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शनिवार, 1 नवंबर 2014

आदत

आदत 
अल्ताफ हुसैन ने घर पहुँच कर अपना थैला जमीन पर रखा और आँगन पर रखी खटिया पर बैठ गया। शबाना पानी ले आई पानी पीते उसने शबाना को देखा और मुँह पोंछते उससे पूछा "सब ठीक ठाक तो है ?"
शबाना ने सिर हिलाकर जवाब दिया हाँ सब ठीक है। "आपका सफर कैसा रहा ? मामू जान कैसे हैं अब ?मामी बच्चे सब खैरियत से तो हैं ?"
अल्ताफ आठ दिनों बाद आज घर लौटा था। "हाँ हाँ सब खैरियत है " कहते हुए अल्ताफ ने वहीं खटिया पर लेट लगा ली।  लेटते ही उसकी नज़र पड़ोस के मकान पर पड़ी।  आँगन सूना पड़ा था। आँगन में बंधी रस्सी पर हमेशा सूखने वाला अंगोछा नहीं था।  हमेशा खुले रहने वाले दरवाज़े खिड़की बंद थे।  वह चौंक गया।  
"बीबी ओ शबाना बीबी" आवाज़ लगाते वह उठ बैठा। 
'आई ', अंदर से आवाज़ आई। शबाना के बाहर आने का इंतज़ार करते वह दोनों घरों के बीच की सूखी कंटीली बाड़ तक पहुँच गया और पंजों के बल उचक कर उस मकान में देखने लगा वहाँ कोई नहीं था। अल्ताफ ने झुंझलाते हुए जोर से आवाज़ लगाई "शबाना ओ शबाना जल्दी बाहर आओ। " 
"जी क्या बात है क्यों हड़बड़ा रहे हो ?"दुपट्टे के छोर से हाथ पोंछते शबाना उसके पास चली आई। 
"क्या बात है पड़ोस में कोई नहीं है क्या ? महादेव भाई और उनका परिवार कहाँ गए ?सब खैरियत तो है ?"
शबाना ने आश्चर्य से अल्ताफ को देखा उसने उसे कभी इस तरह हड़बड़ाते नहीं देखा था और महादेव भाई के बारे में इस बैचेनी से तहकीकात करना। लगभग आठ साल हो गए होंगे उनकी और महादेव भाई की बात चीत बंद हुए। इतने सालों में तो अल्ताफ ने कभी महादेव भाई के बारे में जानने की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई।  उनके दुःख सुख में कभी शरीक नहीं हुए आज अचानक इस तरह महादेव भाई के लिए उनकी ये बैचेनी। 
***
महादेव और अल्ताफ के परिवार लगभग पचास सालों से एक दूसरे के पडोसी थे।  दोनों के पिता अच्छे मित्र थे।  सुबह साथ साथ खेत पर जाना , फसलों, जानवरों, घर परिवार के बारे में अपनी चिंताए साझा करना।  जब महादेव की शादी हुई तब उनकी दुल्हन गौरी अल्ताफ के यहाँ ही उतरी थीं जबकि गाँव में उनके एक दो रिश्तेदार और थे।  तब महादेव के पिता ने उन्हें समझाया था इतनी दूर आने जाने में लड़कियों को परेशानी होती इसलिए पड़ोस में उतार लिया।  होली ,ईद ,दिवाली सब साथ ही मनाई जाती थी। तब गाँव का माहौल ही कुछ और था न हिन्दू काफिर थे न मुसलमान अलगाव वादी। सब एक गाँव वाले थे सबके सुख दुःख साझा थे। 
समय के साथ सब कुछ बदलने लगा। गाँव के मीठे पानी में लट्ठ मार कर दो फाड़ करने की कोशिश शुरू हो गई। एक दुसरो को दुःख पहुँचाने वाले नाम दिए जाने लगे परेशान करने के लिए उनकी धार्मिक भावनाओ को आहत किया जाने लगा। कभी कभी चोट इतनी करारी होती दूरी इस कदर बढ़ जाती कि  उसे पटना मुश्किल हो जाता। 
ऐसे ही एक आँधी में विश्वास की दीवार भरभरा कर ढह गई अपने पराये ,हो गए , बरसों पुराने संबंधों के घरोंदे बिखर गए , नेह की डोरी टूट गई, साथ साथ उठने बैठने वाले, सुख दुःख साझा करने वाले अचानक एक दूसरे से बेगाने हो गए।  दिलों में ऐसी कड़वाहट भर गई कि  एक दूसरे को देखना भी नागवार गुजरने लगा।  अल्ताफ और महादेव भी इस लपट में अपने सौहार्द को बचा न सके हालांकि इस माहौल को बनाने में उनका कोई हाथ न था। लेकिन उनके रिश्तेदारों बंधू बांधवों और जात बिरादरी के दबाव के चलते उन्हें ये दूरियाँ बनानी पड़ीं जो धीरे धीरे बढ़ती ही चली गई।  दो घरों के बीच फूलों की बागड़ काँटों की झाड़ियों में बदल गई। 

