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शनिवार, 26 जनवरी 2013

चल खुसरो घर आपने ......


अम्मा जी की तबियत बहुत दिनों से ठीक नहीं चल रही थी। उम्र भी हो गयी थी। अस्सी के लगभग तो होगी। दांत सारे  गिर गए थे। दूसरी बत्तीसी लगवाने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें बड़ा अटपटा लगता था इसलिए नहीं लगवाई। इसलिए खाने पीने में कई चीज़ों से वंचित हो गयीं। बाल सारे सफ़ेद हो गए।चेहरे पर सलवटों के बीच अपने दिनों की सुंदरी अम्माजी को ढूँढ पाना मुश्किल हो गया। साल भर पहले इन्हीं दिनों उन्हें अटेक आया था लगा तो उस समय भी यही था की अम्माजी अब गयीं की तब गयीं। लेकिन जाने कैसी इच्छा शक्ति थी की कुछ ही दिनों में वे फिर उठ खड़ी हो गयीं थी। उस समय सब हॉस्पिटल के चक्कर में ही रहे उन्हें आई सी यू में रखा गया था। ऐसे में किसे होश था कि रिश्तेदारों को खबर करें? फिर घर में सिर्फ उनकी एक बहू ही थी अब वह या तो घर देखे या हॉस्पिटल में उन्हें देखे। 

जब हॉस्पिटल से घर आ गयीं तब उनकी बेटियों को खबर दी गयी। खबर सुनते ही सबने घरवालों की जो लानत मलानत की कि पूछो ही मत। उनकी बड़ी बेटी यानि बड़ी बुआ ने तो अपने भाई को खूब खरी खोटी सुनाई। अब बता रहे हो अगर अम्माजी को कुछ हो जाता तो क्या मिटटी के दर्शन करने बुलाते?उनके जीते जी एक बार उनसे मिल लेते। उनका आशीष ले लेते लेकिन तुम्हे क्यों होश रहने लगा की हमें खबर करो। छोटी बेटी ने इतना कुछ तो नहीं कहा लेकिन इतना जरूर कहा की भैया एक बार फ़ोन तो कर देते। लेकिन बुआजी याने अम्माजी की दोनों ननदें तो भतीजे के सर पर ही सवार हो गयीं। बेटा अभी जब तक भैया भाभी जिन्दा हैं तब तक तो सुख दुःख का रिश्ता निभा लो। उनके जाने के बाद जाने हमारा मायका रहे न रहे। भाभी से आखरी समय में मिल कर अपने कहे सुने की माफ़ी ही मांग लेते। वो तो वो ठीक हो गयीं नहीं तो ये कसक जीवन भर की हो गयीं थीं। अब ये अलग बात है की दोनों बुआजी अम्माजी के हर काम में मीन मेख निकलने में सारी जिंदगी लगी रहीं। काकाजी याने बाबूजी के छोटे भाई कहने को उनसे महीनों कोई सन्देश खबर नहीं मिलती  लेकिन ऐसे समय में वे भी कहने से कैसे चूकते बेटा कम से कम घर वालों से तो सम्बन्ध निभाओ। अब ये अलग बात है की उनका बेटा  तो उन्ही से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। हां अम्माजी के मायके वाले जरूर बहुत कुछ नहीं कह पाए बाबूजी का बहुत लिहाज करते है लेकिन ये तो कहा ही चलो भगवन की दया है वे ठीक है नहीं उन्हें जीते जी नहीं देख पाते। 

इस चौतरफा आक्रमण से अम्माजी के बेटे और बहू बहुत व्यथित हुए। अब कहते तो किससे इसलिए एक दूसरे से ही यह कह कर संतोष कर लिया की हम तो अम्माजी की सेवा में लगे थे ये कोई नहीं समझता बस सबको मौका मिल गया ताने मारने का।  

उसके बाद कुछ दिनों तक उनकी तबियत ठीक रही लेकिन हार्ट ने काम करना कम कर दिया था सुगर बढ़ गयी थी ब्लड प्रेशर भी ज्यादा था करीब छ महीने बाद एक बार फिर उनकी तबियत ख़राब होना शुरू हुई तब से तो उनकी हालत दिनों दिन कमजोर ही होती गयी। अब पिछले एक महीने से तो उनका उठना बैठना भी मुश्किल हो गया है। बिस्तर पर ही सब होता है। अम्माजी की बहू ही उन्हें संभालती है। उनकी छोटी बहू बाहर रहती है साल में एक चक्कर भी लगा ले तो बहुत है। वैसे कोई मनमुटाव नहीं है लेकिन बस वही टाइम किसके पास है। फिर जब सब ठीक चल रहा है तो क्यों बेकार आने जाने में समय ख़राब करना। बेटियां भी अब तो अपनी सुविधा अनुसार आती हैं। त्यौहार के समय उनके बच्चों के स्कूल रहते हैं तो गर्मियों की छुट्टियों में होबी क्लासेज। फिर कभी छुट्टियों में उनका ही घूमने फिरने का प्रोग्राम बन जाता है तो यहाँ आना नहीं होता। बुआजी भी अब पहले जैसे हर साल नहीं आतीं।

