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रविवार, 14 जुलाई 2013

पहचान

कमरे की दीवारों ने सरसरा कर वेदिका को चौकन्ना कर दिया . पलकों में जमे आंसू अभी सूखे नहीं थे जाने कितनी देर रोते रोते अभी तो आँख लगी थी कि दीवारों ने सरसराकर उसे जगा दिया .इस महल समान घर में अब यही दीवारें तो उसकी अपनी रह गयी थीं जो कभी उसे सर टिकाने को सहारा देती तो कभी उसके दुःख की साक्षी बन उसे सान्तवना देती . जब सूनी सेज की सलवटें उसे चुभने लगती वह उन्हें मुठ्ठी में भींच कर विदित की धडकनों को महसूस करने की कोशिश करती और नाकाम रहने पर इन्ही दीवारों से सहारा पाती . 
वेदिका ने उठ कर दीवारों की सरसराहट का मकसद जानने की कोशिश की फिर धीरे से दरवाज़ा खोल कर बाहर झाँका वहाँ कोई नहीं था . तभी हवा में तैरती एक तरंग उसका नाम लेकर आयी तो वेदिका ने कान लगा कर सुनने की कोशिश की . मम्मीजी के कमरे से जेठजी की आवाज़ आ रही थी . 
"अब उसका यहाँ क्या काम है विदित चला गया अब उसका यहाँ रहने का कोई हक नहीं बनता ."
" तो क्या करें घर से निकाल दें ?उसके माँ बाप ने तो विदित के जाने पर अफ़सोस करने आना भी जरूरी नहीं समझा .अब उसे उठा कर सड़क पर तो फेंक नहीं सकते " ये मम्मीजी का स्वर था . 
" वही तो मम्मीजी जब उसके माता  पिता तक उससे सम्बन्ध रखने को तैयार नहीं हैं तो हम भला क्यों इस पचड़े में पड़ें ? आज वह कल उसका बच्चा कब तक उसे कमा कर खिलाएंगे .हमारा खाएगी और कल को हमसे ही हिस्सा माँगने खड़ी हो जाएगी . क्या हक बनता है उसका ? मैं तो कहती हूँ उसे अभी घर से निकाल दो फिर उसे जहाँ जाना हो जाये . चाहे माँ बाप के घर या और कहीं .ये तो विदित से भाग कर शादी करने से पहले सोचना था ."  ये भाभी की आवाज़ थी ,वही भाभी जो उसकी और विदित की शादी से नाखुश होकर भी विदित के सामने उसके साथ मुंह में मिश्री घोल कर बतियाती थीं .आज मिश्री थूक कर दिल में इकठ्ठे किये सारे जहर को जबान पर ले आयीं थीं . 
बस करो तुम लोग एक तरफ़ा सोचते और बोलते हो .ऐसे ही घर से निकाल दोगे तो जाएगी कहाँ सडकों पर रहेगी ? उसकी अपनी तो कोई पहचान है नहीं पहचानी जाएगी हमारे परिवार की बहू के रूप में ही न ? फिर क्या इज्ज़त रह जाएगी हमारी ? अभी विदित को गए महिना भर भी नहीं हुआ थोडा धीरज धरो सोचते है क्या करना है ? अभी लोगों में विदित के एक्सीडेंट और मौत के चर्चे हैं विदित से उसकी पहचान है समय के साथ ये पहचान धुंधली हो जाएगी तब तक धीरज रखो .बाबूजी  ने कहा .
कमरे का दरवाज़ा खुला तो वेदिका आड़ में हो गयी .उसका समूचा अस्तित्व झनझना  उठा .उसकी खुद की कोई पहचान नहीं है .विदित के जाने के बाद इस घर में उसके लिए कोई जगह नहीं है . विदित के होने वाले बच्चे का इस घर में कोई हक नहीं है . विदित के जाने के बाद ये उस पर दूसरा कुठाराघात था . 
चार महीने पहले उसने और विदित ने मंदिर में शादी कर ली थी .वेदिका एम बी ए की मेधावी छात्रा थी और विदित एक स्थापित वकील .किसी सेमीनार में दोनों का परिचय हुआ था और पहली ही नज़र में प्यार हो गया .छ महीने में स्थिति एक दूसरे के बिना ना जीने की सी हो गयी .परिवारों के मानने की सम्भावना नहीं के बराबर थी इसलिए दोनों ने हाँ  ना के पचड़े में पड़ने की जरूरत ही नहीं समझी . हाँ शादी करके वे सबसे पहले वेदिका के घर पहुंचे थे जहाँ पहले रिवाज के तौर पर उनके मुँह पर दरवाज़ा बंद कर दिया गया . वहाँ से निकलते ही वेदिका की रुलाई फूट पड़ी ऐसी विदाई की तो उसने कल्पना ही नहीं की थी . विदित देर तक उसे ढाढ़स बँधाता  रहा . विदित के घर पहुँचने के पहले ही कोई शुभचिंतक ये खबर पहुँचा आया था . घर का दरवाज़ा नौकर ने खोला और आशीर्वाद के नाम पर सुनने को मिला तुमने हमारी नाक कटवा दी ,कहीं मुंह दिखने लायक नहीं छोड़ा . 

