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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

जो तुम न होतीं

 अंदेशा तो पहले ही था और आज वह बुरी खबर आ ही गई कुसुम नहीं रही। 15 दिन मौत से जूझने के बाद उसने हार मान ली ।महेश बाबू पत्नी के साथ तुरंत रवाना हो गए। पत्नी बार-बार आँसू पोंछती और वे खामोश हैं मानों मन ही मन सोच रहे थे कि वहाँ जाकर क्या करना है और क्या कहना है या क्या नहीं कहना? या शायद सोच रहे हों कि उनसे कहाँ गलती हुई? वैसे ऐसा सोचेंगे इसकी संभावना कम ही थी फिर भी वह चुप थे गहरे सोच में डूबे हुए। 

लगभग 15 दिन पहले खबर आई थी कि कुसुम सीढ़ियों से गिर गई है। सिर फट गया है अस्पताल में भर्ती है बहुत खून बह गया है और महेश बाबू पत्नी को लेकर तुरंत चल पड़े थे। अस्पताल में बिस्तर पर जो पड़ी थी वह खुद की बेटी है यह स्वीकारने में समय लगा था उन्हें। पीला चेहरा निस्तेज आँखें जिनमें उन्हें देख कर कोई खुशी कोई आशा नहीं उभरी थी। धक्का लगा था उन्हें लेकिन वे खामोश रहे शायद कमजोरी की वजह से है सोच कर खुद को तसल्ली दी थी।  दो दिन रह कर लौट आए थे कुसुम को साथ लाने की चर्चा भी नहीं की थी उन्होंने। सालों नौकरी घर परिवार की जद्दोजहद में गुजर गए अब रिटायरमेंट के बाद फिर इस झंझट में कौन पड़े? बेटी के ससुराल में सास ससुर हैं पति हैं जेठ जेठानी हैं सब संभाल लेंगे वह बहू है उनके घर की। 
बरामदे में अर्थी सजी हुई थी कुसुम को उस पर लिटा दिया गया था। लाल साड़ी बड़ी बिंदी नथ टीका बिंदी सीने पर बड़ा सा मंगलसूत्र हाथ भर लाल चूड़ियाँ बहुत सुंदर लग रही थी वह। चेहरा भी भरा भरा लग रहा था वह पीलापन पिचके गाल कहीं नजर नहीं आ रहे थे। मरने के बाद शरीर फूल गया था शायद। सिर का घाव पल्ले से छुप गया था। 
ऐसी ही तो लग रही थी कुसुम जिस दिन दुल्हन बनी थी। कैसे बिलख बिलख कर रोई थी विदा के समय। महेश बाबू धम्म से उसके बगल में बैठ गए। उसके गाल पर हथेली रखी उसका ठंडापन उन्हें भीतर तक सिहरा गया। उन्होंने साथ लाई बनारसी साड़ी उस पर उड़ा दी। सुहागन सुहाग लेने लगीं वह परे हट गए।
अंतिम संस्कार के बाद स्नान के बाद दामाद पुनीत ने कहा पापा जी आप अंदर मेरे कमरे में आराम करें वे अंदर आ गए। अभी तक की बातचीत से यही पता चला कि सिर का घाव भरने लगा था कुसुम ठीक हो रही थी लेकिन फिर उसके फेफड़ों में पानी भरने लगा और हालत बिगड़ती रही। एक दिन वेंटिलेटर पर रही और कल शाम उसने दम तोड़ दिया। 
कमरे का बिखरापन स्वामिनी के बीमार होने की चुगली कर रहा था। कपड़े जूते तौलिया मैली चादर दीवार पर लगी शादी की फोटो पर जमी धूल बता रहे थे कि कोई उनकी सुध लेने वाला न था। वह लेट गए पर नींद कहाँ थी आंखों में। थोड़ी ठंड सी लगी पत्नी ने चादर निकालने के लिए अलमारी खोली तो कपड़े भरभरा कर उस पर गिर पड़े। उन्हें  चादर देकर वह कपड़े जमाने बैठ गई नींद चैन तो उसका भी गायब था। महेश बाबू पत्नी को देखते रहे एक सूनापन घर कमरे और उनके भीतर व्याप्त था। न जाने कब उनकी आँख लग गई। 
शाम हो चुकी थी बाहर बैठक में घर परिवार के लोग रिश्तेदार सभी बैठे थे वह भी वहाँ बैठ गए। अगले दिन सुबह उठावने के बाद दोपहर में ही जाने का निश्चय उन्होंने कर लिया था। वापसी में जाने से ज्यादा सन्नाटा था वह घर जाकर भी सहज नहीं हो पा रहे थे। पत्नी बैग में से कपड़े निकाल रही थी तभी उनकी नजर उस डायरी पर पड़ी। 
"यह क्या है" उन्होंने पूछा। 
"यह डायरी कुसुम के कपड़े जमाते समय मिली थी उसका नाम और लिखावट देखी तो चुपचाप बैग में रख ली। न जाने क्या लिखा हो शायद इसे पढ़कर पता चले कि क्या कुछ होता रहा उसके साथ? उसने तो कभी बताया नहीं।" कहते हुए पत्नी सुबक पड़ी। उन्होंने डायरी उठा ली और पन्ने पलटने लगे।  
डायरी के पहले पन्ने पर बेहद खूबसूरत फूलों के गुलदस्ते के बीच कुसुम का नाम लिखा था। महेश बाबू ने पन्ने पलटना शुरू किए। 
डियर डायरी 
आज मम्मी से ड्रेस डिजाइनिंग का कोर्स करने की बात कही थी जिसे बड़ी मायूसी से मम्मी ने मना कर दिया। अगले साल भैया का इंजीनियरिंग में एडमिशन करवाना है न जाने कौन सा कॉलेज मिले? किसी प्राइवेट कॉलेज में हुआ तो उसकी फीस भी ज्यादा होती है। भैया की पढ़ाई जरूरी है उसे नौकरी करना है मेरी पढ़ाई पर इतना खर्च फिर मेरी शादी के लिए पैसे बचाना कैसे कर पाएंगे? मैंने अपनी इच्छा को अपने ही अंदर दफन कर दिया दोबारा कभी इसका जिक्र तक न किया। 
डियर डायरी 
आज पापा के दोस्त आए हैं बातचीत में उन्होंने कहा यार लकी है बस एक ही लायबिलिटी है और पापा ठहाका मारकर हंस दिए। भैया का तीन साल से इंजीनियरिंग में सिलेक्शन नहीं हो रहा है उनकी कोचिंग ट्यूशन में हर महीने हजारों रुपए लगते हैं उनकी संगत को लेकर आप हमेशा चिंतित रहते हो लेकिन जिम्मेदारी सिर्फ मेरी महसूस करते हो पापा। 
भैया को मोटरसाइकिल सीखना है। आपने अपने दोस्त से लेकर उसे बाइक चलाना सिखाया फिर खुद का स्कूटर बेचकर बाइक खरीद ली। जब मैंने स्कूटर सीखने की बात की आप हंसकर टाल गए यह कहकर कि हाथ पैर टूट गए तो कौन तुझसे शादी करेगा? सारी जिंदगी तुझे बिठा कर खिलाना पड़ेगा। आपके लिए तो यह हँसी की बात थी पापा लेकिन मुझे गहरे तक चुभ गई। आपने हँसी हँसी में बता दिया कि मैं पराई हूँ और आपके घर में मेरे लिए पूरी जिंदगी के लिए जगह नहीं है। आपकी और मम्मी की हँसी देर तक चुभती रही। 
महेश बाबू पढ़कर सन्न रह गए हँसी मजाक में कही बातें ऐसे भी चुभती हैं यह तो उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था। उन्होंने डायरी के कई पन्ने पलट डालें। 
डियर डायरी 
आज पुनीत जी ने बाइक न देने की बात पर आप को लेकर बहुत खरी-खोटी सुनाई बहुत बुरा लगा सुनकर। मैं जानती हूँ भैया की नौकरी के लिए सिफारिश रिश्वत में आपका बहुत पैसा लग गया है। पिछली बार मम्मी से कहा था कि बाइक का वादा पूरा नहीं होने से सबकी बातें ताने सुनने पड़ते हैं। उन्होंने यह कहकर बात खत्म कर दी कि बेटा तुम्हारी शादी में बहुत खर्च हो गया अब अपने घर की बातें खुद संभालना सीखो। भैया की सब बातें तो आप लोग संभालते हो पापा फिर मैं ही क्यों पराई हूँ? आपकी परेशानियाँ देखकर मैंने सबके ताने सबकी बातें सुनना सहना सीख लिया है। 
डियर डायरी 
मम्मी का ऑपरेशन है। भैया शादी के बाद अभी नौकरी पर गया है उसे छुट्टी नहीं मिलेगी आपने मुझे बुलवा भेजा है। घर में इस बात को लेकर बहुत बहस हुई मैंने सबके हाथ पैर जोड़े रोई गिड़गिड़ा तब आने की इजाजत मिली। 15 दिन घर का काम मम्मी की देखभाल, शादी के बाद पहली बार इतने दिन आपके यहाँ रही। आपके और मम्मी के मुँह पर भैया की व्यस्तता की चिंता और उसके द्वारा ऑपरेशन के लिए भेजे गए ₹10000 की तारीफ ही रही। मेरी सेवा का कोई मोल नहीं है पापा क्योंकि मैं तो पराई हूँ। 
डियर डायरी  
भैया भाभी आठ दिन की छुट्टी लेकर आए हैं यह बात उनके वापस जाने के बाद पता चली। मम्मी ने फोन कर घर के सूनेपन और खुद की उदासी को बहलाना चाहा। मम्मी ने बड़े उत्साह से बताया कि एक दिन ओंकारेश्वर महेश्वर घूमने गए थे। मम्मी ने यह भी कहा कि कितना अच्छा लगता है न जब पूरा परिवार साथ रहता है। पूरा परिवार!!! जिसमें मैं शामिल नहीं हूँ। जिसके साथ रहने के लिए आपने एक बुलावा भेजने की जरूरत नहीं समझी। 
डियर डायरी 
छोटी-छोटी बातें तो रोज ही होती हैं अब धीरे-धीरे बहुत सारी चीजों को बर्दाश्त करना सीख लिया है। अब दिल का एक हिस्सा धीरे-धीरे मरता जा रहा है। जब शरीर का एक हिस्सा मरने लगे तो दूसरे हिस्से में कोई बीज कैसे अंकुआ सकता है? पुनीत जी की दूसरी शादी की बातें फुसफुसाहटों के रूप में मुझ तक पहुँच रही हैं या शायद जानबूझकर पहुंचाई जा रही हैं। इस आधार पर तलाक तो मिल नहीं सकता और इसका इलाज बहुत महँगा है। पुनीत जी और घरवाले यह खर्च उठाना नहीं चाहते। आप से खर्च लेने की माँग करते हैं जो आपसे मैंने कभी नहीं कहा। अब मैं आपको कुछ नहीं बताना चाहती हूँ। अब मेरा जो होगा  सिर्फ मेरा होगा। 
डियर डायरी  
किन शब्दों में तुम्हारा शुक्रिया अदा करूँ? तुमने मेरी वह सब बातें सुनी मुझे समझा जिसे मैं किसी से नहीं कह सकती थी। लगता है अब मेरा और तुम्हारा साथ यहीं समाप्त होने वाला है। 
तुम्हारी कुसुम 