*** 
"महादेव भाई ने अपना घर बेच दिया उनका पूरा परिवार तो चार पांच दिन पहले ही चला गया था और आज महादेव भाई भी चले गए।"  
इस खबर ने अल्ताफ को हिला कर रख दिया।  उन्होंने तेज़ी से पलट कर शबाना को देखा फिर उन्हें महसूस हुआ कि उनकी आँखें भरी हुई हैं , उन्होंने तेज़ी से मुँह फेर लिया और महादेव के घर की ओर देखने लगे। "महादेव कब गया ?" आवाज़ के कंपन को छुपाते छुपाते भी थरथराहट शबाना तक पहुँच गई।  उसने धीरे से अपना हाथ अल्ताफ की पीठ पर रखा जिसमे सान्तवना थी, अल्ताफ के मनोभावों को समझ लेने का एहसास था। 
"कहाँ गए हैं वे लोग कुछ पता है ?"
"ये तो नहीं पता लेकिन अभी थोड़ी ही देर हुई है उन्हें गए हुए शायद बस अड्डे पर मिल जायें। "
अल्ताफ चौंक कर पलट गया न सिर्फ इस बात से की महादेव को गए ज्यादा समय नहीं हुआ है बल्कि इस बात से भी कि शबाना उनके मन को समझ गई है।  उन्होंने एक नज़र शबाना पर डाली सब कुछ तो था उस नज़र में।  इस खबर के लिए , उन्हें समझने के लिए और उन्हें क्या करना चाहिए इसका रास्ता दिखाने के लिए प्यार , कृतज्ञता और एक आशा कि शायद वह महादेव से मिल सकें। 
जल्दी से जूते पैर में डाल कर अल्ताफ बस अड्डे की ओर चल पड़ा।  कदमों के साथ बीती बातों ने भी वेग पकड़ लिया।  
***  
मारकाट  मची हुई थी। मंदिरों और मस्जिदों के सामने जानवरों को मार कर फेंका जा रखा था।  दुकाने लूटी जा रही थीं पथराव जारी था। ऐसे में अल्ताफ और महादेव बचते बचाते लगभग साथ साथ ही घर पहुँचे। तभी मोहल्ले के लडके दौड़ते हुए आये उनका मकसद मुस्लिम मोहल्ले से अकेले हिन्दू परिवार को खदेड़ने का था। अल्ताफ ने उनका रौद्र रूप देखा और नज़रें चुरा कर घर में घुस गया। इसके पहले भी कौम की मजलिस में वह महादेव की तरफदारी करने के लिए लानत मलानत सह चुका था। आज लड़कों के तेवर बिगड़े हुए थे। उनके हाव भाव बता रहे थे वे कुछ सुनने समझने वाले नहीं हैं।  महादेव की वह कातर दृष्टी अल्ताफ को आज भी याद है।  दरवाज़ा बंद कर गहरी सांस ले कर उसने कहा था 'या अल्लाह।' दिल से निकली इस पुकार ने काम किया और गली फौजी बूटों से गूँज उठी। 
आंसू गैस के गोलों ने उपद्रवियों को तितर बितर कर दिया।  अल्ताफ ने तुरंत शुक्राने की नमाज़ अदा की लेकिन महादेव की कातर नज़र को अनदेखा करने की शर्मिंदगी से वह कभी उबर नहीं पाया। 
सामने सड़क धुंधला गई थी अल्ताफ ने गमछे से  आँखें पोंछी। वह रोड पर आ गया था। अचानक ख्याल आया महादेव कहाँ जा रहा है किस बस में बैठा होगा ये तो पता ही नहीं है वह उसे ढूंढेगा कैसे ? चलते चलते उसके कदम ठिठक गए निराशा सी तारी होने लगी। 
 
वह बाजार में आ गया चारों और कोलाहल था लेकिन उसके अंदर सन्नाटा  पसरा  था।  इस भीड़ में भी वह अकेला था। अकेला उस व्यक्ति के जाने से जो बरसों पहले उसका दोस्त ना रहा था। ऐसी दुश्मनी भी तो नहीं थी। उसे याद आया दंगों के हादसे के करीब साल भर बाद की बात है गाँव के पास से गुजरने वाले हाई वे के काम पर गाँव के तमाम मजदूर लगे थे।  फसल की कटाई लिए मज़दूरों का टोटा  पड़ा हुआ था। अल्ताफ बड़ी मुश्किल से दो तीन मज़दूरों को राजी कर गाँव में लाया था।  सुबह सुबह वह  उन्हें लेने गया तो पता चला वे किसी और के खेत पर कटाई के लिए चले गए हैं।  अल्ताफ मायूस सा खेत पर पहुँचा तो देखा महादेव के खेत पर जोर शोर से कटाई चालू है।  अल्ताफ का खून खौल गया।  मज़दूरों के ना मिलने से फसल कटने में वैसे भी देर हो गई थी और देर होने से दाने बिखर जाने का खतरा था। गुस्से में उसने खुद ही कटाई शुरू कर दी।  गुस्से से ज्यादा महादेव का इस तरह दगा देना उसे कचोटता रहा।  आँखे भर भर आती रहीं , नथुने ठोड़ी कंपकपाती रही लेकिन वह ना रुका अपना सारा क्रोध क्षोभ दुःख दरांती से निकालता रहा।  दोपहर में जब शबाना रोटी लेकर आई उसे आँसुओं और पसीने  में लथपथ देख हैरान रह गई। उसके हाथ से दरांता लेकर अल्ताफ को छाँव में बैठाया पानी पिलाया। सुबह से खुद से खुद का दुखड़ा कहते कहते थक चुका अल्ताफ फफक पड़ा। शबाना के सांत्वना भरे शब्द और स्पर्श भी उसके मन को हल्का न कर सके।  इतना निकलने के बाद भी गुबार भरा ही रहा वह ठीक से खाना भी न खा सका। तभी उसे महसूस हुआ दो जोड़ी आँखे उसे घूर रही हैं  दिशा समझते पहचानने में समय ना लगा। उस ओर देखने का साहस तो ना हुआ लेकिन उसके  बाद उसकी सोच की दिशा बदल गई।  उन नज़रों की तपिश में उसका क्षोभ पिघल गया उसे वे दो जोड़ी कातर आँखें यकायक याद आ गईं। फसल और घर एक दिखाई देने लगे।  मन फिर अपराध बोध से भर गया।  वह देर तक पेड़ की छाँव में लेटा रहा उसमे फिर दरांता उठाने की शक्ति न रही । उसकी थकान को भाँप कर शबाना ने कहा कल गाँव के दो चार लोगों को साथ लेकर फसल काट लेंगे अब घर चलो।  उसने शबाना को घर भेज दिया वह कुछ देर अकेले रहना चाहता था।  खेत के खाली  हिस्से से मन के खाली हिस्से पर वह पीछे छूट गए खूँट सी खुरदराहट महसूस कर रहा था। 