विदित ने वेदिका के डूबते दिल को सहारा दिया . उसने अगले ही दिन कश्मीर की टिकिट बुक करवा ली . पंद्रह दिन दोनों दीन दुनिया से दूर एक दूसरे में खोये दिलों के घाव को भरने में लगे रहे जो उनके अपनों ने उन्हें दिए थे . 
वापस आने पर भी ज्यादा कुछ नहीं बदला  था .विदित उसकी ढाल बना रहा . मम्मीजी और भाभी का व्यवहार बेइज्जती की हद तक रुखा था लेकिन वेदिका धीरज से सहती रही . उसे विशवास था कि एक दिन वह सबका दिल जीत लेगी . पढ़ाई शुरू करने का विदित का प्रस्ताव भी उसने इसीलिए टाल दिया क्योंकि अभी वक्त कच्चे रिश्तों को संवारने का था . रिश्ते संवरते इसके पहले ही एक एक्सीडेंट में विदित की जिंदगी की डोर कच्चे धागे सी टूट गयी ओर  इसी के साथ वेदिका की हर आस भी टूट गयी . 
पंद्रह दिनों तक मेहमानों का आना जाना लगा रहा .जिन मेहमानों को दुल्हन के रूप में मुँह दिखाई का अवसर नहीं मिला था नियति ने आज उन्हें उसके जख्मों को कोंचने का अवसर दे दिया था . कईओं ने विदित के रूप में इस घर से घनिष्ठ होने के जो सपने संजोये थे उसकी किरचें उसके जख्मी मन पर बिखेर कर संतुष्टि पाई थी . वेदिका ने पथराये मन से सब झेला लेकिन वह भावनाओं से भीगे एक कोमल काँधे के सहारे के लिए छटपटाती ही रही . 
आठ दिन पहले उस दिन सुबह सुबह वेदिका चक्कर खा कर गिर पड़ी .जब आँख खुली तो डॉक्टर को प्रिस्क्रिप्शन लिखते और कहते सुना "प्रेगनेंसी कन्फर्म करने के लिए कुछ टेस्ट लिख रहा हूँ जल्दी ही करवा लें." सबके मुंह में जैसे कुनैन घुल गयी थी और शायद सबने यही मनाया हो कि ये टेस्ट नेगेटिव आये . खुद वेदिका भी नहीं समझ पाई थी कि इस खबर पर खुश होए या रोये ,बस पेट पर हाथ रखे सुन्न सी बैठी रही . हाँ एक आस सी जरूर जागी थी कि शायद इस बच्चे की वजह से इस घर में उसे थोड़ी सी जगह मिल जाए . 

अगले दो ही दिन में उसने जाना की बच्चे का माँ से कितना गहरा नाता होता है .माँ से नफरत बच्चे से भी बेगानापन पैदा कर देती है ,उस समय बच्चे से पिता का अंश जैसे विलीन हो जाता है वह सिर्फ माँ से नफरत जताने का पर्याय बन जाता है .वेदिका  ने कम से कम मम्मीजी की आँखों में विदित के अंश के लिए कोमल भाव देखना चाहे थे लेकिन उसने जाना कि नफरत की भावना इतनी तीव्र होती है जिसमे प्यार अपनापन जैसी भावनाएं झुलसकर दम तोड़ देती हैं . वहाँ उसे सिर्फ वीरानगी ही नज़र आयी एक अजीब सी तटस्थता जैसे वह बच्चा सिर्फ और सिर्फ वेदिका का है जिसके साथ उनका कोई रिश्ता न था न है और ना ही उस बच्चे से जो उसके कोख में पल रहा है विदित के अंश के रूप में . मानो विदित के जाने के साथ ही उस अंश का समूचा अस्तित्व ही ख़त्म हो गया हो और वह सिर्फ उनकी नफरत का ही अधिकारी है . हाँ इससे एक बात जरूर हुई उस एहसासों से खाली रेगिस्तान में चलते सच के नुकीले काँटों ने उसे जता दिया कि इस घर में न तो उसका कोई स्थान था न कभी होगा .
आज की बातचीत से तो उसे लगा कि  विदित के नाम से जो थोड़ी बहुत उसकी पहचान है उसके धुंधला होने पर उसका अस्तित्व ही रौंदा जा सकता है .माता पिता से मिली पहचान तो उनके सम्बन्ध तोड़ते ही गुम  हो चुकी थी . अब उसे अपनी खुद की एक पहचान की जरूरत थी जिसके साथ वह और उसका बच्चा जी सकें . 