कविता वर्मा

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

मुक्ति

 एंबुलेंस रुकते ही कमर में जोर का झटका लगा दर्द की एक तीखी लहर रीढ़ में दौड़ गई जिसे अधबेहोशी में भी रीना ने महसूस किया। दरवाजा खुला रोशनी का एक कतरा मुंदी आँखों पर पड़ा उसने आँखों को हथेली से ढंकने का सोचा लेकिन वह इतनी निढाल इतनी बेदम थी कि हाथ हिला भी नहीं सकी । अपने आसपास हलचल सी महसूस की उसने और अचानक लगा जैसे पृथ्वी डोल रही है। उसका पूरा  शरीर ही हिल रहा था इस हिलने डुलने में कुछ चेतना सी आई उसने आँखें खोलने की कोशिश की लेकिन तेज रोशनी ने आँखें खोलने नहीं दीं। आसपास तेज आवाजें आ रही थीं जो शोर बन कानों में समा रही थीं लेकिन किसी स्पष्ट रूप में समझ नहीं आ रही थीं। अचानक वह  डोलती धरती किसी सतह पर टिक गई एक झटका सा लगा लेकिन राहत सी महसूस हुई। दर्द अभी चित्कारें मार रहा था। शायद अंदर बहने लगा था वह बहता हुआ महसूस कर रही थी क्या था वह राजीव का प्यार बेटी रूही के लिए ममता या परिवार वालों की आकांक्षा कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

किसी ने उसका हाथ पकड़ा सिहर गई वह। यह तो वही चिर परिचित स्पर्श है जिसे उसके पिता ने उस हाथ में दिया था। नरम मुलायम और गर्म जिसे थाम सोती थी तो बेसुध नींद आती थी। वह फिर सो जाना चाहती थी उस स्पर्श को भीतर उतार कर तभी उसका हाथ छोड़ दिया गया। अकुला गई  वह। घर्र घर्र के शोर के साथ वह उस स्पर्श से दूर ले जाई जा रही थी। एक अनंत सुरंग में घुसती सी। पलकों पर तेज रोशनी के कतरे पड़ते हल्के होते होते फिर तेज हो जाते और फिर वह एक अंधेरे कक्ष में पहुंच गई। 
अचानक सभी आवाजें बंद हो गईं अंधेरा निस्तब्धता ने उसे  डरा दिया उसने फिर जोर लगाकर आंखें खोलना चाही लेकिन सफल नहीं हुई। उसने शरीर ढीला छोड़ दिया या शायद अब उसकी सारी ताकत चुक गई थी इसलिए शरीर ढीला पड़ गया। 
देर तक ठहरे इस अंधेरे सन्नाटे ने उसे दूर कई बरस पीछे धकेल दिया। पहली बार उसकी कोख में हलचल हुई थी खुशी के मारे पूरा परिवार बौरा गया था। तीसरी पीढ़ी के आगमन के आहट की खुशी कभी-कभी फुसफुसाहटों में उस तक पहुँचती रही। टेस्ट बेटा पहला बच्चा उसके अंदर बच्चे के कोख में घूमने से उठती आनंद की हिलोरों के साथ डर की लहरें भी पैदा करते रहे। इसी डर ने उसे इस कदर जकड़ लिया कि दर्द के समय शरीर ढीला ही नहीं हो सका और एक बार पहले भी वह ऐसे ही घुप अंधेरे ठंडे कमरे में पहुँचाई गई थी। रीढ़ की हड्डी में दिया वह इंजेक्शन अभी भी टीसता है लेकिन इसका जिम्मेदार कौन है वह समझ नहीं पाती। 
आसपास हलचल शुरू हो गई कॉटन कपड़े खून डॉक्टर नर्स की आवाजों ने उसे वर्तमान में खींचा। उसे लगा कि वह कहीं हवा में स्थिर है और बंद आँखों से सब देख रही है। उसके कपड़े काटे जा रहे हैं हाथ पर नस ढूंँढ कर बाटल लगाई जा रही है। नसों में कुछ रिसना शुरू हो गया है बेटी को गोद में लेकर ऐसा ही कुछ रिसा था सबके मन में। लक्ष्मी आई है अब पहली बार में जो हो जाए भगवान की मर्जी है। मायूस हो गई थी वह जैसे बेटी पैदा करके कोई भयंकर भूल कर बैठी हो। उसे गोद में लिए घंटों निहारती थी सोचती थी इतनी मासूम आँखें भोली मुस्कान देख कर कोई कैसे अफसोस कर सकता है? धीरे-धीरे बेटी की किलकारी में सभी अवसाद भूल गए और साल भर बीतते न बीतते उसके लिए भैया की चाह सिर उठाने लगी। काँप जाती थी वह अभी तक सुन्न शरीर पर कुछ होते रहने की दहशत से उबर नहीं पाई थी। ऑपरेशन के टांके कभी-कभार टीस उठते थे।  वह चाहती थी राजीव उन्हें सहलाये उससे पूछे उसमें दर्द तो नहीं होता लेकिन वह अपनी इच्छा पूर्ति के बाद करवट बदल कर सो जाता था। उन क्षणों में भी वह रूही के लिए भाई परिवार का वारिस जैसी बातें कर उसमें बेटे के लिए भावना का प्रवाह करता था। शायद यह मेडिकल साइंस से इतर कोई इलाज था बेटे की चाह पूरी करने का। 
अबॉर्शन सी स्थिति है युटेरस बहुत कमजोर है वजन नहीं ले पा रहा। दो साल में तीन बार लिंग परीक्षण बेटी फिर बेटी अवांछित बेटी हर बार अपने अंश को मशीनों से कटवा कर अपनी आत्मा के एक अंश को मारती कोख को हर बार मशीन कटर की खरखराहट से थर्राते हुए वह जानती थी कि उसे कितना कमजोर कर चुकी है। 
बार-बार कहना चाहा राजीव से अब बस अब और शक्ति नहीं बची है मुझ में नहीं चाहिए बेटी तो बेटा ही क्यों जरूरी है? लेकिन राजीव के पौरुष का विश्वास उसे चुप कर जाता देखना अबकी बार बेटा ही होगा। अब उन क्षणों में अंतरंग कुछ नहीं रहा था उन्हें परिवार की इच्छा वारिस वारिस होने की जरूरत और पौरुष का दंभ प्रवेश कर चुके थे। वे सभी जब रीना के भीतर प्रवेश करते अपमान से आहत निढाल हो जाती वह। ऐसा लगता मानो सरेराह निर्वस्त्र कर दी जा रही है। आँखों की कोरों से तकिए में जज्ब होता यह अपमान  अपेक्षा उम्मीदों से भरी उन आँखों को कभी नजर नहीं आया। अच्छा सोचो पॉजिटिव रहो जैसे जुमले उसके ऊपर उछाले जाते जिनमें कोई भाव न होता प्रेम का कतरा भी नहीं। 
बहुत जल्दी थी सभी को उसकी स्थिति कभी किसी ने नहीं समझी। चौथी बार घर में उत्सव सा माहौल था पूरा परिवार मंदिर गया घर में कथा करवाई शादी के गठजोड़ पहन कर वह और राजीव हवन पर बैठे। इस बार राजीव की हथेली में अपनी हथेली रखते लिजलिजा सा अहसास हुआ था उसे। मानो तीनों बार के कटे माँस के लोथड़ों पर उसका हाथ रख दिया गया हो। हटा लेना चाहती थी वह उसे लेकिन रखा रहने दिया मन तो सुन्न था ही तन भी कर लिया। हवन निपटते ही थक गई कहते वह कमरे में आ गई। सच में थक गई थी वह। चार साल में चार जन्म जितनी थकान थी उसे। अब उसकी थकान को समझा जा रहा था या शायद उसकी दौड़ को स्थगित कर दिया गया था। 
बहुत मुश्किल है ब्लीडिंग काफी हो चुकी है नहीं बचा पाएंगे। दरवाजा खुला शायद नर्स बाहर गई वह भी जाना चाहती है देखना चाहती है बाहर खड़े राजीव और सास-ससुर के चेहरे। उनके चेहरे की मायूसी शायद एक सुकून देगी उसे। क्या वह भी उन्हीं जैसी निष्ठुर हो गई है? हाँ शायद लेकिन इसमें अस्वाभाविक क्या है? साथ रहते एक दूसरे का स्वभाव अंगीकार कर ही लेते हैं लोग। तिर्यक मुस्कान सी फैली उसके होठों पर। 
मशीन की खरखड़ाहट ने डरा दिया उसे मुस्कान लुप्त हो गई। यह निष्ठुरता उस अजन्मे बच्चे से क्यों? वह तो लड़का है बेटा है मेरा उसे क्यों कोख से निकाला जा रहा है? बच्चा मर चुका है शायद गिरने से सिर पर चोट आई। युटेरस भी कमजोर था बच्चे को ऑक्सीजन सप्लाई बंद हो गई उसकी धड़कन तो पहले ही रुक गई थी। शब्द चीत्कार कर रहे थे युटेरस नीचे खिसक गया उसका मुँह डैमेज हो गया निकालना पड़ेगा। 
नर्स फिर बाहर गई इस बार वह बाहर नहीं जाना चाहती। डर गई है वह अब क्या वह उस घर में जा पाएगी? बंद होते दरवाजे ने मानो उसकी नियति निश्चित की। एक बेटी की माँ बिना कोख बिना किसी उम्मीद के अब वहाँ क्यों और कैसे रहेगी?
 मशीन की खर खराहट बंद हो चुकी है लाइट भी। कमरे में उसके भविष्य जितना अंधेरा है। उसने डॉक्टर नर्स को बाहर जाते देखा अब वह अपने शरीर में निढाल पड़ी है। इतना हल्का क्यों महसूस कर रही है वह? एकदम उन्मुक्त बिना किसी उम्मीद के अब वह अपनी जिंदगी जी सकेगी। राजीव तो साथ नहीं ही देंगे परिवार भी नहीं लेकिन बेटी तो उसके साथ रहेगी। 
दरवाजा खुल रहा है रोशनी का टुकड़ा उसकी पलकों को चीर उसकी आँखों में भरता जा रहा है। भविष्य में फिर इस अंधेरे से नहीं गुजरना होगा वह आश्वस्त है। बेटे ने उसे मुक्ति दे दी।
कविता वर्मा