अगले दिन सुबह सुबह दो मज़दूर उसके घर आ गए अल्ताफ खुद से ही शर्मिंदा हो गया।  फसल पर पूरे परिवार का जीवन टिका था इसलिए वह उन्हें मना भी न कर सका ना ही ये पूछ सका कि उन्हें उसके यहाँ काम पर वापस भेजा गया है या वे खुद आये हैं। खेत पर जाते अल्ताफ ने देखा महादेव की पूरी फसल नहीं कटी थी महादेव गौरी भाभी और उनके दोनों बेटे कटाई में जुटे थे।  
इस घटना के बाद अल्ताफ जाने अनजाने महादेव भाई की खोज खबर रखने लगा।  महादेव की बेटी की शादी तय हुई तो गाँव के एकमात्र हलवाई शौकत भाई से अल्ताफ ने बातों बातों में कह दिया "शौकत भाई महादेव अपने मोहल्लेदार है हिसाब किताब अपनों वाला लगा लेना। " शौकत भाई आश्चर्य से उन्हें देखते रह गए थे अल्ताफ ने झेंपते हुए कहा था ,"शौकत भाई लड़की की शादी में वैसे भी हज़ारों खर्चे होते हैं मैंने तो मोहल्ले दारी  के नाते कहा था आगे आप देख लो। " शौकत भाई ने भी उनकी बात का मान रख लिया था। 
पडोसी के नाते निमंत्रण तो उन्हें भी मिला था लेकिन वो जाने की हिम्मत नहीं कर पाया।  अपने घर से ही तैयारियों का जायज़ा लेता रहा। हाँ शबाना के हाथ बिटिया के लिए खूबसूरत जोड़ा और कंगन भिजवाये थे।  भीगी आँखों इ दूर से बिटिया को विदा होते देखता रहा उस दिन अल्ताफ फूट फूट कर रोया था। 
जीवन सामान्य ढंग से चल रहा था। महादेव और अल्ताफ अब भी दोस्त न थे लेकिन दुश्मन भी न थे।  दोनों के बीच दोस्ती के ज़ज्बात बर्फ बन जम चुके थे।  इस बर्फ के वे आदि हो चुके थे।  कोई इस बर्फ को पिघलाने की कोशिश भी नहीं कर रहा था ना शबाना , ना गौरी और ना ही गाँव वाले। शबाना अल्ताफ की शर्मिंदगी से वाकिफ थी तो गौरी महादेव के दिल के उस जख्म से जो अब भी यदा कदा टीसने लगता था हालांकि अब उस पर वक्त की खत जमने लगी थी।  गाँव वाले या तो खुश थे या शर्मिंदा या शायद तटस्थ। 
महादेव अब भी अल्ताफ जीवन  हिस्सा था एक मूक हिस्सा जिसके चले जाने से हुई हलचल ने उसके भीतर एक सन्नाटे को मुखरित कर दिया था। आँगन की बाड़ में सूखी झाड़ियों से बने छेद को दोनों ने ही कभी पटाने की कोशिश नहीं की। तार पर लटका अंगोछा महादेव के घर पर होने की सूचना देता था।  ऐसा ही कुछ शायद महादेव के साथ भी था।  ईद और दिवाली पर दोनों ही घरों में साफ सफाई रंग रोगन होता था।  अल्ताफ का बेटा नौकरी पर बाहर चला गया तो महादेव के खेत पर बनी मढ़िया दोनों खेतों के बीच की मेढ़ तरफ सरक गई।  शबाना और गौरी की यदाकदा बातें होती थीं आना जाना तो शायद नहीं होता था। 
अल्ताफ यादों के कोलाहल से घिरा बस स्टैंड पहुँचा तो बसों के तीखे हार्न और खोमचे फेरी वालों की आवाज़ से चैतन्य हुआ।  महादेव जाने किस बस में होगा ? कहीं बस निकल न गई हो ?अगर वह चला गया होगा तो ? फिर वह कभी महादेव से न मिल सकेगा। अब उसे सच में महादेव के बिना रहने की आदत डालनी होगी। 
अल्ताफ तेज़ी से खड़ी बसों के अगल बगल चक्कर लगा कर उनमे झांकने लगा।  बस की खिड़की तरफ पीठ किये आदमी को पहचानते वह बस में चढ़ गया। महादेव ही तो है। उसे  देखते ही उसके नथुने और ठोड़ी कंपकपाने लगी शब्द गले में फंस गए बड़ी मुश्किल से होंठ हिले फुसफुसा कर निकले एक नाम की तरंगे हवा में फ़ैल गईं।  महादेव ने अल्ताफ को सामने खड़ा देखा तो उठ खड़ा हुआ।  एक दूसरे के आमने सामने खड़े कुछ ही पलों में दोनों ने आठ साल साथ जी लिए और एक दूसरे के गले लग गए। समय ठहर गया एक दूसरे को बाँहों में थामे उन्होंने आने वाली वह जिंदगी साथ जी ली जो उन्हें एक दूसरे के बिना जीनी थी।  बर्फ पिघल चुकी थी जो कभी पूरी तरह जमी ही नहीं थी।  एक परत के नीचे भावनाओं की तरंगे थीं उस परत को हटाने की कोशिश ही दोनों ने नहीं की थी। अल्ताफ ने जल्दी से महादेव का नया पता ठिकाना पूछा कंडक्टर ने बस चलने के लिए सीटी बजा दी।  धुंधलाती आँखों से दोनों ने एक दूसरे को देखा।  बस चल पड़ी। 
कविता वर्मा 

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

मेरे प्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले "पर "बेअदब सांसे "त्रिवेणी संग्रह के रचयिता राहुल वर्मा जी की पहली समीक्षात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है जिसे मैं आप सभी से साझा कर रही हूँ।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