अम्माजी की तबियत ठीक होने का इंतजार करते करते पंद्रह दिन और बीत गए लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं आया। बेटियों को फ़ोन पर खबर की गयी। लेकिन उस समय उनके बच्चों की परीक्षाएं चल रही थीं। उन्होंने कहा भैया हमें खबर देते रहना मम्मी का ध्यान रखना। अपनी भाभी से भी उन्होंने फ़ोन पर ही रो रो कर अपनी न आने की मजबूरी बताई और उन्हें ही सब देखना है सब संभालना है अम्माजी अब उन्हीं के हवाले हैं जैसे भावुक वार्तालाप के द्वारा उनमे उनकी जिम्मेदारी का भरपूर अहसास जगाया। बाद में उनकी बहू अपने पति के सामने भुनभुनाएँ भी की क्या में नहीं कर रही हूँ सब ?फिर क्यों दीदी लोग बेकार की बातें करती हैं। अब भैया बेचारे भी क्या कहते? देख तो वो भी रहे हैं लेकिन अब कहें तो क्या? उन्हें तसल्ली ही दे सके की तुम किसी की बातों पर ध्यान न दो मैं और बाबूजी जानते हैं न की तुम सब कर रही हो। हमने तो कुछ नहीं कहा बाकियों को छोडो। ऐसे ही समय में उनके मन में एक कसक उठी की एक और बहू भी तो है उसे भी तो अपनी सास की सेवा करना चाहिए। दबे स्वर में उन्होंने भैया जी से ये कहा भी लेकिन भैया जी जानते थे की अभी कोई नहीं आएगा। तुम क्यों बेकार की बातें सोचती हो। अम्माजी शुरू से हमारे साथ रहीं हैं तुम से ज्यादा बेहतर उन्हें कौन जानता है फिर इस बेबसी की हालत में उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति के भरोसे छोड़ना जिसे उनकी जरूरतों की जानकारी ही नहीं है क्या ठीक होगा?

दिन निकलते गए और ठीक होने के इंतज़ार में अम्माजी की हालत बद से बदतर होती गयी। डॉक्टर का कहना था की अब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है जितनी सेवा कर सकते हो कर लो। एक पल तो आने वाले अनिष्ट की आशंका से सबके मन हिल गए। अम्माजी अब तो बिलकुल हिल दुल भी नहीं पा रहीं थीं उनका शरीर सुन्न पड़ता जा रहा था। ऐसे में घर की एकमात्र महिला सदस्य होने के नाते उनकी बहू को ही उनकी सेवा करनी थी। वह तो वैसे भी महीनों से लगी ही थी। उस दिन जब डॉक्टर गए सब जैसे चुप से हो गए। 

दूसरे दिन सुबह की चाय के समय बाबूजी ने अपने बेटे से कहा "बेटा तुम्हारी माँ की हालत ठीक नहीं है क्यों न सबको खबर कर दी जाये कहीं ऐसा न हो ये चली जाएँ और कोई इनसे मिल ही न पाए। पिछली बार जब तबियत ख़राब थी किसी को नहीं बताया था तब सभी को बुरा लगा था।"
रसोई में काम करती उनकी बहू के कान खड़े हो गए। दोनों दीदियाँ, बुआजी, काकाजी, मामाजी मतलब कम से कम 12-15 लोगों का जमावड़ा ऐसे समय में छोटी बहू तो पहले ही कन्नी काट लेगी वो अकेली और इतने लोगो की मेहमान नवाजी और फिर अम्माजी की सेवा टहल। वे दम साधे अपने पति की प्रतिक्रिया सुनने की कोशिश करने लगीं। 

भैया जी समझते थे कि अम्माजी की हालत नाज़ुक है। वे ये भी जानते थे की अब ज्यादा समय नहीं है और अगर अभी सबको खबर न की गयी तो रिश्तों में कड़वाहट आएगी ही सबके ताने भी सुनने पड़ेंगे। साथ ही वे ये भी समझते थे की इस समय अम्माजी की सेवा सबसे बड़ा धर्म है और उनकी धर्मपत्नी अकेले अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं।अब उन पर मेहमानों की जिम्मेदारी भी डालना ठीक न होगा। लेकिन रिश्तों की अहमियत समझा कर उन्हें ध्हीरे से तैयार करना होगा।अब रिश्ते तो निभाने ही हैं न?वैसे इतने रिश्तेदारों में किसी से मदद की कोई उम्मीद उन्हें नहीं थी। उन्हें पता था बुआजी और बहने सभी मायके में आराम करने ही आएँगी और उनकी उम्मीद होगी की उनकी बढ़िया खातिरदारी की जाये। उस समय तो उन्होंने बात को किसी तरह टाल दिया यह कह कर की बाबूजी अभी देखते हैं। सभी को एक साथ खबर करके घबराहट फ़ैलाने से कोई फायदा नहीं है। अन्दर रसोई में उनकी पत्नी ने राहत की सांस ली। लेकिन आने वाली मेहमानों की फौज से कभी न कभी तो सामना होना ही था। उन्हें बहुत दिनों तक तो टाला नहीं जा सकता था। उनके लिए तो दोनों तरफ मुसीबत ही थी।उन्होंने अखबार मुंह के सामने फैला लिया और वे गहरे सोच में डूब गए किस तरह इस समय को संभाला जाये की रिश्तेदारी में खटास भी न पड़े और पत्नी पर अनावश्यक बोझ भी न पड़े। 