रविवार, 2 अक्टूबर 2022

सारा जग अपना

 सुबह के 8:00 बज रहे थे ज्ञानम्मा अभी तक उठी नहीं थी। नींद तो बरसों के अभ्यास से सुबह 6:00 बजे ही खुल गई थी लेकिन आज शरीर के साथ मन की हिम्मत भी टूट रही थी। एक-दो बार मन ने धिक्कारा भी था लेकिन फिर मन ने ही समझाया था कि किसके लिए उठना है? कौन सा कुनबा जोड़ रखा है तुमने कि सुबह उठकर रोटी पानी साफ सफाई नहीं करोगी तो दुनिया उलट जाएगी ? पड़ी रहो चुपचाप जब हिम्मत हो तब उठना। प्यास से कंठ सूख रहा था बिस्तर मानो काट रहा था मन कचोट रहा था कि इस बुढ़ापे में बरसों के नियम धर्म छूट रहे हैं। आँखें बरसना चाहती थीं लेकिन सूख चुकी थीं। अब तो कभी पिछली जिंदगी देखने की कोशिश करती तो वह भी धुंधला जाती। 

घर के  बीचो-बीच बने आंगन में धूप फैल चुकी थी। ज्ञानम्मा ने कोशिश करके खुद को बिस्तर से उठाया और सहारा लेकर आंगन में आई। सारा घर सांय सांय कर रहा था। जोर की रुलाई भीतर से उमड़ी लेकिन गले में आकर अटक गई। किसी तरह एक कप चाय बनाई और वहीं आंगन की सीढ़ियों पर बैठ गई। ऐसे सीढ़ियों पर बैठकर दादी सास चाय पीती थीं। 
14 वर्ष  की थी वह  जब तीसरी पीढ़ी की सबसे बड़ी बहू बनकर रुनझुन करती इस आंगन में आई थी। दादा ससुर दादी सास दो चाची सास और 10 ननन देवर की किलकारियों से गूंजता आंगन। सब उसे घेरे रहते। बहुत छोटे देवर ननद उसके हार कंगन को छूकर देखते तो कोई उसकी रेशमी साड़ी को किसी को उसकी हँसी अच्छी लगती तो किसी को आंखें। पति तो उसके भोलेपन पर रीझे रहते। पांचवी तक ही पढी थी वह और पति तेरहवीं चौदहवीं में पढ़ रहे थे। मोटी मोटी काली किताबें देख वे मासूमियत से पूछतीं "यह किताबें काली क्यों हैं?"
"क्योंकि तुम्हारी काली आँखों ने इन्हें देख लिया है।" वह कुछ नहीं समझती पर कुछ समझने सा आभास देकर वहाँ से हट जाती। 
दिन भर घर में ज्ञानम्मा के नाम की आवाज लगती और वे इस कमरे से उस कमरे जाते हुए आँगन में खेल रहे छोटे ननद या देवर की तरफ से पिट्ठू खेल जातीं या बहुत देर से लंगडी का दाम देकर थके रुंआसे देवर की तरफ से दाम दे दो मिनट में किसी को आउट करके आँगन पार कर जाती। ज्ञानम्मा बच्चों की भाभी नहीं सखी सहेली तारक थीं उनकी फरमाइश अब ज्ञानम्मा के जरिए बड़ों तक पहुंचती और पूरी हो ही जाती। ऐसे ही खेलते कूदते तीन ननदों का विवाह किया ज्ञानम्मा ने। तब तक पति वकालत की पढ़ाई पूरी कर चुके थे और उनका नाम बनने लगा था। 
ज्ञानम्मा के चेहरे पर धूप पड़ने लगी तो वे आँगन में लौटीं। आंते कुल बुलाने लगी थीं। कल रात भी तो कुछ नहीं खाया इसीलिए कमजोरी लग रही थी। बुढ़ापे और अकेलेपन ने चिरई सी भूख कर दी थी। ज्ञानम्मा ने किसी तरह उठकर थोड़ा भात चढ़ा दिया टोकनी में पड़े एक दो टमाटर मिर्च गोभी का टुकड़ा उसी में डाल दिए और करछी चलाने लगीं। 
तीज त्यौहार पर बड़ी-बड़ी देगची में भात बनता था इस आँगन में जिसे दो लोग मिलकर उठाते थे। गांँव में चचेरे ममेरे फुफेरे रिश्तेदार भी घर में आते रहते मेला लगा रहता।
चार साल हो गए थे ज्ञानम्मा के ब्याह को अभी तक गोद हरी नहीं हुई थी। दादी चाची माँ सभी को चिंता होने लगी थी लेकिन ज्ञानम्मा को कभी किसी ने एक शब्द नहीं कहा। ज्ञानम्मा उनकी चिंता समझती थी। दादी का विष्णु पुराण सतत चलता था। इसी बीच उसकी दो देवरानी अभी आ गई थीं। ननदों के विदा होने का सूनापन इस आंगन में कभी नहीं व्यापा लेकिन एक चिंता कभी कभी आंगन में तैर जाती वह महसूस करती और मायूस हो जाती।
भात खदबदाने लगा था उन्होंने चुल्हा बंद किया और भात एक थाली में उलट दिया। उसकी भाप में झिलमिलाता  लाशों से पटा आँगन आ गया। उनकी मांँ बीमार थी बार-बार बुलावा आ रहा था। उस दिन भाई उन्हें लेने आया था। माँ का नेह उन्हें खींच रहा था तो इस आंगन का दुलार रोक रहा था। उस शाम गाँव में चन्ना केशव मंदिर में मूर्ति स्थापना थी। पूरा गाँव महीनों से उल्लास में डूबा इस दिन का इंतजार कर रहा था और वे इसी दिन नैहर जाने वाली थीं। उन्होंने भाई को एक दिन रुकने की विनती की लेकिन उसकी परीक्षा थी कैसे रुकता? माँ की अंतिम घड़ी थी उसे कैसे छोड़ता? न जाने  क्यों आँखों में आँसू भर बार-बार मुड़कर वे इस आँगन को देखती रहीं। भात से भाप उठना कम हो गई थी लेकिन मन भर आया था। एक बारगी थाली परे खिसका दी लेकिन फिर देह धरे को दंड समझ एक एक ग्रास मुँह में डालती रहीं। 