शायद तुम समझ सको

प्रिय डायरी ,
कहना तो ये सब मैं 'उनसे 'चाहती थी लेकिन तुमसे कह रही हूँ। अच्छा तुम्हारे बहाने उनसे कहे देती हूँ।  
प्रिय ,
आजकल मेरे दिमाग में एक उथल पुथल सी मची है एक अजीब सी बैचेनी ने दिमाग में घर कर लिया है ,लगता है जैसे मैं कहीं कैद हूँ और उस कैद से छूटने के लिए छटपटा रही हूँ लेकिन उससे छूटने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा है बल्कि हर रास्ता मुझे वापस उसी बंधन की ओर,और ज्यादा धकेलता, कसता सा लगता है।  मैं छूटना चाहती हूँ लेकिन किससे यही नहीं समझ पा रही हूँ क्योंकि जिन जिम्मेदारियों से मैंने खुद को हार की तरह सजाया था वही अब बंधन बन गए हैं।  जब इन बंधनों से छूटने  के लिए अपनों की ओर देखती हूँ उनके अपने तर्क होते हैं जो मेरे विचारों और तर्कों के साथ गडमग हो कर मुझे और उलझा जाते हैं।  
कभी जब सबसे घबरा कर सब विचारों ,बातों को कर नए सिरे से सोचना शुरू करती हूँ  तो लगता है बात तो कुछ भी नहीं है बस एक छोटी सी बात है कि मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूँ।  हाँ बस छोटी सी बात अब मेरा नौकरी करने का मन नहीं है।  पिछले पंद्रह सालों से ये नौकरी मेरे जीवन का हिस्सा बन गई है। मेरी पहचान इससे है और मैं इसकी आदि भी हो गयी हूँ लेकिन फिर भी अब मैं इससे आजाद होना चाहती हूँ।  

करियर की महत्वाकांक्षा मुझे कभी नहीं रही ,हाँ मैं कुछ करना चाहती थी अपने को जानने ,समझने ,तलाशने और पाने के लिए।  इस नौकरी ने बहुत कुछ दिया भी है।  चीज़ों को समझने का नजरिया ,लोगों को जानने की समझ विकसित हुई है।  मेरे व्यक्तित्व को संवारा है इसने।  मेरा पहनावा ,बातचीत का ढंग सबमे सकारात्मक परिवर्तन आया है लेकिन अब मैं थक गयी हूँ ,घर बाहर की जिम्मेदारियां निभाते, थोडा आराम चाहती हूँ।  जिस एकरस जीवन की नीरसता को तोड़ने के लिए नौकरी की थी वही नीरसता अब इस भागदौड़ में शामिल हो गयी है मैं निकलना चाहती हूँ इससे।  
तुमने मुझे हमेशा आगे बढाया अभिभूत हूँ मैं।  मेरी काबलियत पर जितना भरोसा तुम्हे था मुझे भी नहीं था।  तुमने मुझे उड़ने के लिए विस्तृत आसमान दिया पर अब मैं पंख समेट कर फिर अपने बसेरे में लौटना चाहती हूँ।  तुम क्यों मुझे उड़ान भरने को विवश कर रहे हो ,मेरे पंख थक गए हैं मुझे विश्राम करने दो।  

जानते हो न  रिश्तेदारों को ख़ुशी नहीं हुई थी जब मैं पहली बार घर से बाहर निकली थी।  कितनी ही समझाइशें दीं गयीं थीं।  क्या जरूरत है ,कितना कमा लोगी ,क्यों थका  रही हो खुद को ? बच्चों को देखो। आज जब इस रास्ते पर इतना आगे निकल आई हूँ सब फिर समझाते हैं ,इतनी अच्छी नौकरी ,इतनी बड़ी कंपनी ,इतना पैसा क्यों छोड़ना चाहती हूँ ? क्या करूँगी घर में रह कर बोर हो जाऊँगी।  

तुम्हारी भी तो अच्छी खासी नौकरी है अच्छी तनख्वाह है। मेरी तनख्वाह की तो जरूरत ही नहीं पड़ती। यहाँ तक की मेरे सारे खर्चे भी तुम ही पूरे करते हो।  ना मुझे कभी ये शौक रहा कि मैं खर्च करूँगी न तुमने कभी मना किया।  हमारे बीच तेरे मेरे पैसे जैसी कोई बात ही नहीं रही।  हाँ मैं मानती हूँ कि पैसा कभी ज्यादा नहीं होता जितना आता जाता है जरूरतें उतना ही पैर पसारती जाती हैं लेकिन उन्हें समेटा भी तो जा सकता है न ? बच्चों के लिए? बच्चों के लिए उनकी जरूरतों के हिसाब से हमारी तैयारी है ना ? याद है जब मैंने नौकरी शुरू की थी ,एक कंपनी में मेरा सिलेक्शन हो गया था और जिस दिन ऑफर लेटर लेने गई थी बाहर तुमने किसी को नौकरी के लिए गिडगिडाते देखा था। उसे नौकरी की बहुत जरूरत थी ,तब तुम्ही ने तो कहा था "क्यों ना तुम ये नौकरी छोड़ दो तो उसे ये नौकरी मिल जायेगी। तुम तो बस  ऐसे ही नौकरी कर रही हो ये तुम्हारी जरूरत थोड़े ही है। " उसका गिडगिडाना तुमसे  देखा नहीं गया था।  अब मेरी व्यस्तता की तुम्हे आदत हो गयी है।  तुम चाहते हो मैं व्यस्त रहूँ ताकि तुम्हारी व्यस्तता में मेरा खालीपन विघ्न ना डाले।  

जानते हो जब मैंने बच्चों को बताया की मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूँ तो उन्हें इस बात की तनिक भी ख़ुशी नहीं हुई।  बल्कि उन्होंने कहा क्या जरूरत है नौकरी छोड़ने की, हम लोग अपने काम कर तो लेते हैं।  उन्हें अब मेरे बिना ,अपनी माँ के बिना, रहने की आदत हो गयी है। फिर भी जब कभी उन्हें समय नहीं दे पाती हूँ तो अपना अपराधबोध छुपाने के लिए उन्हें गिफ्ट, आउटिंग या मूवी के लिए पैसे देती हूँ।  जानती हूँ ऐसा सोचना ठीक नहीं है लेकिन क्या करूँ ?विचारों को दिमाग में आने से रोक तो नहीं पा रही हूँ। 

कारण। कारण तो कुछ भी नहीं है बस मेरा मन नहीं लग रहा है।  ऑफिस का माहौल पहले से काफी बदल गया है मैं उसमे खुद को एडजस्ट नहीं कर पा रही हूँ  घुटन सी होती है।  खैर कह सकते हो इतने सालों में कई बार ऐसा माहौल मिला होगा लेकिन उस समय शायद मैं तैयार थी सब एडजस्ट करने के लिए लेकिन अब और नहीं करना चाहती।   कुछ सृजनात्मक करना चाहती हूँ  लेकिन नहीं कर पा रही हूँ ,दिमाग में थकान सी रहती है।  हाँ जानती हूँ नौकरी करने निकालो तो ये सब तो सहना पड़ता है और लोग भी तो सहन करते हैं लेकिन ये सहना जरूरी है क्या ? 

