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बुधवार, 2 जनवरी 2013

फैसला


सुरती मान जा न,देख हमारे दिन फिर जायेंगे .रोज़ रोज़ खेत में धूप आंधी पानी में चाकरी ,ढोर जानवर के पीछे घूमना ,गोबर सानी करना देख कैसी सूरत हो गयी है तेरी.  सब काम से पीछा छूटेगा. 
काम से पीछा छूटेगा तो करेंगे क्या? और खेत ढोर जानवर सब बेच दोगे क्या?
अरी पगली बेचेंगे क्यों और खरीद लेंगे और काम के लिए नौकर रख लेंगे .
पैसे कहाँ से लाओगे और खरीदने के लिए ?
अरी तू हाँ तो कर ,तेरी हाँ से पैसों का पेड़ लग जायेगा .
मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है .मुझे सोने दो सुबह जल्दी उठना है आँगन लीपना है मुझे ,फिर धूप चढ़ जाएगी ,कह कर सुरती ने करवट बदल ली.
सुन न सुरती देख तुझे सोने का मंगलसूत्र लेना है ना भूरी काकी जैसा?
तुम दिलवाओगे मुझे सुरती ने फिर करवट ली उनका तो दो तोले का है मुझे और थोडा भारी चाहिए दो लड़ी वाला.
अरे दो क्या तीन लड़ी वाला ले लेना .तेरी सोने जैसी गर्दन पर सोने की लड़ियाँ जब दप दप करेंगी तो सबकी आँखें चौधिया जाएँगी .काम छूटेगा तो तेरे ये फूल से हाथ फिर नरम मुलायम हो जायेंगे .इनमे चार चार सोने की चूड़ियाँ पहनना और सेठानी की तरह राज़ करना देख बर्तन घिस घिस कर कैसे हाथ कर लिए है तूने.और तेरी ये कांच की चूड़ियों पर से तो गोबर गारा छूटता ही नहीं .
पर तुम कहो कोई खतरे वाली बात तो नहीं है ?चोरल वाली मामी कह रही थी "सब धरम नास करने वाले काम है "लोगो से दुश्मनी,जान को खतरा है सो अलग.
अरे पगली है तू तो अब चोरल वाली मामी सब मन से गडी बात सुनाती है और तू भोली मान भी लेती है खतरा होता तो में तुझे कहता भरोसा नहीं है ना तुझे मुझ पर .चोरल वाली मामी सच्ची तेरी सगी और में तेरा दुश्मन ,कहते हुए कैलाश ने मुह फेर लिया .
ऐसा क्यों कहते हो जी ? वो तो जो मामी ने कहा सो तुम्हे बता दिया .तुमसे ज्यादा किसी और पर भरोसा करूंगी क्या? सुरती उठ कर बैठ गयी उसकी आँखों में आंसू झिलमिलाने लगे .
तभी तो इतनी जिरह कर रही है बात नहीं मानी मेरी,जो भरोसा होता तो बिना कुछ पूछे चल ना देती मेरे साथ ?
इत्ती सी बात पर कित्ती बड़ी बात कह दी तुमने .जो तुम कहो सब मंजूर कब कहाँ क्या करना है बताओ. सुरती ने कैलाश के चेहरे को अपनी और घुमाते हुए कहा.
तू बहुत अच्छी है रानी है मेरी ,तभी तो तुझे इतना प्यार करता हूँ ,कैलाश ने सुरती को बाहों में भर लिया .कल सुबह दस बजे चलना है अच्छे से तैयार हो जाना देर ना हो .में सुबह जल्दी निकल कर सब इंतजाम कर लूँगा. अब सो जा सुबह जल्दी उठना है.