माँ उसी की राह देख रही थीं। उसका हाथ अपने हाथ में लेकर उसने दम तोड़ दिया। माँ की चिता ठंडी भी नहीं हुई थी कि वह मनहूस खबर आई जिसे उसे नहीं बताया गया। बदहवास सी पहुंची थी वह घर के दरवाजे पर। आँखों के सामने आँगन तो था ही नहीं। वह आँगन जहाँ दिनभर हँसी किलकारी गूँजती थी मानों सफेद चादर से ढँका था। दादा दादी और छोटी चाची को छोड़कर सभी उसके नीचे थे। मंदिर का प्रसाद जाने कैसे जहर हुआ कभी पता नहीं चला। पूरे गांव से 40 अर्थी उठीं इस सामूहिक विलाप में वह खुद का रुदन सुन ही नहीं पाई या शायद वह रोई ही नहीं पत्थर हो गई। दादा दादी उम्र के कारण और चाची तबीयत के कारण रुक गए थे। उसे नहीं पता मायके जाते हुए वह बार-बार घर आँगन को क्यों देख रही थी? क्या यह आभास था कि आखरी बार इसे खिलखिलाते देख लो? कुछ दिनों तक सब पथरा गया था। 
ज्ञानम्मा ने थाली धो कर रखी। सुबह से घर का दरवाजा नहीं खुला था जो कभी बंद नहीं होता था। अब उसे दरवाजे से किसी के आने की कोई आस भी नहीं रह गई थी लेकिन उन पथराए दिनों को एक बच्चे के क्रंदन ने तोड़ा था। उसने यंत्रवत काम निपटाए थे। दादा दादी टूट चुके थे चाची बौरा गई थीं न पहनने की सुध थी न खाने सोने की। वह सोचती काश वह भी इस तरह सुध बुध खो सकती लेकिन उसे इस का अवसर ही नहीं मिला। उसने दोपहर में उड़का दरवाजा खोला तो उस बच्चे को रोता पाया जिसे पता नहीं था कि उसके माता-पिता कहाँ चले गए? घर का वह दरवाजा फिर खुल गया। ज्ञानम्मा ने गाँव में घूम घूम कर बच्चों को बेसहारा औरतों को इकट्ठा किया। आँगन की किलकारी फिर गूँज उठी। 
थक गई वह अंदर जाकर लेट गई। अब उम्र हो चली है पता नहीं कब आँख मुंद जाए। ज्ञानम्मा की आँखों में वे सब बच्चे  घूम गए उन सब को पढ़ाई नौकरी के लिए उसने खुद खुशी खुशी विदा किया था। उसके जीवन का बड़ा हिस्सा अकेले होने के बाद भी खाली न रहा। चन्ना केशव से शिकायत भी क्या करती उसने इसे उनका रचाया खेल स्वीकार कर लिया था। घर और मन भर गया था उसका। न जाने कैसे दो बूँद आँसू सूखी आँखों की कोरों से बह निकले अब फिर सब खाली हो गया। 
बाहर कोई  जोर-जोर से दरवाजा खटखटा रहा था। एक बारगी डर गई वह। कितनी अकेली है पता नहीं कौन है? धीरे-धीरे सहारा लेकर दरवाजे तक आई। डर के कारण शब्द गले में जम गए। दरवाजा अभी भी पीटा जा रहा था। उसने काँपते हाथों से दरवाजा खोल दिया। बाहर खड़े हुए सब आँगन में आ गए। आँगन में खेलती किलकारी वापस आ गई थी। किसी ने उन्हें बता दिया था कि आज ज्ञानम्मा का दरवाजा नहीं खुला वे खासे चिंतित थे। कोई हाल-चाल पूछ रहा था तो कोई फल-फूल काट रहा था कोई नब्ज देख रहा था। यह ज्ञानम्मा के जीवन भर की कमाई दौलत थी वह भावविभोर थी।
कविता वर्मा

सोमवार, 26 सितंबर 2022

दरख्त

 स्टेशन पर बेचैनी से चहल कदमी करते विनय ने 2 मिनट में न जाने कितनी बार घड़ी देख ली। वह बेंगलुरु जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहा था। इस इंतजार में बेचैनी थी तो एक डर भी था। डर था कि कहीं कोई जान पहचान वाला उसे देख न ले और देखकर घर पर बाबूजी को खबर न कर दे। वैसे तो आधी रात के 2:00 बजे इसकी उम्मीद कम ही थी लेकिन फिर भी डर तो था ही। विनय ने जानबूझकर यह समय और यह ट्रेन चुनी थी। दिन के समय स्टेशन की चहल-पहल में कोई न कोई जानने वाला मिल ही जाता और नहीं तो स्टेशन के स्टाफ में से कोई बाबूजी को खबर कर देता। सिग्नल हरा हो चुका था विनय ने जेब में टिकट चेक किया पर्स मोबाइल देखा और अपनी अटैची और लैपटॉप बैग को एक नजर देखा। ट्रेन का इंजन धड़ धड़ाता उसके सामने से गुजर गया। ट्रेन की स्पीड कम होते होती भी आधी से ज्यादा ट्रेन उसके सामने से गुजर गई। ए.सी कोच पीछे था उसने लगभग दौड़ लगा दी। डिब्बे में चढ़कर व्यवस्थित भी नहीं हो पाया था कि ट्रेन चल दी राहत की सांस ली विनय ने। ऊपर की बर्थ पर बिस्तर लगाकर लेट कर उसने आँखें बंद कर लीं। 

नींद की जगह विनय की पिछली जिंदगी रील की तरह चलने लगी। शहर के सबसे रसूखदार परिवार का छोटा बेटा विनय दादा ठाकुर विश्वेश्वर सिंह और पिता बशेश्वर सिंह का लाडला उनकी आशाओं का केंद्र बिंदु। परदादा बड़े जागीरदार रहे सैकड़ों एकड़ ज़मीन के मालिक, दादा ने अपनी फैक्ट्रियाँ लगाई जिन्हें पिता ने संभाला और अब बड़ा भाई संभाल रहा है। 

बचपन में दोनों भाई बग्घी में बैठकर स्कूल जाते थे। एक सेवादार क्लास से उनका बैग लाकर बग्घी में रखता। विनय का बड़ा मन करता कि वह भी दूसरे बच्चों की तरह बैग झुलाते चीखते चिल्लाते बातें करते खेलते घर जाए लेकिन ठाकुर परिवार के बेटे ऐसा कैसे कर सकते हैं? बड़ा भाई विजय और विनय बड़ी हसरत से बच्चों को बग्घी में बैठे मुड़ मुड़कर देखते और मुँह लटका कर घर लौटते। घर पर नौकरों की जमात जूते मोजे कपड़े उतारने से लेकर मुँह हाथ धुलाने पोंछने को तैयार खड़ी रहती। दोनों भाई स्कूल के बाद कस्बे के एकमात्र क्लब में क्रिकेट सीखने जाते थे जहाँ उनकी ही तरह धनाढ्य परिवार के बच्चे होते थे। 