सारी रात दीवारें उसकी सिसकियों से लरज़ती रहीं .सुबह सारे घर की दीवारें करुण विलाप से थरथरा गयीं तो उसकी आँख खुली . उठ कर खड़े होते होते लकड़ी सी अकड़ गयी टांगों ने सहारा देने से इंकार कर दिया .दस मिनिट लगे होंगे उसे व्यवस्थित होने में .कमरे से बाहर आयी तो उसके पैर वहीँ ठिठक गए .चार महीनों में पहली बार किसी अपरिचित चेहरे पर उसे एक जोड़ी आँखों में करुणा नज़र आयी . उन आँखों की मालकिन को तो वो नहीं जानती थी लेकिन संवेदना की डोर से वह उन फैली बाहों तक खिंची चली आयी . उसकी पीठ सहलाते हाथों के कोमल स्पर्श ने अनकही संवेदना को उस तक पहुंचा दिया .तभी घूरती कठोर नज़रों ने उसे यथार्थ में ला पटका . वह छिटक कर अलग हो गयी . काम करते भी कई बार उसने उन नज़रों की तरलता महसूस की .हालांकि उनका परिचय वह अब तक नहीं जान सकी थी .भाभी से पूछा भी था लेकिन कोई जवाब नहीं मिला .

आधी रात के लगभग वेदिका की नींद खुली दरवाजे पर खटखटाहट सी हुई थी . असमंजस में उसने दरवाजा खोला तो वही दो आँखें नज़र आयीं . हाथों ने कोमलता से उसे धक्का देकर अन्दर किया और दरवाज़ा बंद हो गया . लाईट जलाने के लिए बढ़ते हाथों को दृढ़ता से रोक दिया गया .नाईट बल्ब के धीमे प्रकाश में उसे चुप रहने का इशारा करते हाथों ने हाथ थाम कर अपने पास बैठा लिया . 