कैलाश सुबह सात बजे ही चाय पी कर घर से निकल गया.लौटा तो साथ में ढोल नगाड़े और लोगो का हुजूम था .
तैयार हो गयी तू?देख कितनी सुंदर लग रही है. चल बाहर चल सब तेरा इंतजार कर रहे है.
जैसे ही सुरती बाहर आयी उसे फूल मालाओं से लाद दिया गया ढोल बजने लगा .आज सरपंच पद के नामांकन का आखिरी दिन था .गाँव को महिला सीट घोषित किया ,तभी से कैलाश का दिल उछलने लगा था. गाँव के नौजवानों की टोली का लीडर था वो. उन्नीस बीस करने, उठापटक करने में बहुत रूचि थी उसकी. फिर पैसा कौन नहीं कमाना चाहता ?
सुरती के तो दिन ही फिर गए. कहाँ तो घर से निकल कर पड़ोस में नहीं जा पाती थी अब सुबह से शाम तक गाँव के एक -एक घर जाना सबके पैर छू कर आशीर्वाद लेना .

कैलाश ने सबके सामने जब उसके मुंह में मिठाई का टुकड़ा डाला लजा कर घूंघट और थोडा सा खींच लिया उसने.
पंचायत कार्यालय में सरपंच की कुरसी पर उसे बैठाते हुए कैलाश उसके बाजू में बैठ गया तो उसे बड़ी तसल्ली मिली. वो साथ है तो सब संभल ही जायेगा वैसे तो मन घबरा रहा था.
महीने भर से घर देखने का समय ही नहीं मिला. घर आँगन लीपना, ढोर जानवर, गारा गोबर, सुरती फिर अपनी जिंदगी में रम गयी. हाँ अब काम के बीच में कभी कभी कैलाश आ जाता ,उसके हाथ का काम छुड़ा कर कागजों पर उसके दस्तखत लेता और चला जाता. कभी पूछती भी क्या है ये ,तो हंस देता भरोसा नहीं है ना मुझ पर ?और सुरती झेंप कर दस्तखत कर देती. फिर धीरे धीरे उसने पूछना ही छोड़ दिया.
साल भर में सुरती के गले में दो लड़ियों का मंगलसूत्र हाथों में सोने की चूड़ियाँ ,पैरों में पायजेब सब आ गयीं.

गरीबों के हक का अनाज ,केरोसिन बेच कर तुम्हारे ये जेवर बने है भाभी. सब गरीबों की हाय लगी है इन चमचमाते जेवरों पर. कैलाश ने तो सारी मान मर्यादा छोड़ दी है ,बस पैसों के पीछे भागे है .रज्जो जीजी के शब्द लावे की तरह कानों में पड़े . उसी दिन उसने सारे जेवर उतार कर अलमारी में रख दिए.
दो कमरे पक्के बन गए .डबल बेड़ पर डनलप के गद्दों पर करवट बदलती सुरती के कानों में दीनू काका का रोना गूंजता रहता .धोखे से हमारी जमीन हड़प ली तुम कहीं सुख ना पा सकोगी लाड़ी. पड़ोस की निम्मो ही कभी कभी उसके पास आ बैठती. भाभी स्कूल में साईकिल आयीं पर हम से उसके पैसे लिए. खाद, बीज, सड़क, नाली, राशन सब में कैलाश भाईजी खूब पैसा बना रहे है.
दो घडी घर से निकलना दूभर हो गया. कभी पड़ोस के आँगन में सबको बैठा देख कर चली जाती ,तो उसे देख कर सब ओरतें चुप हो जाती और थोड़ी ही देर में इधर उधर हो जातीं. कैलाश सुबह जल्दी निकलता तो आधी रात गए लौटता .खेत खलिहान सब नौकरों के हवाले. 
कैलाश से बात करने की कोशिश की पर एक तो वह रात में देर से आता नशे में धुत्त होता और कभी बात करने की सी हालत में हो तो भी  न सुरती की सुनता न समझता .उसे तो बस पैसा कमाने की धुन सवार थी पांच सालों में वह अगले ५० साल की शानदार जिंदगी के लिए धन कमाना चाहता था .उसके अन्दर का किसान पैसों की चकाचौंध में अपनी संवेदनाएं खो चुका था .गरीबों के दुःख ,परेशानी ,सही गलत ,मान मर्यादा सब पैसों के आगे तुच्छ थे .सुरती जितना दूसरों के हक मारे जाने से ,उनकी बद दुआओं से दुखी थी उससे ज्यादा दुःख इस बात से था कि कैलाश पथ भ्रष्ट हो रहा है  .उसकी मेहनत करने की इच्छा शक्ति ख़त्म होती जा  रही है .लोगों की घृणा और उपेक्षा से वह यह तो समझ गयी थी की ५ साल के इस कुशासन के बाद उसकी और कैलाश की बहुत दुर्गति होने वाली है .एक बार उसने दबी जुबान से पंचायत कार्यालय जाने की बात कही तो कैलाश ने बड़ी कड़वाहट से उससे कहा "तुझे भरोसा नहीं है न मुझ पर ".
सुरती रात दिन आने वाले भयावह दिनों की कल्पनाओं से जूझती रहती .कैसे लोगों को राहत दिलाऊ ?कैसे कैलाश को इस दलदल से बाहर निकालूँ.? 
अकेली घर में बैठी सुरती क्या करती धीरे धीरे घर के काम के सारे नौकर हटा दिए उसने.और खुद को काम में डुबो दिया. कांच की चूड़ियों से सूखा गारा छुड़ाती सुरती की आँखे भर आतीं. 
आखिर पड़ोस की रमा चची को विश्वास में लेकर उसने उनके साथ शहर जाने की योजना बनाई.