नीचे की बर्थ पर से कोई उठकर बाथरूम गया विनय ने करवट बदली। बाबूजी की इच्छा थी कि विनय इंजीनियर बने ताकि वह फैक्ट्रियाँ ठीक से संभाल सके। विजय का मन 11 वीं के बाद ही पढ़ाई से उचट गया था। वह तीन बार की कोशिश में भी इंजीनियरिंग में प्रवेश नहीं पा सका था। निराश दादाजी ने स्कूल के हेड मास्टर को घर बुलवाकर आगे की उसकी पढ़ाई की दिशा तय करने बाबत जानकारी ली और विजय को बीकॉम में एडमिशन दिलवाया। आखिर को फैक्ट्री का हिसाब किताब देखने समझने वाला भी तो कोई चाहिए। विजय कसमसा कर रह गया वह कह हीन हीं पाया कि वह पूरी दुनिया घूमना चाहता है पहाड़ों पर चढ़ना चाहता है समुद्र की लहरों पर सवारी करना चाहता है। परिवार का बड़ा बेटा होने के नाते उस पर उम्मीदों का इतना दबाव था कि वह अपनी इच्छाओं को सम्मान से सिर उठाने देने की हिम्मत ही न कर पाया। 

गाड़ी धीमे होते होते रुक गई शायद कोई बड़ा स्टेशन था। बाहर से चाय कॉफी वालों की आवाजें आ रही थीं। सभी लोग गहरी नींद में थे। कुछ लोगों के खर्राटे डब्बे में गूंज रहे थे। विनय की आँखों में नींद नहीं थी। वह ठीक तो कर रहा है न? उसने खुद से पूछा जवाब सकारात्मक तो न था लेकिन इसके सिवाय चारा ही क्या था? उसने खुद से पूछा। ट्रेन चल दी थी विनय ने बैग से बोतल निकाल कर पानी पिया और लेट गया। 

जब वह दसवीं में था तब उसे शौक लगा था फोटोग्राफी का। बाबूजी शहर से कैमरा लेकर आए थे। सब की नजर बचाकर वह कैमरा ले जाकर जाता और कभी डूबते सूरज की तालाब की लहरों की अकेले उदास खड़े पेड़ की सिर पर लकड़ियाँ लेकर जाती आदिवासी औरतों की फोटो खींचता। दादाजी उससे बहुत प्यार से अपनी इच्छा बताते कि वह चाहते हैं घर में एक इंजीनियर हो और वह सुनकर उदास हो जाता। वह भी दादाजी से कम प्यार नहीं करता था उनके विराट व्यक्तित्व के सामने खुद की लघुता का एहसास होता था उसे। होता भी क्यों नहीं उसने तो बाबूजी को भी उनके सामने बौना ही देखा। सदैव उनकी आज्ञा को सिर माथे रखते। कभी-कभी विनय सोचता क्या कभी बाबूजी की अपनी कोई राय नहीं होती? कभी कभी उसे महसूस होता कि बाबूजी को दादाजी की बात पसंद नहीं आ रही है क्षणांश को उनके चेहरे पर एक हल्की सी लकीर उभरती और गुम हो जाती। कभी उनकी कोई बात नहीं टालते। ज्यों-ज्यों विनय बड़ा हो रहा था सम्मान के इस रवैए पर उसकी असंतुष्टि बढ़ती जाती और दादाजी की उम्र और रुतबे के अनुपात में 'जी दादा जी' कहकर बात समाप्त करने की आदत भी। 

दादाजी की इच्छा थी उसने गणित विषय लिया उनकी इच्छा थी उसने इंजीनियरिंग में दाख़िला लिया। उनको खुशी नहीं होती इसलिए उसने फोटोग्राफी का शौक छोड़ दिया। कॉलेज केंपस इंटरव्यू में उसे दिल्ली में नौकरी मिली थी। उसने खुशख़बरी देने के लिए घर पर फोन किया फोन बाबू जी ने उठाया। खबर सुनकर उनके मुँह से निकली बधाई बीच में ही अटक गई पीछे से दादाजी की भारी आवाज़ सुनाई दी "अब ठाकुर विश्वेश्वर सिंह का पोता दूसरों की चाकरी करेगा इतने बुरे दिन न आए हैं अभी। सात पुश्तें बैठकर खाएँ इतना जोड़ कर रखा है मैंने। उससे कहो डिग्री होते ही घर चला आए।" 

अपनी काबिलियत पर गर्व करने का मौका ही नहीं मिला उसे। अपनी कमाई से कुछ करने का ख़्वाब देखते ही चकनाचूर हो गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए दोस्तों के साथ पार्टी करने को टाल कर वह एक सुनसान सड़क किनारे घंटों बैठा रहा आँसू बहाता रहा। 

घर आकर पहली बार उसने बाबूजी से मन की बात कही। बताया था उन्हें कि अव्वल तो उसे इंजीनियरिंग करना ही नहीं था, कर ली तो अपने दम पर कुछ करना है। जिंदगी भर ठाकुर विश्वेश्वर सिंह का पोता कहलाने के बजाय अपनी पहचान बनाना है। 

"वह परिवार के वटवृक्ष हैं उनके व्यक्तित्व और स्नेह की छाँव है इसलिए हम इतने सुकून से हैं। कोई चिंता नहीं कोई तकलीफ़ नहीं।" 

"मैं अपनी जिंदगी की तकलीफें खुद उठाना चाहता हूँ। अपनी चिंता खुद करना चाहता हूँ। मैं खुद एक मजबूत दरख़्त बनना चाहता हूँ।" 

"तुम्हारे दादा जी की इच्छा का सम्मान करना हमारा फर्ज़ है। "

" और हमारी इच्छा का? उसका सम्मान हम कब करेंगे बाबूजी?" बाबूजी की आँखों में आँखें डाल कर पूछा था उसने और उन्होंने नज़रें झुका ली थीं। 

बरगद के नीचे घास भी नहीं पनपती बाबूजी और मैं तो मजबूत दरख़्त बनना चाहता हूँ। उसने मन में सोच लिया था और बिना किसी को बताए बेंगलुरु की एक कंपनी में नौकरी का आवेदन करके वीडियो इंटरव्यू देकर आज वह चुपचाप घर छोड़ आया था। इस संकल्प के साथ कि एक दिन मजबूत दरख़्त बनकर लौटेगा।

कविता वर्मा 

सोमवार, 19 सितंबर 2022

दौड़

 सुबह गहरी धुंध में लिपटी थी उसमें भीगे पेड़ ठिठुरे से खड़े थे। सूरज भी कोहरे की चादर में लिपटा मानों उजाला होने और धूप निकलने का इंतजार कर रहा था। सुबह के 8:00 बज रहे थे लेकिन लोग अभी भी घरों में दुबके थे। कच्ची सड़क पर इक्का-दुक्का साइकिल या बाइक सवार कोहरे की चादर से इस निस्तब्धता को चीर के गुजर जाते और उनके गुजरते ही सब कुछ मानों फिर जम जाता। मेघना रोज की तरह सुबह 6:00 बजे उठ गई थी। उस समय हवा में जमी धुंध अंधेरे को उजला दिखा रही थी। पक्षी भी पेड़ों के कोटर और घोंसलों में दुबके थे। मेघना ने खिड़की से पर्दा हटा कर उस चंपई अंधेरे को देखा और एक बार फिर बिस्तर में दुबकने का मन बना लिया । लेकिन बरसों की सुबह की सैर की आदत ने उसे उठने को मजबूर कर दिया। उसने केतली में पानी गर्म करके चाय बनाई फ्रेश होकर ट्रैक सूट पहना जूते मफलर टोपी जैकेट पहन कमरे से बाहर आ गई। 