मैं विदित के मामा की बेटी हूँ .विदित से बहुत क्लोज थी . तुमसे शादी के बारे में विदित ने सिर्फ मुझे बताया था . मैं हमेशा उसका साथ दूँगी ये मेरा उससे वादा था . अब विदित तो रहा नहीं लेकिन तुम तो हो इसलिए अब तुम्हारे बुरे वक्त में तुम्हारी मदद करके अपना वादा निभाना चाहती हूँ . इसी के इंतज़ाम में लगी थी इसलिए यहाँ एक महीने बाद आयी . फुसफुसाते स्वर में उन्होंने अपने आने का मकसद बताया . 
तुम तो एम बी ए कर रहीं थीं न ? तुम्हारी मार्कशीट और बाकी सारे पेपर्स कहाँ हैं ? 
मेरे पास हैं . वेदिका ने भी अपनी आवाज़ को भरसक धीमा करते हुए कहा . 
विदित का अकाउंट और उसका ए टी एम ? कितने पैसे हैं उसके अकाउंट में ? 
मेरे पास हैं लगभग दो लाख रुपये होंगे .उसके स्वर में उलझन थी . 
तुम्हारे गहने या और कुछ मिला कर क्या है ? 
एक सेट डायमंड का है यही कोई अस्सी नब्बे हज़ार का ,उसके अलावा कुछ खास नहीं . 
तुम अपने पेपर्स मुझे दे दो यहाँ से बहूत दूर साउथ की एक यूनिवर्सिटी में मैंने बात कर ली है वहाँ तुम्हारा रजिस्ट्रेशन करवा रही हूँ अपनी पढ़ाई पूरी करो . अपना जरूरी सामन एक बेग में रखना मैं टिकिट बुक करवा कर मैसेज करूंगी तुम यहाँ से भाग जाना .यहाँ तुम और तुम्हारा बच्चा दोनों ही सुरक्षित नहीं हैं . चली जाओ यहाँ से अपनी पहचान बनाओ ताकि फिर कोई तुम्हारी तरफ आँख न उठा सके . 
वेदिका हतप्रभ सी बैठी सुनती रही अचानक ये क्या हो गया वह समझ ही नहीं पायी . 
उठो पेपर्स दो मुझे जल्दी . दो हाथों ने उसे झकझोर दिया . 
वेदिका हडबडा कर उठ खड़ी  हुई उसने अपने पेपर्स दिए फोन नंबर लिख कर दिया . उन दो आँखों के करुण भाव की पहचान ने उनकी हर बात पर विश्वास करवा दिया था जिसके दम पर वह खुद की पहचान बनाने के उनकी  हर योज़ना के लिए तैयार हो गयी थी . 
अगले दस मिनिट में पूरी योज़ना बन गयी थी फिर कमरे में सन्नाटा छा गया .जाते जाते दो हाथों ने उसे मजबूती से थाम कर दृढ़ स्वर में कहा " आगे की जंग तुम्हे अकेले लड़नी है लेकिन इन बेगानों के बीच के अकेलेपन से ज्यादा अकेलापन वहाँ नहीं होगा विश्वास करो .मैं भी लगातार तुम्हारे संपर्क में नहीं रह पाउंगी वर्ना मेरे माध्यम से ये लोग तुम तक पहुँच जायेंगे लेकिन हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी अपनी तरफ से तुम्हारी खैर खबर लेती रहूँगी बस तुम हिम्मत ना हारना . अपनी पहचान बना कर अपने और अपने बच्चे के हक के लिए वापस लौटना . 
वेदिका देर तक वैसी ही बैठी रही .आँसूं गालों से ढुलक कर गोद में समाते रहे . खुद की पहचान बनाने के लिए उसे अपनी मौजूदा पहचान से दूर बहुत दूर हो जाना है एक अनजानी दुनिया में अकेले सिर्फ अपने दम पर ताकि इस घर के लोग उसे ढूंढ ना सकें . उनके मन के प्रॉपर्टी खो देने या उसके हिस्से होने के डर के सामने उसके कोख में पलते विनीत की आख़िरी निशानी और वह खुद विनीत का प्यार उनके लिए कोई मायने नहीं रखते . 
स्वार्थ और लालच के वशीभूत इंसान की सोच कितनी संकीर्ण हो जाती है कि उसके परे अपनों की निशानियाँ भी अपने अर्थ खो देती हैं .वेदिका ने अपने प्यार के प्रतिफल में जीवन की कुछ ऐसी ही कड़वी सच्चाइयों को देखा है जिन्होंने उसे भीतर तक तोड़ दिया . 
कई बार वह सोचती काश वह भी उस दिन विनीत के साथ होती लेकिन फिर उसकी ममता उसे धिक्कारती इस नन्ही जान को इस दुनिया में आने से रोकने का तुम्हे कोई हक नहीं है . वह सोचती अपने अजन्मे बच्चे से उसे इतनी ममता है फिर कैसे उसके माता पिता जिनके साथ वह चौबीस साल रही पल -पल उनकी आँखों के सामने बढ़ी सुख दुःख के पल साथ जिए उनकी ख़ुशी का कारण रही उन्होंने एक पल में उसे इतना पराया कर दिया कि उसकी ख़ुशी में न सही उसके दुःख में भी साथ देना जरूरी नहीं समझा .उसे तो एक न एक दिन उस घर से जाना ही था अगर उसने अपनी मरजी से जीवन साथी चुना तो क्या इतना गलत हो गया कि इस तरह रिश्तों को नफरत की कब्र में दफन कर दिया जाये .
उसका मन नहीं मानता दिल के किसी कोने से आवाज़ आती ऐसा नहीं हो सकता कि उस पर इतना बड़ा दुःख टूटे ओर मम्मी का दिल न पसीजे .ये खबर सुन कर वे तो जरूर रोई होंगी . रोये तो पापा भी होंगे लेकिन शायद उसने ही उन्हें इस शर्मिंदगी में डाल दिया था या शायद कोई और मज़बूरी हो कि वे यहाँ नहीं  आये .
एक अनजान शहर अनजान मंज़िल पर जाने के नाम से उसका दिल काँप रहा था . उसका मन हुआ वह वापस अपने घर चली जाये मम्मी पापा के पैर पकड़ कर माफ़ी मांग ले मम्मी की गोद में सिर रख कर खूब रो ले .लेकिन नकार दिए जाने का डर शायद दुनिया का सबसे बड़ा  डर  है जिसने उसके इन इरादों और कदमों को कमजोर कर दिया . यह तो तय था कि बिना अपनी पहचान बनाये न तो वह न उसके प्यार की निशानी ही सुरक्षित  थी यही ख्याल उसे जीने की प्रेरणा देता और बेगाने हो चुके अपनों  के सामने अपनी पहचान बनाने का निश्चय दृढ़ होता जाता . 