सबसे बात करके और खुद सोच सोच कर यह भी लगता है कि खाली नहीं रह पाऊँगी घर में।  एक दिन तो घर में रह नहीं पाती।  दिमाग का शोर घर के खालीपन से टकराकर प्रतिध्वनित होता है। लेकिन जब दिमाग शांत होगा तब घर के शांत वातावरण के साथ एकाकार होकर सृजन की राह पर बढेगा।  हाँ एकदम से ये नहीं हो सकता ,दिमाग में उठती विचारों की सुनामी को शांत होकर मनमोहक चमकती लहरों में बदलने में वक्त तो लगेगा।  
देखा एक छोटी सी बात पर कितने अगर मगर हो गए और मुझे उलझा गए । मैं अभी तक निश्चित नहीं कर पा रही हूँ क्या करूं ? कितना मुश्किल है न किसी निर्णय पर पहुंचना ? प्लीज़ मुझे बताओ न "मैं क्या करूँ ?"

कविता वर्मा 




सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

पहली प्रतिक्रिया " परछाइयों के उजाले "

लेखिका कविता वर्मा जी की कहानियों की मैं बहुत प्रशंशक हूँ। सबसे पहले मैंने उनकी लिखी कहानी वनिता पत्रिका में पढ़ी। मुझे बहुत पसंद आई। कहानी का नाम था " परछाइयों के उजाले " !
जब मुझे मालूम हुआ कि उनका प्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले" के नाम से प्रकाशित हुआ है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैंने कविता जी से यह संग्रह भिजवाने का आग्रह किया। अभी कुछ दिन हुए मुझे यह मिला।
कविता जी कि लेखनी में एक जादू जैसा कुछ तो है जो कि पाठक को बांध देता है कि आगे क्या हुआ। लेखन शैली इतनी उम्दा है कि जैसे पात्र आँखों के सामने ही हों और घटनाएं हमारे सामने ही घटित हो रही हो।
बारह कहानियों का यह संग्रह सकारात्मकता का सन्देश देता है। इनके प्रमुख पात्र नारियां है। नारी मनोविज्ञान को उभारती बेहद उम्दा कहानियाँ मुझे बहुत पसंद आया। मेरी सबसे पसंद कि कहानियों में है ,' जीवट ' , 'सगा सौतेला ', 'निश्चय ',' आवरण ' और 'परछाइयों के उजाले '। बाकी सभी कहानियां भी बहुत अच्छी है।
" जीवट " में फुलवा को जब तक यह अहसास नहीं हो जाता कि सभी सहारे झूठे है , तब तक वह खुद को कमजोर ही समझती है। कोई भी इंसान किसी के सहारे कब तक जी सकता है।
" सगा सौतेला " जायदाद के लिए झगड़ते बेटों को देख कर भाई को अपने सौतेले भाई का त्याग द्रवित कर जाता है लेकिन जब तक समय निकल जाता है। यहाँ यह भी सबक है कि कोई किसी का हिस्सा हड़प कर सुखी नहीं रह सकता। पढ़ते - पढ़ते आँखे नम हो गई।
" निश्चय " कहानी भी अपने आप में अनूठी है। यहाँ एक मालकिन का स्वार्थ उभर कर आता है कि किस प्रकार वह अपने घर में काम करने वाली का उजड़ता घर बसने के बजाय उजड़ देती है। एक माँ को बेटे से अलग कर देती है। जब मंगला को सच्चाई मालूम होती है तो उसका निश्चय उसे अपने घर की तरफ ले चलता है।
" आवरण " कहानी भी भी बहुत सशक्त है। यहाँ समाज के आवरण में छुपे घिनौने चेहरे दर्शाये है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि एक औरत का कोई भी नहीं होता है। उसे अपने उत्थान और सम्मान के लिए पहला कदम खुद को ही उठाना पड़ता है और आवाज़ भी । तब ही उसके साथ दूसरे खड़े होते हैं। यहाँ भी सुकुमा के साथ यही हुआ। अगर वह आवाज़ नहीं उठाती तो वह अपने जेठ के कुत्सित इरादों कि शिकार हो जाती। औरत का आत्म बल बढ़ाती यह कहानी बहुत उम्दा है।
" परछाइयों के उजाले " एक अलग सी और अनूठी कहानी है। कहानी में भावनाओं के उतार चढाव में पाठक कहीं खो जाता है। यहाँ भी पढ़ते -पढ़ते आँखे नम हो जाती है। इस कहानी के अंत की ये पंक्तियाँ मन को छू जाती है , " नारी का जीवन हर उम्र में सामाजिक बंधनो से बंधा होता है जो कि उसकी किसी भी मासूम ख्वाहिश को पाने में आड़े आता है। "
कविता जी की सभी कहानियाँ बहुत अच्छी है। मेरी तरह से उनको हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं कि उनके और भी बहुत सारे कहानी संग्रह आएं।
मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ बल्कि एक प्रसंशक हूँ कविता जी कि कहानियों की।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

मेरी पुस्तक 'परछाइयों के उजाले 'अब eBay store 'पर भी।

http://www.ebay.in/sch/i.html?_odkw&LH_BIN=1&_osacat=267&_from=R40&_trksid=p2045573.m570.l1313.TR0.TRC0.Xparchhiyon+ke+ujale+&_nkw=parchhiyon+ke+ujale+&_sacat=267

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

परछाइयों के उजाले



'Parchhaiyon ke Ujale', a book by Kavita Verma .Stories are describing human behavior,women psychology ,their pressure and difficulties in taking decisions in day to day life and when pressure is in its extreme how they come up with strength to take decisions .



