बड़ा भयावह सा अनुभव था कोहरे के उजास को चीरती तो आगे अंधेरा मिलता। वह उस अंधेरे में आंखें गड़ाए दौड़ने की कोशिश कर रही थी लेकिन नहीं जानती थी कि पैर कहाँ पड रहे हैं। आगे सड़क पर गड्ढा है या पत्थर? उसका चेहरा टोपी मफलर कोहरे की पानी की बूंदों से भीगते जा रहे थे।चढ़ाई पर चलने के बावजूद वह शरीर में गर्मी के बजाय ठंड महसूस कर रही थी। ज्यादा देर नहीं दौड़ पाई मेघना और जल्दी ही वापस लौट आई। 
घर आकर गीले कपड़े कुर्सी पर फैला कर कुछ देर एक्सरसाइज की और फिर एक कप चाय बना कर खिड़की के पास कुर्सी लेकर बैठ गई। सुनसान सड़क पर एक जोड़ा हाथ में हाथ डाले लगभग एक दूसरे से लिपटे हुए धीमी चाल से चला जा रहा था। कुहासे के कारण सड़क का सुनसान होना दोनों को अतिरिक्त सुकून दे रहा था। मेघना के होठों पर मीठी मुस्कान तैर गई जो शीघ्र ही एक कड़वाहट में बदल गई। 
ऐसी सुबह प्रेम करने के लिए होती है शेखर का प्यार शुरू शुरू में कितना मधुर लगता था। निहाल हो जाती थी वह कोई इतना प्यार करता है उसे। इसी रास्ते पर मुलाकात हुई थी शेखर से वह अपनी कंपनी की तरफ से एक सर्वे के लिए आया था। छोटे हाइड्रोलिक प्रोजेक्ट लगाने के लिए  संभावना और उपयुक्त स्थान तलाशने। नीचे की ओर जाती इस सड़क के मुहाने के गेस्ट हाउस में ठहरा था। वह एक चमकीली सुबह थी मेघना अपनी पूरी दौड़ पूरी करके लौट रही थी और वह दौड़ शुरू ही कर रहा था। मुस्कान सी आई थी मेघना की चेहरे पर उसे देखकर जिसे उसने छुपाना चाहा पर छूप न सकी। लौटते समय उसे खिड़की पर देखकर शेखर ने हाथ हिलाया तो वह भी जवाब दिए बिना न रह सकी। साथ में सैर कॉफी बातों का सिलसिला कुछ ही दिनों में बेडरूम तक आ गया था। कितना चमत्कारिक लगता था शेखर बात-बात पर ठहाका लगा था उसे हँसाता उसे गुदगुदा ता। 
कम ही उम्र में मेघना से जिंदगी ने क्रूर मजाक किया था। 2 साल की त्रासदी शादी से छुटकारा पाकर वह वापस अपने घर लौट आई थी। साल भर के अंदर ही माता-पिता दोनों चले गए थे। बहुत सूनापन था उसकी जिंदगी में जिसमें शेखर बयार बनकर आया और उसे अपने साथ ले जाने की जिद पकड़ बैठा। इतनी आसानी से भरोसा नहीं करना चाहती थी वह। कुछ जानती ही कहाँ थी वह शेखर के बारे में। जो भी था सिर्फ ऊपरी था घर परिवार माता-पिता उसने तो यही कहा था कि अकेला है यायावर है वह मिल गई ठिकाना मिल गया। पूछा था उसने मोहन चाचा से जिंदगी का इतना बड़ा फैसला अकेले लेने से डरती थी। और उन्होंने आगाह भी किया था लेकिन वही नहीं समझ पाई। शेखर की बातों ने जादू कर दिया था उस पर। सोच ही नहीं पाई कि इन मीठी बातों के भीतर तल्ख सच्चाई भी हो सकती है। 
शेखर के साथ हो ली थी वह सुबह की पहली किरण के साथ उतरे थे वह बस से। उस सुबह पहली बार बरसों का दौड़ने का नियम टूटा था और फिर टूटता ही चला गया। जहाँ रुके थे वह घर नहीं था रेस्ट हाउस था। अकेले इंसान का क्या घर फिर आए दिन टूर पर रहता हूँ इसलिए रेस्ट हाउस में ही डेरा रहता है।  बहलाया था उसने और वह बहल गई कुछ आशंकित सी। कुछ दिनों साथ रहने के बाद दूसरा गेस्ट हाउस फिर शेखर का 8 दिन टूर पर जाना फोन पर छोटी सी बात। दबी आवाज जिसमें औपचारिकता ही ज्यादा थी। मेघना के मन में शक का कीड़ा कुल बुलाने लगा था बहुत झंझावातों से गुजरी थी वह। बहुत मजबूत थी शेखर के प्यार ने उसकी मजबूती को जिस तरह बढ़ाया था मन के शक में उसे कमजोर कर दिया। 
 गेस्ट हाउस की सुनसान अकेली रातों में मोहन चाचा की कही बातें याद आती बेटा मैदानों से भेड़िये पहाड़ों पर आते हैं और हमारे यहां की सुंदर सलोनी भोली भाली लड़कियों को उठा ले जाते हैं। इतनी जल्दी उन पर भरोसा मत करो। माता-पिता न सही कोई तो रिश्तेदार होगा उनकी फोटो नाम पता फोन नंबर कुछ तो होगा। कोई इतनी जल्दी इतना बड़ा फैसला कैसे कर सकता है? लेकिन मेघना फैसला कर चुकी थी। वह चली आई थी घर बसाने लेकिन गेस्ट हाउस की  अजनबियत उसे मुंह चिढ़ा रही थी। 
उस दिन अचानक उसने शहर घूमने का फैसला कर लिया। वॉचमैन को कहकर टैक्सी बुलाई। वह कहता रहा साहब ने मना किया है वह नाराज होंगे मेरी नौकरी चली जाएगी। मेघना इस कैद से उकता चुकी थी। उसने पर्स उठा लिया  कि वह पैदल चली जाएगी। पांच सात किलोमीटर पहाड़ी लड़की के लिए ज्यादा नहीं होते।  शाम ढलने को थी सड़क और दुकानें रोशनी से जगमगा उठी थीं। वह उस मॉल में चली गई इसकी सजावट ने उसे आकर्षित किया था। दुकानें शोकेस में सजे कपड़े जूते रोशनी लोगों की चहल-पहल आवाजें  उसे जिंदा होने का एहसास करवा रहे थे। तभी एक आवाज ने उसका ध्यान खींचा। तमाम आवाजों को धता बताकर वह आवाज उस तक पहुंची थी। वह जानी पहचानी आवाज जिसे सुनकर वह सुध बुध खो देती थी। उसने पलटकर उस दिशा में देखा। आवाज़ का मालिक अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ सेल्फी लेने में मशगूल था। उसकी आंखों में प्यार था बेशुमार प्यार उनके लिए जिन्हें पता ही नहीं था कि वह उनसे धोखा कर रहा है। पागल सी हो गई वह तेजी से आगे बढ़ी लेकिन ठिठक गई। इस अनजान शहर में अजनबियों के बीच बच्चों के सामने उनके पिता को जलील करने की हिम्मत न जुटा सकी। उस औरत को धोखा देने का धिक्कार खुद को हुआ। उसने धीरे से मोबाइल निकाला उनकी फोटो खींची और टैक्सी कर वहाँ से चल दी। वापसी की टिकट लेकर सामान बांधा और अगली सुबह मोहन चाचा के घर चाबी लेने खड़ी थी। घर पहुंचते ही सबसे पहले उसने ट्रैक सूट पहना और इसी सड़क पर लंबी दौड़ लगाने चली गई । शेखर को फोटो भेज कर उसने नंबर ब्लॉक कर दिया। 
सुबह की दौड़ फिर शुरू कर दी इस प्रण के साथ कि इस क्रम को टूटने ना दूंगी।
कविता वर्मा