अगले दिन दोपहर में वेदिका चुपके से घर से निकल कर बैंक पहुँची। उसने अपना और विदित का अकाउंट बंद करवा कर अपने पुराने नाम वेदिका शर्मा के नाम से नया अकाउंट खुलवाया आधे पैसे फिक्स डिपोसिट किये कुछ जमा किये और कुछ कैश लेकर घर आ गयी .अलमारी से एक बेग निकाल कर कपड़ों के नीचे रुपये छुपा कर रखे . शादी वाले दिन पहनी साड़ी हाथ में लेते ही यादें नदी की तरह आँखों से बहने लगी .उसी साड़ी में उसने विदित और उसकी शादी की तस्वीर और शादी का सर्टिफिकेट लपेट कर रख दिया .वह कम से कम सामान अपने साथ ले जाना चाहती थी लेकिन विदित की खुशबू से रची बसी किसी भी चीज़ को छोड़ने का मन ही नहीं हुआ . 
तीन दिन बाद शाम पांच बजे एक मेसेज़ आया रात दो बजे की गाड़ी का ई टिकिट था .कुछ ही देर बाद एक और मेसेज आया ट्रेन में बैठ कर इस सिम को निकाल देना और फिर कभी इसका इस्तेमाल मत करना . 
रात एक बजे पूरा घर सन्नाटे में  डूबा था वेदिका ने घर से निकल कर स्टेशन की राह ली .ट्रेन आने में दस मिनिट की देरी थी घबराहट में वह बार बार घडी देख रही थी . एक बार पहले भी उसने घर छोड़ा था तब विदित उसके साथ था तब उसे बिलकुल डर नहीं लगा था .आज एक अनजाना डर उसे बैचेन कर रहा था जाने वह पकडे जाने का डर था या अनजान सफ़र पर जाने का डर . 