परछाइयों के उजाले लेखिका कविता वर्मा 
सामाजिक कहानियाँ 
मूल्य १२० रुपये (२४ फरवरी के पहले ऑर्डर पर )
फ्री पोस्टल 
आर्डर via  ई मेल kvtverma27@gmail.com






शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

बाल कहानी :- ट्रेज़र हंट

 

शाम के पाँच बजते ही संजू ,सोनू और अभि  ने अपने घर से निकल कर सड़क के मोड़ पर बनी पुलिया की और दौड़ लगा दी। स्कूल से आने के बाद से ही वे सब पाँच  बजने का इंतज़ार करते हैं, ताकि अपने दोस्तों के साथ खेलने जा सकें।  
कॉलोनी में लाइन से मकान बने हैं कहीं भी खेलने की जगह नहीं है। एक मंदिर के आसपास कुछ खाली जगह है जरूर जहाँ कॉलोनी की  महिलाएँ अपने बच्चों को लेकर आती हैं या बुजुर्ग लोग बैठ कर गपशप करते हैं। वहाँ खेलने पर कोई न कोई उन्हें शोर या उछाल कूद ना करने कि नसीहत देते रहते हैं  जो उन्हें पसंद नहीं है। इसलिए ये लोग यहाँ पुलिया पर बैठ कर बाते करते हैं।  
तीनो लगभग साथ ही पुलिया पर पहुँचे और एक दूसरे को हाई फाई करते हुए मिले। दोस्तों से मिलने कि ख़ुशी उनके चेहरे पर चमक रही थी। 
पुलिया पर बैठते ही संजू ने कहा  "अरे रिंकू नहीं आया ?"रिंकू सोनू के घर की तरफ ही रहता है। 
"पता नहीं मैं तो सीधे ही आ गया मुझे तो वह दिखा  भी नहीं ,"सोनू ने कहा।
"आज क्या करना है" अभि ने पूछा जैसे शाम को मिलकर खेलने का कोई लक्ष्य होता है। 
"आज क्या करें यार कहीं खेलने की भी जगह नहीं है यहीं बैठ कर बातें करते हैं। "सोनू ने कहा। 
" तुम लोगों ने वो पानी कि टंकी की तरफ एक मकान देखा है जो खाली पड़ा है ?" संजू ने पूछा।  
"कौन सा मकान ?"
अपनी कॉलोनी के पीछे जो बड़ी पानी कि टंकी है न उसी लाइन में एक बड़ा सा बंगला है कल मैं भैया के साथ उस रोड़ से निकला था तब मैंने देखा था। संजू ने विस्तार से बताया। 
"हाँ होगा तो ?"अभि अब ऊबने लगा था। 
"बहुत बड़ा बंगला है खाली पड़ा है उसके आस पास बहुत सारे पेड़ हैं किसी पुराने किले जैसा लगता है। "
"यार संजू बोर मत कर। हमें क्या करना है खाली मकान से ?" अभि ने थोडा चिढ़ कर कहा।  
"अरे सुन तो अपन उस मकान में चलते हैं ट्रेज़र हंट खेलेंगे मज़ा आएगा।"
"ट्रेज़र हंट वो कैसे ?"सोनू थोडा उत्सुक हो आया।  
"देख रिंकू को भी बुला लेते हैं फिर हममे से एक वहाँ कोई चीज़ छुपायेगा फिर उस जगह और चीज़ के लिए तीन हिंट देगा और उन हिंट के अनुसार बाकि लोग उस ट्रेज़र को ढूंढेंगे।"
"यार लेकिन रिंकू क्यों नहीं आया अभी तक ?"सोनू ने रास्ते को देखते हुए कहा।  
"चलो ना उसके घर चलते हैं उसे ले आयेंगे। "संजू बोला। 
थोड़ी देर देखते हैं शायद वो आ जाये , लेकिन ट्रेज़र हंट में हम छुपायेंगे क्या ? अभि को भी अब उत्सुकता होने लगी।  
"देखो हमारे पास कुछ तो होगा जिसे ट्रेज़र बनाया जा सके जैसे कहते हुए संजू ने सोनू कि कलाई पर बंधी घडी की ओर इशारा किया , अगर संजू घडी छुपाता है तो इसके लिए तीन हिंट देगा ,ये गोल है इसे पहनते हैं या समय बताती है फिर दो हिंट देंगे कि ये किस दिशा में है या किस झाड़ी या चीज़ के पास है। "
"यार वो तो ठीक है लेकिन अगर तुम लोग मेरी घडी नहीं ढूँढ सके तो ? घड़ी  गुमने पर मम्मी मुझे बहुत मारेंगी।"  सोनू ने मायूसी से कहा।
"अरे बुद्धू तो तुझे तो पता होगा ना कि तूने घडी कहाँ छुपाई है हम उसे वहाँ से उठा लेंगे। " अभि ने हँसते हुए सोनू को एक चपत लगाईं।  
सोनू झेंप कर सिर खुजाते हुए मुस्कुराने लगा।  
तभी रिंकू दौड़ते हुए वहाँ आया और हाँफते हुए बोला "सॉरी यार आज मेथ्स का बहुत सारा होमवर्क था मम्मी ने कहा पूरा करके ही खेलने जाना इसलिए देर हो गयी। "
"चलो अब टाइम वेस्ट नहीं करते हैं" कहते हुए अभि और सोनू पुलिया से उतर गए और बोले चलो रेस लगाते हैं और संजू के बताये खाली बंगले की ओर दौड़ पड़े , उनके साथ संजू और रिंकू ने भी दौड़ लगा दी। 
थोड़ी ही देर में वे चारों उस बंगले के सामने थे बंगले का गेट बंद था उस पर ताला लगा था।  सामने झाड़ियों ने बेतरतीब जंगल का रूप ले लिया था।  कुछ सूखी जंगली बेलें छत तक फैली थीं।  पोर्च में धूल की मोटी पर्त जमी थी।  छत तक जाने वाली सीढ़ियाँ बाहर से ही थीं। बंद दरवाज़ों खिडक़ियों पर धूल जमी थी। पोर्च से होकर मकान के पीछे जाने का रास्ता था।  
"यहाँ क्यों आये हैं ?" रिंकू ने उत्सुकता से पूछा उसे अपने देर से आने पर अफ़सोस हो रहा था, पता नहीं दोस्तों ने क्या प्लानिंग कर ली है। 
"पहले अंदर चलते हैं " संजू ने चारों तरफ देखते हुए कहा अभी यहाँ कोई नहीं है और गेट पर चढ़ कर अंदर कूद गया। उसके पीछे पीछे सनी अभि और रिंकू भी अंदर चले गए।  
अंदर आकर सबने बंगले को चारों ओर से देखा। वह एक पुराना बंगला था जो बहुत समय से बंद पड़ा था। धूल , जाले,  पुराने सूखे पेड़  और पत्तों से अटा पड़ा था। सीढ़ियों के नीचे कुछ कबाड़ पड़ा था।  वे सभी सावधानी से एक दूसरे का हाथ पकड़ कर पोर्च से होते हुए बंगले के पीछे तरफ गए, वहाँ भी धूल ,जाले और कचरा पड़ा था। 
"यहाँ कोई भूत तो नहीं होगा ना ?"रिंकू ने फुसफुसाते हुए पूछा तो सभी कि रीढ़ कि हड्डी में सिरहन सी दौड़ गयी। 
"अरे भूत वूत कुछ नहीं होता ," संजू ने हिम्मत बटोर कर कहा। सबने धीमे से सिर हिलाया  लेकिन फिर भी सबकी आँखों में डर बना रहा।  
बंगले के पीछे थोडा अँधेरा सा था, अभि ने कहा "चल सामने चलते हैं यहाँ तो कुछ नहीं है। "