गुरुवार, 8 सितंबर 2022

पौने तीन मिनट

 पौने तीन मिनट 

चौराहे के समीप आते-आते वैभव ने सामने सिग्नल पर नज़र डाली मात्र पाँच सेकंड बचे थे उसे लाल होने में उसने बाइक की गति बढ़ा दी लेकिन जब वह स्टॉप लाइन से 50 मीटर दूर ही था सिग्नल लाल हो गया। वैभव ने गति कम करते हुए ब्रेक लगा दिए बाइक जोर से चीं की आवाज करते हुए रुक गई। एक खीज सी वैभव के दिमाग में उभरी फिर वह हेलमेट का ग्लास खोलकर आसपास देखने लगा। 
सुबह के 10:00 बजे थे चौराहा तीखी चमकीली धूप से सराबोर था। सिग्नल के तीन तरफ रुके ट्रैफिक की कतारें 50 से 100 मीटर तक फैली थीं। दोपहिया वाहन वाले धूप में रुकने से झुंझलाये हुए अपना हेलमेट उतार कर सिग्नल हरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। कार सवार कार का एसी चलाये जहरीला धुआं अपने से कमतर हैसियत वाले बाइक और साइकिल सवारों पर छोड़कर मानों जता रहे थे कि तुम इसी लायक हो। कुछ पैदल चलने वाले आँख बंद कर इस पार से उस पार जा रहे थे उन्हें न लाल बत्ती की परवाह थी न हरी बत्ती की। उनके अचानक बीच में आने से गाड़ियों की गति कहीं धीमी होती कहीं थम जाती। बाइक वाले दाएं बाएं से निकल जाते और चार पहिया वाले मुँह बनाते भद्दी गाली देते और आगे बढ़ जाते। एक सिग्नल के खंबे के पास ट्रैफिक जवान निस्पृह सा खड़ा था वह न तो पैदल चलने वालों को रोक रहा था और न ही स्टॉप लाइन से आगे आकर खड़े या लेफ्ट टर्न रोक कर खड़े वाहन चालकों को। लेफ्ट मुड़ने वाले पीछे से तेज हॉर्न बजा रहे थे लेफ्ट टर्न रोक कर खड़े वाहन इंच दो इंच आगे बढ़ते और रुक जाते। आगे ट्रैफिक जवान का खौफ उन्हें सता रहा था न जाने उदासीन से दिखने वाले इस व्यक्ति का कर्तव्य बोध कब जाग जाए और कब वह गाड़ी साइड में लगवा कर टारगेट पूरा करने लगे। हालांकि गाड़ी साइड में लगवाने के लिए  साइड जैसी कोई जगह उस चौराहे पर नहीं थी। हर सिग्नल पर गाड़ियों के आसपास कुछ बच्चे भीख माँग रहे थे। वह अधिकतर कार के आसपास मंडराते उसके शीशे को थपथपाते उसमें से अंदर झांकते अपनी दयनीय सूरत दिखा कर कुछ पाने की उम्मीद कर रहे थे। बाइक और साइकिल वालों को उन्होंने भी कम हैसियत का समझ कर छोड़ दिया था। 
वैभव ने लगभग 40 सेकंड में चौराहे का यह जायजा ले लिया था। सिग्नल बदल गया था अब दूसरी सड़क से ट्रैफिक चालू हो गया था। अब गाड़ियाँ वैभव के सामने से गुजर रही थीं। चौराहा पार करने की हड़बड़ी उनमें साफ दिख रही थी। कुछ साइकिल वाले अब इस इंतजार से उकता कर थोड़े थोड़े आगे आते हुए स्टाॅप लाइन के तीन चार मीटर आगे तक आ चुके थे और सामने से आ रही गाड़ियों की गति को रोक रहे थे।  
तभी सामने की सड़क से एक बाईस पच्चीस साल की लड़की जिसने हरी पीली साड़ी पहनी थी दुबले पतले शरीर पर उसका बड़ा हुआ पेट बता रहा था कि वह माँ बनने वाली है सड़क पार करके वैभव की दिशा में बढ़ने लगी थी। तीखी धूप ने उसे बहुत परेशान कर दिया था या शायद वह बहुत दूर से बहुत देर से पैदल चल रही थी उसने साड़ी का पल्ला सिर पर लेकर सिर को धूप से बचाने का जतन किया। एक बार आंखें मिचमिचा कर आसमान की ओर ताका और फिर उसके कदम मानो सड़क से उखड़ गए। एक दो कदम आड़े तिरछे रखते वह आगे बढ़ी लेकिन तीसरे कदम पर खुद को न संभाल पाई और बेहोश होकर तपती सड़क पर गिर गई। वह वैभव से लगभग बीस पच्चीस मीटर दूर चौराहे के बीचो बीच सड़क पर गिरी थी। सड़क पार करने वाली गाड़ियाँ थोड़ी धीमी हुई और फिर उसके दाएं बाएं से गुजरने लगीं मानो अगर अभी सिग्नल पार न किया तो वह जिंदगी भर के लिए लाल होकर रह जाएगा और फिर वह कभी यह चौराहा पार करके अपने गंतव्य पर नहीं पहुंच पाएंगे। वैभव के सामने वाले सिग्नल के पास खड़े ट्रैफिक जवान ने अब तक उस औरत को सड़क पर गिरे हुए नहीं देखा था संभवतः वह अपने ही किन्हीं विचारों में खोया था शायद कोई पारिवारिक समस्या में या अपनी पोस्टिंग किसी और विभाग या चौराहे पर करवाने की योजना बनाने की जुगत में। 
अब वैभव के बाएँ तरफ से ट्रैफिक शुरू हो गया वह औरत सड़क के बीच बेसुध पड़ी हरी पीली घास का ढेर लग रही थी। उसकी साड़ी का रंग बिरंगापन गाड़ियों को उसे बचाकर उसके आसपास से निकलने का संकेत दे रहा था। ट्रैफिक जवान की नजर उस पर पड़ चुकी थी वह दौड़ कर उस तक आया और हाथ देकर सीटी बजाकर गाड़ियों को अगल-बगल से निकलने का इशारा करने लगा। वह किसी खाली ऑटो को देख रहा था लेकिन ऑटो वाले सड़क पर पड़ी उस औरत को देखते जवान को देखते तो कभी स्पीड कम करते कभी बढ़ाते किसी कार की आड़ लेते वहाँ से गुजर जाते। वैभव ने आसपास नजर दौड़ाई शायद कोई उस जवान या औरत की मदद करने आगे आए। उसने देखा आसपास बहुत सारे लोगों ने मोबाइल निकाल लिया था कोई फोटो ले रहा था तो कोई वीडियो बना रहा था। बाकी दो सिग्नल पर रुकी सड़कों पर भी कई लोग वीडियो बनाने में मशगूल थे। ट्रैफिक जवान ने झुककर उस औरत को हिलाया डुलाया वह सड़क पर पसर गई। ट्रैफिक अभी भी निर्बाध चल रहा था। सिग्नल पर रुके लोग उत्सुकता और चेहरे पर दया के भाव लाकर फोटो वीडियो लेने में मशगूल थे। कुछ बाइक सवार आपस में बात कर अपने समझदार होने का परिचय बगल में 30 सेकंड के लिए खड़े सवार को दे देने को बेताब थे। कुछ बंद कार में बैठे लोगों को घटना का ब्यौरा देकर पुण्य कमा रहे थे। कुछ गाड़ियों में महिलाएँ निर्लिप्त सी बैठी थीं उनके चेहरे पर एक संतुष्टि थी कि वे अकेले नहीं हैं उनके साथ कोई है जो मुसीबत में उनकी मदद कर सकता है और यह उनकी समझदारी है। उस पर पानी डालो गर्मी से बेहोश हो गई ऐसी हालत में अकेले नहीं निकलना चाहिए किसी को साथ लेकर आती जैसी फुसफुसाहटें हवा में तैर रही थीं। वैभव के पास पानी नहीं था लेकिन लगभग हर कार में पानी था कुछ बाइक सवार भी पानी रखे हुए थे लेकिन उतरकर जाने में सिग्नल हरा हो जाने और फिर लाल हो जाने पर अगले 2:45 मिनट के लिए फिर रुक जाने का डर उन्हें रोक रहा था। हर व्यक्ति दिल में चाह  रहा था कि कोई उस औरत को पानी पिला दे लेकिन वह कोई खुद न हो। 
सिपाही ने मोबाइल निकाला वह एंबुलेंस को फोन लगा रहा था। वह उस औरत को उठाने की कोशिश भी कर रहा था उसे डर था कि गर्म सड़क उसके शरीर पर फफोले ना बना दे। लेकिन उसे यह भी डर था कि न जाने किस एंगल से खींचे गए किसी फोटो या वीडियो में ऐसा कुछ आपत्तिजनक आ जाए कि वह मुसीबत में फँस जाए। वैभव उसकी बेबसी देख रहा था वह उस बेसुध पड़ी औरत के लिए भी चिंतित था। उसका उभरा पेट उसी के वजन से दब रहा था जो नुकसानदायक हो सकता था। उसने सामने देखा लाल सिग्नल बस हरा होने को था। वह सिग्नल लाल होते ही रुक गया था वह सबसे लंबे समय से सिग्नल पर रुका था अब उसे यहाँ और रुकना चाहिए या नहीं वह निश्चित नहीं कर पा रहा था। थोड़ी देर में एंबुलेंस आ ही जाएगी वह रुक कर क्या करेगा? बाइक पर तो वह उसे ले जा नहीं सकता। उसके रुकने से कुछ नहीं होगा इतने लोग भी तो गुजरे कोई नहीं रुका फिर वही क्यों? कम से कम वह फोटो तो नहीं खींच रहा था उसने खुद को समझाया। वह इस इंतज़ार और उम्मीद में था कि कोई तो उसकी मदद करे  वह कितनी देर सिग्नल पर रुका रह सकता है। उसकी तरफ का लाल सिग्नल हरा हो गया था पीछे से कारों के कान फोडू हार्न उसमें बेचैनी पैदा करने लगे। उसे अब चौराहा पार कर लेना चाहिए। उसने हेलमेट का शीशा बंद किया बाइक में किक लगाया एक नजर अगल बगल से कट मारते चौराहा पार करती गाड़ियों को देखा ट्रैफिक जवान को देखा और बाइक आगे बढ़ाते हुए दाएं तरफ का टर्न सिग्नल दिया और बाइक उस जवान के पास ले जाकर ऐसे रोकी कि सड़क पर पड़ी वह औरत बाइक की छाँव में आ गई। उसने और जवान ने उस औरत को उठाकर सीधा किया और एंबुलेंस का इंतजार करने लगे। 
चौराहे पर सिग्नल बारी-बारी से लाल हरे हो रहे थे और वह अगले कई पौने तीन मिनट वहाँ रुकने का मन बना चुका था।
कविता वर्मा

बुधवार, 7 सितंबर 2022

कड़वी सच्चाई

 अनिल ऑफिस से घर आया तो देखा गली में लोगों की भीड़ लगी थी। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लोग झुंड बनाकर खड़े थे। धीमे धीमे स्वर में होने वाली बातचीत संयुक्त रूप से पर्याप्त ऊंची थी जिसे शोर तो नहीं पर आवाजें कहा जा सके। इन आवाजों में एक खौफ एक अफसोस था और था तनिक सा दुख जिसे महसूस कर अनिल सिहर गया। लोगों के झुंड लगभग हर घर के सामने थे जिससे यह तो पता चल रहा था कि कोई अनहोनी हुई है लेकिन किसके साथ किसके घर हुई है वह यह नहीं जान पा रहा था। वह धीरे-धीरे लोगों के चेहरे पढ़ने की कोशिश करते आगे बढ़ रहा था लेकिन गली में कई बार देखे उन अजनबी चेहरों से कुछ पढ़ नहीं पा रहा था। गली के मुहाने से अब वह काफी अंदर आ चुका था उसकी चाल आसपास खड़े लोगों को देखते काफी धीमी और अटपटी थी लेकिन वह अभी तक वस्तु स्थिति से अनभिज्ञ था। 

