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मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

रात की परछाई

सुबह कि धूप ने उसके गालों पर हलकी सी थपकी  दी उसने कुनमुना कर करवट बदली गर्दन दर्द से अकड़ गयी थी।  उसे फिर सीधे होना पड़ा, बड़ी देर तक यूं ही छत को ताकते हुए वह वैसे ही पड़ी रही ना यह जानने कि कोशिश कि कि समय क्या हुआ है ना ये सोचने कि कोशिश कि आज क्या करना है? उसका शरीर बिस्तर में पड़ा था मन शायद चादर कि सलवटों में कहीं छुपा पड़ा था जिसे ढूँढने कि कोई कोशिश उसने नहीं कि थी। शायद उसे मन कि उदासी का अंदाजा था इसलिए वह उसे यूं ही कहीं गुम सा पड़े रहने देना चाहती थी। बिना मन का शरीर जाने कैसा भारी सा हो गया उसने बिस्तर पर हाथ फेर कर उसे टटोला लेकिन मन तो जाने कहाँ दूर छिटक कर पड़ गया।  उसने अपने सर के नीचे सिरहाना ठीक से लगाया ओर चादर को गाल पर रख लिया वैसे ही जैसे उसकी गोद में सोते हुए उसकी हथेली से गाल को ढक लेती है।  उसी तपिश को महसूसते हुए उसने आँखें बंद कर लीं ओर जाने कब तक यूं ही पड़ी रही। सड़क पर कोई गाड़ी अपने टायरों को घसीटते हुए रुकी जिसकी चीखती आवाज़ से उसकी अधलगी नींद फिर खुल गयी। उसने धीमे से चादर हटाया ज्यों अपने गाल से उसकी भारी हथेली हटा कर परे कि हो और उठ बैठी। 

चाय के कप के साथ बिस्तर पर बैठते उसकी नज़र साइड में रखे गिलास पर पड़ी उसने उसे यूं ही उठा कर गालों से लगा लिया ओर धीमे से बुदबुदाई तुम क्यूं अपना गिलास ऐसे अधूरा छोड़ देते हो?मेरी बात मान कर? सच में मेरी बात मानते हो,तो ग्लास बनाते ही क्यों हो?आज तो उसका मन भी ग्लास लेने का ही हो रहा था लेकिन जाने क्यों उसने ग्लास नीचे रख दिया ओर यूं ही खुद को शीशे में  देखने लगी। बालों कि लटें उसके माथे ओर गालों तक झूल आयीं थी उसने ऑंखें बंद कर अपना चेहरा आगे कर दिया उसके दोनों हाथों को सारे बाल पीछे कर उसका माथा चूमने का इंतजार करती रही लेकिन बाल यूं ही हवा में झूलते रहे ओर माथा उसके होंठों की तपिश के इंतजार में ही रहा। खिड़की से आती धूप में चाय का कप ओर व्हिस्की का अध भरा ग्लास हाथ में हाथ मिलाये बैठे से लगे।  उसने एक नज़र खाली कमरे और बिस्तर पर डाली।  वो चला गया बिना उससे कहे, बिना उससे मिले। बिना ये जाने की उसके बिना कैसे रहेगी वह या बिना ये समझे की उससे कितना प्यार करती है,  लेकिन अगले ही पल चाय के कप का खालीपन ओर गहरे तक उसमे भर गया.खिड़की से आती धूप सरक कर चौखट से बाहर जाने लगी ऐसे ही जैसे उसकी हथेली धीरे धीरे छूटती जा रही हो उसने अपनी हथेली कस कर भींच ली लेकिन वहाँ यादों की सिर्फ कुछ किरचें थी। 
फ़ोन की घंटी ने उसे उसके आगोश से निकाल कर फिर कमरे के बिस्तर पर अकेले छोड़ दिया और वह मोबाइल टटोलने लगी। कोई नया नंबर देख कर बात करने कि उसकी इच्छा ही नहीं हुई। वह मेसेज पढने लगी पूरा इन्बोक्स उसके मेसेज से भरा हुआ था उनमे से जाने कितने ही मेसेज वह महसूस करती थी जैसे उसने सामने बैठ कर उसका चेहरा हाथों में लेकर उसके बालों को पीछे करते हुए उससे कहे थे। आज वही मेसेज पढ़ते हुए वह सामने क्यों नहीं है उसका स्पर्श उसे छू क्यों नहीं रहा है? आज अचानक उसकी आँखों को देख कर भी उसकी नज़रों को वह महसूस क्यों नहीं कर पा रही है?क्या वह सच में चला गया दूर इतनी दूर कि उसका एहसास भी अब उसके आस पास नहीं है एक खाली पन उसके चारों ओर पसरा हुआ है और वह मोबाईल वहीँ छोड़ कर उदासी के प्याले में डूब गयी है गहरे बहुत गहरे जिसमे से बाहर आने कि कोई इच्छा ही बाकी नहीं रही वह खो जाना चाहती है गुम हो जाना चाहती है भूल जाना चाहती है सब कुछ लेकिन उसके होंठ,उसका मन अभी भी उसका नाम पुकार रहे हैं .
उसके होंठो पर अपना नाम 
उसके हाथों में अपना हाथ 
उसकी आँखों में अपना अक्स 
उसकी सांसों में अपनी खुशबू 
सागर कि लहरों सा लहराता उसका प्यार 
और वह उस सागर में डूबते उतरते कहीं गहरे डूबती जा रही थी।