने इतना ही कहा "अपने मन को कमजोर मत बनाओ अभी तो नौकरी मिली ही है पहले अपने पैर जमाओ अपनी पहचान बनाओ फिर एक दिन तुम्हे वहाँ जाना ही है . वैसे भी वहाँ कुछ नहीं बदला ."
ये जानकार भी वेदिका का मन बार बार वापस जाने का हो रहा था . एक बार वह अपने मम्मी पापा से मिलना चाहती थी . उन्हें बताना चाहती थी कि उसने हर बाधा को पार करके अपनी मंजिल पा ली है .विदित के मम्मी पापा को दिखाना चाहती थी कि उसका और विदित का प्यार कितना सच्चा था और उस प्यार की निशानी कली कितनी मासूम है .
रिश्तों की कशिश शायद यही होती है जिससे आप जुड़ाव महसूस करते हैं या वो जिनसे करीबी रिश्तों के बाद दूरियां बन गयी है मन चाहता है उन्हें हमारे ख़ुशी और दुःख के बारे में जरूर पता चले .चाहे सारी दुनिया आपकी ख़ुशी में शामिल हो लेकिन जब तक रिश्ते आपके साथ न हों हर ख़ुशी अधूरी और हर सान्तवना सतही ही लगती है .
समय ने गति पकड़ ली . वेदिका को तरक्की मिल गयी .कली भी स्कूल जाने लगी . भावनाओं का प्रवाह मंथर हो चला था . वेदिका ने एक छोटा सा फ्लेट ले लिया कली की किलकारियों और भोली मासूम बातों से उसे सजा संवार लिया था .घर के दरवाजे पर उसके नाम की तख्ती उसकी पहचान बता रही थी बिना किसी और नाम के सहारे के .एक नामी कंपनी की सी इ ओ थी वह अपना नाम अपनी पहचान के साथ .
एक दोपहर जब वेदिका लंच के बाद अपने केबिन में लौटी वहाँ किसी को बैठा देख कर चौंक गयी .उसके आने की आहट से जब वे पलटे ख़ुशी और आश्चर्य से वेदिका की चीख निकल गयी .
मम्मी पापा आप यहाँ कैसे ? कैसे हैं आप ? वेदिका मम्मी से लिपट गयी सालों के जमा गिले शिकवे पानी बन कर बह गए .
एक पत्रिका में वेदिका का इंटरव्यू छपा था जिसे पढ़ कर उन्हें वेदिका का पता चला और वे तुरंत उससे मिलने चले आये . कली को सीने से लगाते हुए दोनों को अपने किये का पछतावा था .पापा ने कहा भी " बेटा उस कठिन समय में हमें तुम्हारा साथ देना चाहिए था ."वेदिका तो उनका साथ पा कर ही सारे दुःख भूल चुकी थी .कली के साथ वे भी इतने रम गए की पुरानी बाते याद करने का उन्हें भी कहाँ होश था ?देर रात तक वे उसके साथ खेलते रहे .
रात में मम्मी ने बताया वेदिका के जाने के बाद विदित के माता पिता उसे ढूँढते उनके घर पहुँचे थे .कई दिनों तक उनके घर के आस पास लोग टोह लेते रहे .कई बार फोन पर उन्हें धमकियाँ भी मिली पुलिस भी चक्कर लगाती रही .विदित के भाई ने तो यहाँ तक कहा की वेदिका के साथ उनके घर का होने वाला वारिस भी गायब है वे उन्हें छोड़ेंगे नहीं .हमें तो लगा कि उन लोगों ने तुम्हे कुछ कर दिया है तुम्हारा कोई सुराग ही नहीं लगा तुम्हे ढूँढते भी तो कैसे ?
दो तीन दिन वहाँ रुक कर मम्मी पापा वापस जाने लगे वेदिका की तरक्की से वे संतुष्ट थे कली के प्यार से सराबोर .उन्होंने वेदिका से जल्द आने का वादा लिया .विदित के मम्मी पापा को कहीं वेदिका के बारे में न पता चल जाये इस आशंका से वे भयभीत थे . वेदिका ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा आप चिंता न करो अब मेरी अपनी पहचान है इसलिए मुझे नुकसान पहुँचाना आसन भी नहीं है फिर मैं जल्दी ही वहाँ आऊँगी .
दरवाजे की घंटी बजी नौकर ने दरवाज़ा खोला तो सामने वेदिका को देख कर हतप्रभ रह गया .विदित के मम्मी पापा ,भैया भाभी भी चौंक गए .मम्मी पापा के चेहरों पर उम्र लकीरों के रूप में कुछ ज्यादा ही फ़ैल गयी थी उन्ही लकीरों में पश्चाताप की एक लकीर उनकी आँखों में भी झिलमिला रही थी जिसे देखने के लिए ही शायद वेदिका यहाँ आयी थी . वेदिका का आँचल थामे खड़ी कली को सीने से लगा कर वे भावविभोर हो गए .विदित से नाराजी के चलते उसके प्यार और उसकी जिस निशानी को वे नज़र अंदाज़ करते रहे थे उनके जाने के बाद उन्होंने उसकी कमी को महसूस किया था .कली पर उमड़े प्यार ने उस पीड़ा और पश्चाताप को उजागर कर दिया था .वेदिका ख़ामोशी से उनके अनकहे शब्दों के भावों को समझती और महसूस करती रही .
भैया भाभी बहुत आत्मीय तो नहीं रहे पर उनका आँखें चुराना बहुत कुछ कह गया .वेदिका की नयी पहचान के आगे अपने ओछे विचारों के साथ वे खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे .एक दिन वे उसके अस्तित्व तक को नकार चुके थे आज वही अस्तित्व अपनी अलग और प्रभावशाली पहचान के साथ खड़ा है जो उनकी दी किसी पहचान का मोहताज़ नहीं था .
कविता वर्मा
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