उसके घर के बाहर ओटले पर चार पांच औरतों का जमावड़ा था जिनमें से एक उसकी पत्नी थी जो उसे देखकर तुरंत अंदर चली गई। बाकी औरतें भी थोड़ी देर चुप होकर उसके ओटले से थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गईं। अनिल अंदर पहुंचा जूते उतारकर पलंग पर बैठा कि पत्नी ने उसे पानी का गिलास थमाया। उसकी आंखों में उमड़ा प्रश्न मुखर था या पत्नी की उसे सब बताने की इच्छा ज्यादा प्रबल थी पता नहीं लेकिन वह गिलास का पानी खत्म होने का इंतजार न कर सकी। "मोहिनी भाभी के सुमित ने आत्महत्या कर ली"। यह खबर वज्रपात सी आई थी और पानी का आखरी घूंट उसके गले में अटक गया। जोर का ठसका लगा था उसे और मुँह से पानी खांसी के साथ फव्वारा बन बाहर आ गया। उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गई जो यह जानकर भय से भर गईं कि 12वीं में फेल होने और कहीं कोई काम न मिलने के बाद से वह बहुत उदास था। घंटों कमरे में अकेला बैठा रहता था और आज सुबह वह कहीं बाहर गया था। वहाँ से आकर खुद को कमरे में बंद कर लिया और फंदा गले में डालकर पंखे से लटक गया। 
अनिल के भीतर बैचेनी फैल गई जिसे पत्नी से छुपाने और धोने के लिए वह बाथरूम में घुस गया। सुमित ने आत्महत्या कर ली वह फंदे से लटक गया शब्द उसके दिमाग पर हथौड़े से पड़ रहे थे। उसने चेहरे पर पानी के कई छपाके मारे उसकी सांस अभी भी संयत नहीं हुई थी। वह देर तक दोनों हथेलियों में तौलिया लिए गाल थामें खड़ा रहा। वह खुद को उस बात से परे होने का विश्वास दिलाना चाहता था जो खबर सुनते ही उसके दिमाग में कौंधी थी और जिस ने उसे भयभीत कर दिया था। 
बाथरूम के बाहर से पत्नी की आवाज आ रही थी जिसे शायद वह देर तक सुन नहीं पाया था इसलिए अब दरवाजा पीट कर वह उसे पुकार रही थी। उसने जल्दी से तौलिये से सिर मुँह पोंछा और खुद को संयत सा दिखाता बाहर आ गया। चाय का कप थामें भी वह सोच में गुम रहा और फिर एक घूंट में उसे खत्म कर पैरों में चप्पल डालकर अभी आया कहते वह घर के बाहर आ गया। पड़ोसी हरिहर भाई को देख कर कुछ देर उनके पास रुक कर उसने तफसील से पूरी जानकारी ली जिसमें मोहिनी भाभी द्वारा सबसे पहले लाश को देखने उसे नीचे उतारने में सब पड़ोसियों का सहयोग पुलिस को खबर देने और पोस्टमार्टम होने के बाद अंतिम संस्कार होने की खबर शामिल थी। हरिहर भाई से विदा लेकर अनिल गली के बाहर निकल गया। बाहर चाय की दुकान पर खासी भीड़ थी वह वहाँ से आगे बढ़ सड़क पार कर उजाड़ पार्क में जाकर बैठ गया। वह लगभग स्तब्ध था दिमाग में सिर्फ एक ही बात गूंज रही थी सुमित ने आत्महत्या कर ली आज सुबह वह बाहर गया था। आज सुबह वह बाहर गया था इस बात ने उसे आत्महत्या की खबर से ज्यादा विचलित किया था।
अनिल के दिमाग में पिछले दिन की स्मृति कौंध गई। फर्स्ट क्लास से एमकॉम पास प्राइवेट ऑफिस में क्लर्क अनिल काम की अधिकता मेहनत के अनुरूप तनख्वाह न मिलने और मालिक के अपमानित करने वाले रवैए से झुंझलाया हुआ था। कल फिर उसे एक छोटी सी बात पर बुरी तरह झिड़का गया था और उस अपमान को वह रात भर हजम करने की कोशिश में करवटें बदलता रहा था। आज सुबह उसका ऑफिस जाने का मन कतई नहीं था लेकिन यह नौकरी उसकी मजबूरी थी और दूसरी नौकरी मिलना आसान भी नहीं था। 
घर से निकलकर वह नुक्कड़ की चाय की दुकान पर रुक गया था। बस यूँ ही चाय पीकर ऑफिस जाने की हिम्मत बटोरने तभी सुमित वहाँ आया था और बेंच पर उसके बगल में बैठ गया था। अनिल ने उसकी अनदेखी कर उपेक्षा ही कर दी थी लेकिन सुमित ने उससे पूछा "अनिल भाई मुझे कहीं नौकरी मिल जाएगी क्या? कोई भी छोटी-मोटी नौकरी चलेगी कहीं पियून या ऑफिस बॉय या फिर कुछ और।" 
अनिल में घूर कर सुमित को देखा था कहांँ तक पढ़े हो तुम उस ने तल्खी से पूछा था। सकुचाया था सुमित जवाब देते फिर धीरे से बोला "भैया बारहवीं में फेल हो गया हूँ इस साल। पढ़ाई मेरे बस की नहीं है इसलिए सोच रहा हूँ कोई काम ही शुरु कर लूँ कोई छोटी-मोटी नौकरी।" उसकी बात पूरी होने से पहले ही अनिल ने लगभग चिढ़ते हुए कहा था "शहर में लाखों एम ए बी ए पास टल्ले खाते घूम रहे हैं उन्हें चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल रही तुम्हें 12वीं फेल को कौन नौकरी देगा?" 
सुमित का चेहरा उतर गया उसे देखकर अनिल को अनोखा सा सुख मिला था। एक दिन पहले हुए अपमान की जलन सुमित का उतरा चेहरा देखकर कुछ कम सी होती महसूस हुई। शायद नौकरी लगने के बाद पहली बार उसने किसी से ऐसी तल्खी से बात की थी वरना तो वह हमेशा दूसरों की झिड़कियाँ ही सुनता रहा था। अनिल ने चाय की दुकान पर काम करते 12 साल के उस लड़के की ओर इशारा करके कहा था "इसे देख रहा है इसने कभी स्कूल का मुँह भी नहीं देखा होगा इसलिए इसे यहाँ गिलास धोने का काम मिल गया। तू तो 11वीं तक पढ़ गया है अब तो तू इस काम के लायक भी नहीं रहा। पढ़ाई न करता तो शायद तसले ईट धोने के काम का रह पाता।" ज्यों-ज्यों अनिल बोलता गया त्यों त्यों सुमित का चेहरा निराशा और अपमान से काला पड़ता गया और अनिल एक सुकून सा महसूस करता रहा। 
इस देश में या तो अनपढ़ों के लिए काम है या खूब पढ़े लिखे अंग्रेजी में गिटपिट करने वालों के लिए।" तुझ जैसे" दरअसल अनिल कहना चाहता था हम जैसे लेकिन अपने अपमान की आग बुझाने के सुख में उसने आधा सच ही कहा। "तुझे जैसे अध पढे लोगों के लिए इस देश में न कोई काम है और न सम्मान। ऐसे लोग सिर्फ दुत्कारे जाते हैं घर में भी बाहर भी।" अनिल ने चाय का खाली गिलास रखा पैसे दिए और कनखियों से सुमित के उतरे चेहरे को देखते सुकून की साँस लेते ऑफिस के लिए चल पड़ा। 
उसके बाद ही सुमित ने घर जाकर आत्महत्या कर ली। उसने आत्महत्या नहीं की मैंने उसे उकसाया मैंने उसकी हत्या की। बेचैनी से अनिल के माथे पर पसीना छलछला गया। वह उठ खड़ा हुआ उसका अपराध बोध उसे धिक्कारने लगा। वह फिर बेंच पर बैठ गया। नहीं नहीं मैंने सुमित से ऐसा कुछ नहीं कहा मैंने तो उसे सिर्फ सच्चाई बताई कड़वी सच्चाई। उसने खुद को समझाया। 
मोबाइल की घंटी ने उसकी तंद्रा भंग की। पत्नी का फोन था वह चिंतित थी अनिल को घर जाना था पर वह अभी भी निश्चित नहीं कर पाया था क्या वह हत्यारा है?
कविता वर्मा