ट्रेन की रफ़्तार के साथ वेदिका के दिल की धड़कनें भी तेज़ होती गयीं।  उसने बहुत कोशिश की कि नींद आ जाये पर देर तक वह करवटें बदलती रही . 
सुबह आँख खुली तो देखा काफी दिन चढ़ आया था मोबाइल बंद था कहीं किसी से कोई संपर्क नहीं था खचाखच भरी ट्रेन में भी वह खुद को किसी वीरान टापू पर अकेले सा पा रही थी . 
अकेलापन किसी का साथ न होना नहीं है अकेलापन तो किसी का साथ महसूस न होना है .ट्रेन में कई लोग अकेले सफ़र कर रहे थे पर वे अकेले कहाँ थे ?वेदिका के साथ ट्रेन के सभी यात्री थे लेकिन वह बिलकुल अकेली थी . 
शाम सात बजे वह किसी स्टेशन पर उतरी एक आदमी ने उसके पास आकर नाम पूछा और सामान टेक्सी में रख दिया . एक होस्टल में उसके रहने का इंतज़ाम था . राधिका ने सारा इंतजाम किया था .
अगले दिन सुबह वार्डन के ऑफिस में राधिका का फोन आया . ओपचारिक बातों  के बाद उसने बताया  कि उसके एडमिशन के पेपर्स वार्डन के पास हैं वह कॉलेज जाना शुरू कर दे . कोई परेशानी हो तो वार्डन आशा जी से कहे . पास ही एक लेडी डॉक्टर है चेक अप करवाती रहे घबराना मत मैं तुम्हारे साथ हूँ यहीं  फोन करती रहूंगी लेकिन ज्यादा नहीं .
राधिका ने ही बताया कि तुम्हारे गायब हो जाने से घर में कोहराम मचा हुआ है .राधिका के जाने के बाद ही वेदिका ने घर छोड़ा था इसलिए उसके पास कई बार फोन आ चुका है  हो सकता है वो लोग अपने प्रभाव से उसके फोन की निगरानी भी करें इसलिए वह पब्लिक बूथ से बात कर रही है . 
आशाजी एक अधेड़ उम्र की सहृदय महिला थीं उन्होंने वेदिका के एडमिशन से लेकर डॉक्टर से चेकअप करवाने तक हर चीज़ में मदद की .वेदिका की दुःख भरी कहानी ने उन्हें द्रवित कर दिया था .वे जब भी खाने की कोई डिश बनातीं वेदिका के लिए जरूर बचा कर रखतीं . होस्टल में अधिकतर लडकियाँ कामकाजी थीं धीरे धीरे उनके साथ वेदिका का अकेलापन घुलने लगा .जान पहचान से प्यार भरे रिश्ते पनपने लगे .ज्यों ज्यों दिन चढ़ने लगे रिश्ते परवान चढने लगे कोई बड़ी बहन के अधिकार से तो कोई छोटी बहन के से प्यार से वेदिका को हाथों हाथ रखता . 
होस्टल की नीरस जिंदगी में वेदिका और आने वाला नन्हा एक नयी हलचल सी भर रहे थे . सच ही कहा था राधिका ने इन अनजानों के बीच अपनों से कम ही अकेलापन होगा .रात के स्याह अँधेरे में ही वेदिका अकेली होती उसमे भी एक नन्ही चंचल आवाज़ उसे पुकार कहती " माँ मैं हूँ न " . 
पहले सेमेस्टर की एग्जाम हो चुकी थी वेदिका को विश्वास था कि वह बहुत अच्छे नंबरों से पास होगी . कॉलेज बंद थे वेदिका सारा दिन नन्हे से बतियाती .उसे अक्सर ख्याल आता 'घर में सब कैसे होंगे क्या अब भी मुझे ढूंढ रहे होंगे ? क्या मुझे खोजते मम्मी पापा के यहाँ गए होंगे ? वहाँ मुझे न पाकर क्या प्रतिक्रिया दी होगी ? क्या मम्मी पापा ने भी मुझे ढूँढने की कोशिश की होगी ? या वे अब तक मुझ से नाराज़ हैं ? क्या उन्हें अब भी मेरी फिक्र है ? जब इनमे से किसी सवाल का कोई जवाब नहीं मिलता वह अपने मन को तसल्ली देने को खुद ही जवाब देती और खुद ही उन्हें नकारती . 
अगले सेमेस्टर की शुरुआत से ही वेदिका ने पढ़ने में कड़ी मेहनत शुरू कर दी . वह जानती थी पढ़ाई के बीच ही नन्हे का आगमन होगा .उसकी एक ही चिंता थी कि सब  नार्मल हो जाये क्योंकि पैसे धीरे धीरे ख़त्म हो रहे थे और कमाई का कोई जरिया नहीं था न ही किसी से मदद की उम्मीद . राधिका मदद कर भी देती लेकिन वह पहले ही बहुत कुछ कर चुकी थी . 
उस रात जब वेदिका को दर्द उठा पूरा होस्टल जाग गया . रात दो बजे वह नन्ही कली प्रस्फुटित हुई तो उसकी महक से वेदिका का जीवन ही नहीं पूरा होस्टल भी महक उठा . 
हॉस्पिटल से आने पर ढोल नगाड़े ,जच्चा बच्चा गीतों के साथ दोनों का स्वागत हुआ .अनुभवी महिलाओं ने उनकी देखभाल की जिम्मेदारी ले ली .कॉलेज की लड़कियों ने उसे नोट्स दे दिये थे . 
अपनों के बेगानेपन के घाव बेगानों के अपनेपन ने भर दिए थे . तीन हफ्ते आराम करने के बाद अब वह दो तीन घंटों के लिए कॉलेज जाने लगी थी .नाईट ड्यूटी वाली लडकियाँ नन्ही कली का ध्यान रखतीं . 
राधिका का फोन आया था उसने उसे बधाई दी .वेदिका उससे बहुत कुछ पूछना चाहती थी लेकिन उसने जवाब दिया तुम किसी की चिंता मत करो अपनी पढ़ाई और सेहत पर ध्यान दो .
कली की कोमल मुस्कान अब वेदिका को कुछ और सोचने का मौका नहीं देती थी . आखिरी सेमेस्टर करीब था और वेदिका के पैसे ख़त्म होने को थे .वह डायमंड सेट अभी भी उसके पास था वह विदित का दिया गिफ्ट था इसलिए उसे बेचने का मन वह नहीं बना पा रही थी .कॉलेज पढ़ाई और कली की देखभाल के बाद समय ही नहीं बचता था कि वह कोई और काम कर सके .होस्टल की फीस और मेस का बिल भरना था .
उसे परेशान देख कर आशाजी ने पूछा क्या बात है ? उन्होंने सेट देखा सुनार से उसकी जांच करवाई और कहा अगर वह चाहे तो सोने की चेन उनके पास रख कर पैसे ले ले जब वह नौकरी करने लगेगी पैसे चुका कर चेन वापस ले ले . वेदिका की आँख भर आयी एक ओर आशाजी की सहृदयता थी तो दूसरी और चेन पहनाते विदित की उंगलियों का गुदगुदा स्पर्श .बहुत सोचने के बाद उसने कान के टॉप्स रख कर पैसे ले लिए . 
पढाई पूरी होते ही वेदिका को अच्छी नौकरी मिल गयी कली भी सवा साल की हो गयी थी थोड़े समय होस्टल में और दो तीन घंटे क्रेच में उसे छोड़ने की व्यवस्था की गयी . नौकरी मिलने पर राधिका ने उसे बधाई दी .वेदिका ने सबके हाल चाल जानने चाहे तो उसने इतना ही कहा "अपने मन को कमजोर मत बनाओ अभी तो नौकरी मिली ही है पहले अपने पैर जमाओ अपनी पहचान बनाओ फिर एक दिन तुम्हे वहाँ जाना ही है . वैसे भी वहाँ कुछ नहीं बदला ." 
ये जानकार भी वेदिका का मन बार बार वापस जाने का हो रहा था . एक बार वह अपने मम्मी पापा से मिलना चाहती थी . उन्हें बताना चाहती थी कि उसने हर बाधा को पार करके अपनी मंजिल पा ली है .विदित के मम्मी पापा को दिखाना चाहती थी कि उसका और विदित का प्यार कितना सच्चा था और उस प्यार की निशानी कली कितनी मासूम है . 
रिश्तों की कशिश शायद यही होती है जिससे आप जुड़ाव महसूस करते हैं या वो जिनसे करीबी रिश्तों के बाद दूरियां बन गयी है मन चाहता है उन्हें हमारे ख़ुशी और दुःख के बारे में जरूर पता चले .चाहे सारी दुनिया आपकी ख़ुशी में शामिल हो लेकिन जब तक रिश्ते आपके साथ न हों हर ख़ुशी अधूरी और हर सान्तवना सतही  ही लगती है . 
समय ने गति पकड़ ली . वेदिका को तरक्की मिल गयी  .कली भी स्कूल जाने लगी . भावनाओं का प्रवाह मंथर हो चला था . वेदिका ने एक छोटा सा फ्लेट ले लिया कली की किलकारियों और भोली मासूम बातों से उसे सजा संवार लिया था .घर के दरवाजे पर उसके नाम की तख्ती उसकी पहचान बता रही थी बिना किसी और नाम के सहारे के .एक नामी कंपनी की सी इ ओ थी वह अपना नाम अपनी पहचान के साथ . 