सामने आकर सबने रिंकू को खेल समझाया ,पहले दाम कौन देगा इसका फैसला ताली से किया गया अभि पर दाम आया।  
संजू ,रिंकू और सोनू दीवार की तरफ मुँह करके खड़े हो गए। अभि ने अपनी जेबों को टटोला उसकी जेब में दस रुपये का सिक्का था उसने सिक्का मुठ्ठी में दबाया और चारों तरफ छुपाने की जगह देखने लगा।  सिक्का छुपा कर बोला ओवर। 
अभि को अब ट्रेज़र हिंट देना था। पहला हिंट उसने दिया 'उस चीज़ को देकर आप कुछ भी खरीद सकते हो।' दूसरा हिंट था,'वह किसी सामान के नीचे है 'और तीसरा हिंट था किसी तिरछी चीज़ के नीचे है।' 
संजू ,रिंकू और सोनू सोचने लगे , कुछ खरीद सकते हैं मतलब पैसे ,नहीं नहीं रुपये यार आजकल पैसों में तो कुछ आता ही नहीं है।  मतलब वह चीज़ रुपये है।  
सोनू बोला ,"एक ,दो ,पाँच ,दस सभी रुपये हैं पर सिक्का है या नोट ?" उन्होंने अभि को देखा उसने कंधे उचका दिए।  
"चल छोड़ न यार नोट या सिक्का ढूँढ लेंगे। "संजू बोला "दूसरा हिंट देखो किसी सामान के नीचे, सामान कौन सा ?" 
"देख सीढ़ी के नीचे खाली डिब्बे पड़े हैं." रिंकू बोला।
"और हाँ सीढ़ियाँ तिरछी भी हैं ,"सोनू ख़ुशी से चिल्लाया। 
तीनों तेज़ी से सीढ़ियों के नीचे भागे और सावधानी से एक एक डब्बा उठा कर देखने लगे ,एक गत्ते के डब्बे के नीचे उन्हें सिक्का मिल गया वे सिक्का उठा कर ख़ुशी से कूद कूद कर चिल्लाने लगे।  
तभी सोनू ने कहा ,"यार चिल्लाओ मत अगर मकान में भूत होगा तो जाग जायेगा। "
"हाँ हाँ उठा कर बाहर आएगा और तुझसे चाय नाश्ता मांगेगा। "अभि ने कहा।  
"यार चाय तो है नहीं हम सोनू को ही दे देंगे भूत इसका नाश्ता कर लेगा इतने में उसका पेट भर जायेगा। "संजू ने हँसते हुए कहा।  
"ऐसे मज़ाक मत कर यार मुझे डर लगता है , मैं जा रहा हूँ। "सोनू ने नाराज़गी से कहा।  
"अरे चलो खेलते हैं बातें मत करो। अब किसका दाम है ?"