वे वहां से उठ गए और छोटे भाई को फ़ोन लगाया। अम्माजी की हालत के बारे में और डॉक्टर की रिपोर्ट के बारे में जानकारी दी। सुन कर  वह भी चिंतित हो गया।भैया में अभी चलता हूँ आपने पहले क्यों नहीं बताया? 
पहले क्या बताता डॉक्टर ने कल ही ये बताया है। बस अब अम्माजी का आखरी समय है। ऐसा कर तू बच्चों को लेकर आ जा। आखरी समय में सब उनकी सेवा कर लें नहीं ऐसा न हो की कसक ही रह जाये। 

भैया जी ने जानबूझ कर सभी को खबर करने वाली बात टाल दी। पहले घर के लोग तो आ जाएँ। वैसे उन्हें पूरी उम्मीद थी की छोटा भाई सबको ले कर आ जायेगा तो बहूजी को भी काम में मदद मिल जाएगी। वो तो शुक्र था की देवरानी जिठानी में कोई टसल नहीं थी। लेकिन फिर भी इंसान को जब पता चलता है की उससे कोई मतलब साधा जा रहा है तो वह बिदकता है इसलिए वे काम और जिम्मेदारी की बात टाल  गए। 

छोटे भाई ने भी उनकी बात रखी और दूसरे दिन सुबह जब बड़ी बहू पानी ही भर रही थी दरवाजे पर ऑटो आ कर रुका अम्माजी का छोटा बेटा बीवी बच्चों के साथ आ गया था। घर के बुझे बुझे माहौल में रौनक आ गयी। अम्माजी की हालत देख कर बेटे बहू की आँखों में आँसू आ गए। एक छोटा सा उलाहना तो उन्होंने भी दिया लेकिन फिर खुद के मन ने उन्हें धिक्कारा की उन्होंने खुद ही कहाँ इतनी खैर खबर ली। जबकि अम्माजी की तबियत साल भर से ख़राब चल रही है। वे तो कोई खबर न आने का मतलब सब ठीक समझ कर बैठे थे। 

उस दिन घर के कामों के बीच अम्माजी की सेवा टहल करते दोनों बहुओं में एक अलग ही सामंजस्य देखने को मिला। दोनों ने एक दूसरे को अपना सहारा समझा तो अपनापन और गहरा गया। बड़ी बहू के अकेले परेशान होने को छोटी बहू ने अपनी जिम्मेदारियों से खुद को दूर रखने के अपराधबोध में लिया तो बड़ी बहू ने इसे ताने उलाहने का रूप देने से बचाने में पूरी कामयाबी हासिल की। दोनों ने ही इस बात को बखूबी समझा की ये दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है जिसे दोनों को मिल कर ही निभाना है। उनके इस आपसी समझ और सामंजस्य को देखते हुए दोनों भाइयों और बाबूजी ने राहत की सांस ली। 

उस दिन खाना पीना निबटने के बाद दोपहर में सभी आगे की रूपरेखा बनाने बैठे। सबसे बड़ा प्रश्न था रिश्तेदारों को खबर की जाये।लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न था की खबर कब की जाये ताकि किसी को कोई शिकायत भी न रहे और मेहमानों को अनावश्यक रूप से घर में बहुत दिन भी न रुकना पड़े। अब मौत का समय तो कोई निश्चित होता नहीं कि कल आएगी या परसों। 
अब ऐसे कैसे कोई समय मुकम्मल कर के खबर की जाये? कसाब को तो कब से फांसी हो गयी थी लेकिन उसकी किस्मत में चिकन बिरयानी थी तो वो मेहमान नवाजी करता रहा न और जब दाना पानी ख़त्म हो गया तो अचानक हिसाब चुकता हो गया। छोटे बेटे ने ठिठोली करके माहौल को हल्का करने की कोशिश की। लेकिन यक्ष प्रश्न तो अब भी वैसे ही मुँह बाये खड़ा था। खबर की जाये या नहीं, की जाये तो कब? 
अम्माजी ने पहचानना बंद कर दिया था। हाथ पैरों की शक्ति चुक गयी थी। लेकिन बात करने पर उनकी आँखों में भाव आते थे,कभी खुद की अवस्था पर तो कभी बेटियों या भाइयों की बात करने पर आंसू आ जाते। 
क्रमश 



2 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी घर घर की...
    (कहानी का विषय स्वत: मजबूत है, इसलिए अंतिम पैरा में कसाब का जिक्र अनावश्यक लगा...)
    अगली कड़ी का इंतजार ..

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