एक दोपहर जब वेदिका लंच के बाद अपने केबिन में लौटी वहाँ किसी को बैठा देख कर चौंक गयी .उसके आने की आहट से जब वे पलटे  ख़ुशी और आश्चर्य से वेदिका की चीख निकल गयी . 
मम्मी पापा आप यहाँ कैसे ? कैसे हैं आप ? वेदिका मम्मी से लिपट गयी सालों के जमा गिले शिकवे पानी बन कर बह गए . 
एक पत्रिका में वेदिका का इंटरव्यू छपा था जिसे पढ़ कर उन्हें वेदिका का पता चला और वे तुरंत उससे मिलने चले आये . कली को सीने से लगाते हुए दोनों को अपने किये का पछतावा था .पापा ने कहा भी " बेटा उस कठिन समय में हमें तुम्हारा साथ देना चाहिए था ."वेदिका तो उनका साथ पा कर ही सारे दुःख भूल चुकी थी .कली के साथ वे भी इतने रम गए की पुरानी  बाते याद करने का उन्हें भी कहाँ होश था ?देर रात तक वे उसके साथ खेलते रहे . 
रात में मम्मी ने बताया वेदिका के जाने के बाद विदित के माता पिता उसे ढूँढते उनके घर पहुँचे थे .कई दिनों तक उनके घर के आस पास लोग टोह लेते रहे .कई बार फोन पर उन्हें धमकियाँ भी मिली पुलिस भी चक्कर लगाती रही .विदित के भाई ने तो यहाँ तक कहा की वेदिका के साथ उनके घर का होने वाला वारिस भी गायब है वे उन्हें छोड़ेंगे नहीं .हमें तो लगा कि उन लोगों ने तुम्हे कुछ कर दिया है तुम्हारा कोई सुराग ही नहीं लगा तुम्हे ढूँढते भी तो कैसे ? 
दो तीन दिन वहाँ रुक कर मम्मी पापा वापस जाने लगे वेदिका की तरक्की से वे संतुष्ट थे कली के प्यार से सराबोर .उन्होंने वेदिका से जल्द आने का वादा लिया .विदित के मम्मी पापा को कहीं वेदिका के बारे में न पता चल जाये इस आशंका से वे भयभीत थे . वेदिका ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा आप चिंता न करो अब मेरी अपनी पहचान है इसलिए मुझे नुकसान पहुँचाना आसन भी नहीं है फिर मैं जल्दी ही वहाँ आऊँगी .