रिंकू का दाम था उसने अपनी जेबें टटोलीं और छुपाने की जगह ढूँढने लगा. ट्रेज़र छुपा कर वह जल्दी से बाहर आया और बोला ओवर।  
पहला हिंट था वह चीज़ प्लास्टिक और लोहे से बनी है ,दूसरा वह किसी लकड़ी की बड़ी सी चीज़ के नीचे है और तीसरा वह थोड़े अँधेरे में है।  
संजू ,सोनू और अभि सिर खुजाने लगे। प्लास्टिक और लोहे से क्या बनता है ?चाक़ू ,हट यार रिंकू क्या जेब में चाक़ू रख कर घूमता है ? 
"फिर क्या होगा ?"
"चम्मच जिसका हैंडल प्लास्टिक का हो।"
"नहीं यार कुछ और सोचो। "
"दूसरा हिंट क्या है ?" 
"लकड़ी कि बड़ी सी चीज़ ,खिड़की नहीं दरवाज़ा मतलब दरवाज़े के नीचे। "
तीसरा हिंट है अँधेरे में। अँधेरा तो पीछे है यहाँ सामने तो धूप आ रही है अभी। "
तीनों पीछे भागे,"हाँ देख पीछे भी लकड़ी का बड़ा सा दरवाज़ा है इसके नीचे। "
"यार संजू नीचे से कैसे निकालेंगे कोई कीड़ा या छिपकली हुई तो ?"सनी ने डरते हुए कहा।  
"अभि एक लकड़ी ले कर आना तो। "लकड़ी से दरवाज़े के नीचे टटोलते हुए कुछ अंदर को सरक गया।  
"हट यार कुछ था लेकिन अंदर चला गया थोड़ी बड़ी लकड़ी लाना पड़ेगी। " 
अभि एक बड़ी लकड़ी ढूँढ लाया।  संजू ने सावधानी से लकड़ी को अंदर से बाहर किया तो एक शार्पनर बाहर आया।  
" हे मिल गया ट्रेज़र "सोनू चिल्लाया।  
संजू ने लकड़ी बाहर निकाली उसके साथ एक सोने कि चेन भी बाहर आ गयी।  
" ऐ देख ये क्या है चेन सोने की है क्या ?"संजू ने सभी को दिखाते हुए कहा। 
"हाँ हाँ सोने की लगती है , रिंकू तूने सोने की चेन छुपाई थी क्या ?"अभी ने पूछा। 
"नहीं मैंने तो शार्पनर छुपाया था."
"फिर ये चेन किसकी है ?"संजू ने पूछा।  
"लगता है जो यहाँ रहता होगा उसकी होगी। "
"कोई अपनी सोने कि चेन ऐसे फर्श पर क्यों छोड़ेगा ?"
"ए संजू देख इस दरवाज़े पर तो ताला लगा है। "अभि ने ताला दिखाते हुए कहा।  
"लेकिन ताला तो आगे वाले दरवाज़े पर भी है फिर पीछे के दरवाज़े पर भी ताला क्यों ?"
"कहीं ऐसा तो नहीं कोई गड़बड़ हो ?"रिंकू बोला। 
"कैसी गड़बड़ ?" तीनों एक साथ बोले।  
"देख ये ताला नया है इस पर बहुत ज्यादा धूल भी नहीं है , लगता है कोई पीछे के रास्ते से यहाँ आता होगा " रिंकू ने सोचते हुए कहा। 
"कौन ,चोर ! "तीनों एक साथ चीख पड़े।  चारों ने एक दूसरे को देखा और वहाँ से भागे गेट पर चढ़ कर सड़क पर आये ही थे तभी उन्हें सामने दो मोटर बाइक पर आते चार पुलिस के जवान दिखे।  
चार लड़कों को यूँ घबराया देख कर वे वहाँ रुक गए ,"क्या हुआ बच्चों तुम लोग ऐसे घबराये हुए क्यों हो ?"
"पुलिस अंकल ,संजू ने थूक निगलते हुए कहा हम लोग इस खाली बंगले में खेल रहे थे वहाँ हमें ये चेन मिली। "संजू ने हाथ आगे बढ़ाया लेकिन वह खाली था। 
"कहाँ गयी चेन ?"चारों एक दूसरे का मुँह देखने लगे लगता है कहीं गिर गयी।  
पुलिस अंकल ने संजू को ऊपर से नीचे तक देखा और बोले ,"बेटा पुलिस से मज़ाक करना ठीक नहीं है। "
"नहीं अंकल मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ सच में चेन थी लगता है कहीं गिर गई। "
तब तक अभि और रिंकू बंगले के गेट तक जाकर देखने लगे ,गेट के अंदर थोड़ी ही दूर पर चेन पड़ी थी। 
"वह रही चेन कह कर अभि गेट पर चढ़ कर अंदर चला गया और चेन उठा लाया।  
पुलिस के जवानों ने चेन देखी वह वाकई सोने की थी ,"ये तुम्हे कहाँ से मिली ?" 
संजू ने अपना खेल और ट्रेज़र ढूँढने से चेन मिलने तक की सारी कहानी पुलिस के जवानों को कह सुनाई। दो पुलिस के जवान संजू को लेकर अंदर गए।  संजू ने उन्हें वह दरवाज़ा , लकड़ी और रिंकू के हाथ से छूटा शार्पनर भी दिखाया। दरवाज़े पर लगे ताले की चमक और बंगले कि दीवारों पर जमी धूल कि परत को देख कर जवान सोच में पड़ गए।  उन्हें यकीन होने लगा कि कुछ तो गड़बड़ है।  
बाहर आ कर उन जवानों ने थाने फोन करके और पुलिस बल बुलवाया।  अँधेरा होने लगा था ,चारों बच्चों को सुरक्षित घर पहुँचाना जरूरी था।  एक जवान ने उन चारों का नाम पता डायरी में लिखा और दो जवानों से दोनों मोटर बाइक पर चारों को घर छोड़ आने को कहा।  बाकी दो जवान बंगले से कुछ दूर खड़े हो कर उस पर नज़र रखते हुए पुलिस बल के आने का इंतज़ार करने लगे।  

दूसरे दिन अखबार के पहले पन्ने पर बड़े बड़े अक्षरों में खबर छपी थी"खाली बंगले से लाखों का चोरी का सामान बरामद। " 
संजू ने अपने मां पापा को सारी घटना बता दी थी ,सुबह संजू के पापा ने उसे खबर पढ़ कर सुनाई।  
संजू का बहुत मन था कि वह अपने दोस्तों को वह खबर बताये लेकिन अभी तो स्कूल जाना था उनसे मिलने का समय ही नहीं था।  
शाम को जब वह घर आया मम्मी पापा को कहीं जाने के लिए तैयार पाया उन्होंने उसे भी जल्दी से तैयार होने को कहा।  
"हम कहाँ जा रहे हैं ?"संजू ने पूछा वह अपने दोस्तों से मिलना चाहता था लेकिन पापा ने कहा कि उसका साथ जाना जरूरी है जल्दी से तैयार हो जाये।  

एस पी ऑफिस में अभि ,रिंकू और सोनू भी अपने मम्मी पापा के साथ मौजूद थे।  एस पी साहब ने खुद चारों बच्चों को उनकी सतर्कता और पुलिस को खबर देने की उनकी अकलमंदी पर उन्हें बधाई दी चारों का फूलों के गुलदस्ते से अभिनन्दन किया गया वहाँ मौजूद पत्रकारों ने उनके फ़ोटो लिए और उनसे पूरी घटना का ब्यौरा लिया।  
जाते जाते एस पी साहब ने चारों को फिर बधाई देते हुए कहा ,"आगे से वे सावधान रहें और किसी अनजान सुनसान जगह पर अकेले ना जाएँ ये खतरनाक भी हो सकता है। "
अगले दिन सारा शहर अपने इन ट्रेज़र के बारे में जान चुका था।   
कविता वर्मा