बहु तुने  सब सोच लिया ना.कैलाश  को पता चला तो बहुत गुस्सा होगा  तेरे  साथ मेरी भी शामत आ जाएगी.
तुम चिंता ना करो काकी ,बस किसी तरह मुझे वहां ले चलो. मैंने सब सोच लिया है. 


आपने सब सोच लिया है? एक बार आप साइन कर देंगी तो फैसला पलट ना सकेगा .
जी साब मैंने सब सोच लिया है में इतना भार नहीं उठा पा रही हूँ इससे मुक्ति चाहती हूँ.
ठीक है क्या लिखना चाहती है बता दें बाबूजी लिख कर आपको पढ़ कर सुना देंगे फिर आप साइन कर दीजियेगा .
दूसरे दिन सुबह कैलाश पंचायत कार्यालय जाने के लिए तैयार हो रहा था तब सुरती ने  कागज़ उसे थमा दिया .
ये क्या किया तूने ?पगली सरपंची से इस्तीफा दे दिया .क्यों किया तूने ऐसा ? अरे पांच साल में सोने का महल बनवा देता में तेरे लिए .
सोने के महल का में क्या करूंगी जी ,देखिये ना मेरी कांच की चूड़ियों से गोबर गारा छूटता ही नहीं है ,कह कर सुरती कैलाश को हक्का बक्का छोड़ कर आँगन लीपने लगी.
कविता वर्मा

समाप्त 


9 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी गहराई और सत्यता को दर्शाया है आपने, हमारे भारत देश में कुछ समय पूर्व या फिर अभी भी कुछ गावों में हो रही घटनाओं का सुन्दर लेखा-जोखा, हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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  2. jivan me ameeree garibi ak sikke ke do pahlu hain ....pr kahanee me gareebi sarthak darshan marmikata ko jeevant kr deta hai ...abhar kavita ji

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  3. आज के यथार्थ का बहुत सजीव चित्रण...नारी के सशक्तिकरण के नाम पर किस तरह पुरुष इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहे हैं उसकी सशक्त अभिव्यक्ति..बहुत प्रभावी कहानी...

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  4. सुरती जैसी हालात लगभग सभी महिला सरपंचों की है। उनके एस पी जनता को लूट रहे हैं और वे उफ़्फ़ तक नहीं कर सकती। सुरती जैसी हिम्मत उनमे भी होनी चाहिए।

    ग्रामीण स्त्री की व्यथा का सुंदर चित्रण किया है आपने। आभार

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  5. यही हो रहा है,
    समाज की असल तस्वीर
    बहुत सुंदर

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  6. समाज के असली तस्वीर दिखाती है ये रचना !!

    हो सके तो इस ब्लॉग पर भी पधारे

    पोस्ट
    Gift- Every Second of My life.

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