दरवाजे की घंटी बजी नौकर ने दरवाज़ा खोला तो सामने वेदिका को देख कर हतप्रभ रह गया .विदित के मम्मी पापा ,भैया भाभी भी चौंक गए .मम्मी पापा के चेहरों पर उम्र लकीरों के रूप में कुछ ज्यादा ही फ़ैल गयी थी उन्ही लकीरों में पश्चाताप की एक लकीर उनकी आँखों में भी झिलमिला रही थी जिसे देखने के लिए ही शायद वेदिका यहाँ आयी थी . वेदिका का आँचल थामे खड़ी कली को सीने से लगा कर वे भावविभोर हो गए .विदित से नाराजी के चलते उसके प्यार और उसकी जिस निशानी को वे नज़र अंदाज़ करते रहे थे उनके जाने के बाद उन्होंने उसकी कमी को महसूस किया था .कली पर उमड़े प्यार ने उस पीड़ा और पश्चाताप को उजागर कर दिया था .वेदिका ख़ामोशी से उनके अनकहे शब्दों के भावों को समझती और महसूस करती रही . 
भैया भाभी बहुत आत्मीय तो नहीं रहे पर उनका आँखें चुराना बहुत कुछ कह गया .वेदिका की नयी पहचान के आगे अपने ओछे विचारों के साथ वे खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे .एक दिन वे उसके अस्तित्व तक को नकार चुके थे आज वही अस्तित्व अपनी अलग और प्रभावशाली पहचान के साथ खड़ा है जो उनकी दी किसी पहचान का मोहताज़ नहीं था . 
कविता वर्मा 




23 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज सोमवार (15-07-2013) को आपकी गुज़ारिश : चर्चा मंच 1307 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. तल्खियों को स्वर और अंदाज़ देती रचना परिवेश की बुनावट आधुनिक संत्रास रचती है .ॐ शान्ति

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बेचारा रुपया - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. शानदार प्रस्तुति।।

    कृपया एक बार मेरे इन ब्लोगों पर भी नज़र डाले :-

    प्रचार
    ज्ञान - संसार
    गौरेया
    समाचार NEWS

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  5. बहुत बढ़िया.......
    दिल को छूती कहानी....

    अनु

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  6. वाह, कविता जी, आपकी कहानी के पात्र काल्पनिक हैं लेकिन हमारे आसपास मौजूद हैं॰ आप प्रशंसा की हकदार हैं। बहुत बहुत बधाई

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  7. बहुत सुन्दर कहानी है, बिना रुके पूरी पढ़ ली। इतने अच्छे तरीके से लिखा है कि मानों कहानी हमारी आँखों के सामने घट रही हो और हम भी उसके पात्र हों।

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  9. एक बेहद खूबसूरत कहानी ...खूबसूरत शब्द रचना के साथ

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  11. nari jati ke har bhavon ko apne me samete sarthak kahani...itni khubsurat rachana par badhae aapko....

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  12. बहूत ही अच्छी कहानी . जो नारी की
    दृढ इच्छा शक्ति को दर्शाती है ....!!

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  13. ओह...क्या कहूं, बिल्कुल निशब्द हो गया हूं।
    अगर मुझे इस कहानी को नंबर देना हो तो मैं पूरे 10 में 10 दूंगा।
    महिला सशक्तिकरण को लेकर तमाम सरकारी योजनाएं चलाई जाती हैं
    मुझे लगता है कि योजनाओं को बंद कर सरकार महिलाओं में उत्साह
    और आत्मविश्वास भरने के लिए ये कहानी पढ़ाए।
    बहुत बहुत शुभकामनाएं कविता जी

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  14. बहुत खूब रचना ... स्वावलंबन में अपार शक्ति है ... बधाई ...

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  15. Bhut hi bhavbhini man ko choone vali khani he, pater radhika ka sadhvad apne astitv ko bnana, apni pahchan bnane,or svavlambi ho apne pero per khda hona jruri he per us toote dil ko koi shara jo chahe tinke ka hi jruri he ......behad umda bdhiya khani ke liye bahut bahut badhai....

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  16. कई बार अपने रिश्ते वह काम नहीं करते जो अनाम रिश्ते कर जाते हैं !
    प्रेरणास्पद कहानी !

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  17. आज के रिश्तों के यथार्थ को चित्रित करती बहुत प्रभावी कहानी...

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  18. नारी की आत्मिक शक्ति को दर्शाती सुंदर कहानी..

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  19. नारी की आत्मिक शक्ति को दर्शाती सुंदर कहानी..

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  20. कविताजी,

    'पहचान' नामक कहानी में कितनी सुन्दर पक्तिं लिखी हैं आप ने-अपनों के बेगानेपन के घाव बेगानों के अपनेपन ने भर दिये थे।'

    आप ने समाज के गल्त विचार को नष्ट कर दिया है कि स्त्री कभी समाज का मुकाबला नहीं कर सकती है।

    सच में काबिले तारीफ है आप का लेखन।

    विन्नी,

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